भारतीय जनसंघ के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने पार्टी की ऐतिहासिक यात्रा, शुरुआती चुनावी संघर्ष, आपातकाल के दौरान कार्यकर्ताओं के योगदान और भाजपा के गठन से लेकर केंद्र में सरकार बनाने तक के सफर को याद किया। उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का उल्लेख करते हुए 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के लिए नई पीढ़ी को संगठन के इतिहास और विचारधारा से जोड़ने की अपील की।
भारतीय जनसंघ के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने संगठन के शुरुआती संघर्ष से लेकर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार तक की यात्रा का उल्लेख किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि 21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित जनसंघ की राजनीतिक यात्रा सिद्धांतों, संगठनात्मक मेहनत और कार्यकर्ताओं के योगदान से आगे बढ़ी।
उन्होंने कहा कि 75 वर्ष का यह अवसर केवल वर्षगांठ मनाने का नहीं, बल्कि उन नेताओं और कार्यकर्ताओं को याद करने का भी है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में संगठन को मजबूत बनाए रखा। संबोधन का केंद्रीय संदेश रहा—‘त्याग से शिखर तक’ की यात्रा को आगे बढ़ाते हुए 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के लिए काम करना।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से शुरू हुई राजनीतिक यात्रा
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने अपने भाषण में 1947 में आजादी के बाद देश की राजनीतिक दिशा को लेकर मौजूद वैचारिक मतभेदों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जनसंघ ने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय पहचान और राष्ट्रवाद को केंद्र में रखकर अपनी राजनीतिक विचारधारा विकसित की।
उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में जनसंघ की स्थापना और जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के मुद्दे को संगठन की शुरुआती राजनीति का प्रमुख हिस्सा बताया। इस संदर्भ में उन्होंने ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे’ के नारे का उल्लेख किया।

उन्होंने शुरुआती चुनावों में जनसंघ के सीमित संसदीय प्रतिनिधित्व की चर्चा करते हुए कहा कि 1952 में पार्टी के तीन सांसद थे, 1957 में चार, 1962 में 14 और 1967 में 35 सांसद चुने गए। 1971 में यह संख्या 22 रही। उनके मुताबिक, शुरुआती राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद संगठन का विस्तार जारी रहा।
मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय को किया याद
अपने संबोधन में उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के 23 जून 1953 को निधन और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय में हुई रहस्यमय मृत्यु का उल्लेख किया।
उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ और ‘अंत्योदय’ के विचारों को याद करते हुए कहा कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की अवधारणा संगठन की वैचारिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के योगदान के साथ उन कार्यकर्ताओं को भी याद किया, जिन्होंने गांव-गांव तक संगठन पहुंचाने और राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई।
आपातकाल और जनता पार्टी का दौर भी चर्चा में
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का महत्वपूर्ण घटनाक्रम बताते हुए कहा कि उस दौर में जनसंघ और विपक्ष के अनेक कार्यकर्ताओं को जेल जाना पड़ा और उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और नानाजी देशमुख सहित कई नेताओं का उल्लेख किया। उनके भाषण के अनुसार, आपातकाल के दौरान कार्यकर्ताओं ने लोकतंत्र और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर अपना संघर्ष जारी रखा।
उन्होंने 1977 में जनता पार्टी के गठन में जनसंघ के विलय का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय विपक्ष ने कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए एकजुट होकर चुनाव लड़ा। बाद में 1979 में जनता पार्टी के भीतर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े सदस्यों की भूमिका और उनकी दोहरी सदस्यता को लेकर विवाद उभरा। उन्होंने इसे जनसंघ की राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण मोड़ बताया, जिसके बाद जनता पार्टी टूट गई।
1980 में भाजपा का गठन, फिर राष्ट्रीय राजनीति में विस्तार
संबोधन में 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी के गठन को जनसंघ की राजनीतिक विरासत के अगले चरण के रूप में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने बताया कि भाजपा ने शुरुआती चुनावों में सीमित सफलता के बावजूद संगठन का विस्तार जारी रखा।
उन्होंने भाजपा की चुनावी यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि 1984 में पार्टी के दो सांसद थे, जबकि 1989 में यह संख्या 86 और 1991 में 120 हो गई। 1996 में भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी। इसके बाद 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी।
उन्होंने 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने, 2019 में पार्टी की बड़ी चुनावी जीत और 2024 में तीसरी बार केंद्र में सरकार बनने का भी जिक्र किया।
Z
अनुच्छेद 370 से राम मंदिर तक, सरकार के फैसलों का उल्लेख
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में हुए प्रमुख फैसलों और घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान हटाए जाने, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को जनसंघ की वैचारिक यात्रा से जोड़ा।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका और प्रतिष्ठा का उल्लेख करते हुए ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा को भी रेखांकित किया। ये बिंदु उनके राजनीतिक संबोधन का हिस्सा रहे।
2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य, नई पीढ़ी से जुड़ने की अपील
अपने भाषण के अंतिम हिस्से में उन्होंने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे अपने अनुभव नई पीढ़ी के साथ साझा करें। उन्होंने शुरुआती दौर की छोटी सभाओं, संगठन के संघर्ष और आपातकाल के अनुभवों को युवा कार्यकर्ताओं तक पहुंचाने की जरूरत बताई।
उन्होंने कहा कि सत्ता में आने के बाद भी कार्यकर्ताओं को सेवा का भाव बनाए रखना चाहिए और संगठन के इतिहास को नहीं भूलना चाहिए। उनके संबोधन का समापन ‘त्याग से शिखर तक’ की यात्रा को आगे बढ़ाते हुए ‘शिखर से शिखर तक’ पहुंचने और 2047 तक विकसित भारत के संकल्प के साथ हुआ।
अंत में उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों का उल्लेख करते हुए ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम’ और ‘जय श्री राम’ के उद्घोष के साथ अपना संबोधन समाप्त किया।
COMMENTS