ग्रेटर नोएडा स्थित एक अग्रणी विश्वविद्यालय के पीएच.डी. शोधार्थियों ने ‘अन्वेषण 2025’ प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ी सफलता हासिल की है। इस उपलब्धि ने न केवल विश्वविद्यालय का मान बढ़ाया है, बल्कि भारतीय शोध और नवाचार की क्षमता को भी वैश्विक मंच पर मजबूती से स्थापित किया है।
यह प्रतिष्ठित आयोजन Association of Indian Universities द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें देशभर के विश्वविद्यालयों के छात्रों ने विभिन्न विषयों में अपने शोध और नवाचार प्रस्तुत किए। प्रतियोगिता का उद्देश्य युवा शोधकर्ताओं को एक मंच प्रदान करना और उनके इनोवेटिव आइडियाज को प्रोत्साहित करना है।
इस सफलता की शुरुआत विश्वविद्यालय स्तर से हुई, जहां करीब 20 प्रोजेक्ट प्रस्तुत किए गए। इन प्रोजेक्ट्स में से 6 उत्कृष्ट टीमों का चयन किया गया, जिन्हें अगले चरण यानी ज़ोनल प्रतियोगिता के लिए भेजा गया।
ज़ोनल स्तर की प्रतियोगिता Govind Ballabh Pant University of Agriculture and Technology में आयोजित हुई, जिसमें उत्तर भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों की लगभग 150 टीमों ने हिस्सा लिया। यहां छह अलग-अलग विषयों में कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिली।

इस प्रतिस्पर्धा में ग्रेटर नोएडा के विश्वविद्यालय ने शानदार प्रदर्शन किया।
लाइफ साइंसेज़ विभाग की पीएच.डी. शोधार्थी राखी राजपूत की टीम “बायोप्लास्टिक” ने “सोशल साइंसेज़, ह्यूमैनिटीज, बिजनेस मैनेजमेंट, कॉमर्स एंड लॉ” श्रेणी में पहला स्थान हासिल किया।
वहीं, सौम्यजीत चंद्र की टीम “क्लीन एंड ग्रीन फ्यूल” ने “एग्रीकल्चरल साइंसेज़ एंड एलाइड सब्जेक्ट्स” में तीसरा स्थान प्राप्त किया।
इन दोनों टीमों ने डॉ. सौम्या पंडित के मार्गदर्शन में अपने शोध कार्य को विकसित किया, जिसने उनकी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
ज़ोनल स्तर पर सफलता के बाद विजेता टीमों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित AIU अन्वेषण प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। यह प्रतियोगिता Shoolini University में 25–26 फरवरी 2026 को आयोजित हुई।
इस मंच पर देश के सभी ज़ोन से चयनित टॉप टीमों ने भाग लिया, जिससे प्रतियोगिता और भी चुनौतीपूर्ण हो गई।

यहीं पर राखी राजपूत ने अपने शोध “गामा-PGA बेस्ड बायोप्लास्टिक प्रोडक्शन फ्रॉम एग्रीकल्चरल वेस्ट यूज़िंग बैक्टीरिया” के लिए पहला स्थान हासिल किया।
उनका यह नवाचार न केवल पर्यावरण के लिए उपयोगी है, बल्कि प्लास्टिक प्रदूषण जैसी वैश्विक समस्या का समाधान भी प्रस्तुत करता है। जूरी ने इस शोध को अत्यंत प्रभावशाली और भविष्य के लिए उपयोगी बताया।
इस उपलब्धि के लिए उन्हें ₹75,000 की नकद राशि से भी सम्मानित किया गया।
राखी राजपूत का यह शोध कृषि अपशिष्ट (Agricultural Waste) से बायोप्लास्टिक बनाने पर आधारित है।
यह प्लास्टिक पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल है
पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता
कृषि अपशिष्ट के पुनः उपयोग को बढ़ावा देता है
इस तरह यह रिसर्च सस्टेनेबल डेवलपमेंट और ग्रीन टेक्नोलॉजी की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

इस उपलब्धि पर विश्वविद्यालय के डीन रिसर्च डॉ. भुवनेश कुमार ने कहा:
“यह हमारे लिए गर्व का क्षण है कि हमारे शोधार्थी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। यह उनकी मेहनत और सही मार्गदर्शन का परिणाम है।”
वहीं, एसोसिएट डीन रिसर्च डॉ. मोहित साहनी ने कहा:
“हमारे छात्रों ने जिस तरह से अपने शोध को प्रस्तुत किया, वह उनकी गहरी समझ और समर्पण को दर्शाता है। हम उन्हें बेहतर संसाधन और मार्गदर्शन देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
यह उपलब्धि न केवल संबंधित विश्वविद्यालय के लिए, बल्कि पूरे देश के युवा शोधार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
आज के समय में जब दुनिया पर्यावरण, ऊर्जा और संसाधनों की चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे नवाचार भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं।
ग्रेटर नोएडा के इन शोधार्थियों की सफलता यह साबित करती है कि भारत के युवा वैज्ञानिकों में वैश्विक स्तर पर नेतृत्व करने की क्षमता है।
‘अन्वेषण 2025’ में मिली यह उपलब्धि न केवल एक प्रतियोगिता की जीत है, बल्कि यह संकेत है कि भारत शोध और नवाचार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
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