चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर 23 सितंबर 2026 को सामने आई इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। इनमें Form-6 में बदलाव, वोटर डेटाबेस के IT नियंत्रण के केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में अपीलों और गोवा में 97 पात्र मतदाताओं के नाम दर्ज न हो पाने जैसे मामले शामिल हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने कहा है कि उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और आंतरिक आपत्तियां संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
चुनाव आयोग देश में मतदान प्रक्रिया और मतदाता सूची की विश्वसनीयता का सबसे अहम संस्थान है। ऐसे में जब इसी संस्था के भीतर से कथित तौर पर फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल सामने आएं, तो बहस सिर्फ एक अधिकारी या एक आदेश तक सीमित नहीं रहती। अब ऐसा ही हुआ है।
23 सितंबर 2026 को प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में दूसरे दो चुनाव आयुक्त—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के मुताबिक एक दिन में चार बार तक आपत्ति दर्ज की गई। इन नोट्स की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त तक भी भेजी गई थीं।
यहीं से विवाद ने बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया। लेकिन पूरी तस्वीर समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि रिपोर्ट क्या कहती है और चुनाव आयोग का अपना पक्ष क्या है।
पहले समझिए, चुनाव आयोग में फैसला कैसे होता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त समान रैंक के सदस्य हैं। 2023 के कानून के तहत आयोग के कामकाज को जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से चलाया जाना है और मतभेद की स्थिति में बहुमत का निर्णय लागू होता है। यानी मुख्य चुनाव आयुक्त के पास अकेले फैसला रोक देने या अपनी बात मनवाने की कोई वीटो शक्ति नहीं है।
इसी व्यवस्था के बीच रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियां महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं, क्योंकि इनमें आरोप यह है कि कुछ संचार या फैसले सभी सदस्यों की मंजूरी के बिना जारी किए गए।
पहला बड़ा सवाल: Form-6 में SIR से जुड़ा सवाल कैसे आया?
Form-6 वह आवेदन है जिसका इस्तेमाल नया मतदाता बनने और मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई 2026 में इसमें SIR से जुड़ा एक नया विकल्प जोड़ा गया। आवेदक से पूछा गया कि उसका नाम, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR में शामिल था या नहीं। रिपोर्ट के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव पर सवाल उठाते हुए इसे नियमों में बदलाव के बिना किया गया कदम बताया और कहा कि इसे हटाया जाना चाहिए।
यहीं से यह सवाल भी उठा कि मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया में बदलाव करने का अधिकार किस स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा था और क्या इसके लिए जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई थी।
दूसरा सवाल: वोटर डेटा का नियंत्रण दिल्ली में केंद्रीकृत हो रहा है?
विवाद का दूसरा बड़ा हिस्सा चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने चिंता जताई कि मतदाता सूची के डेटाबेस और ECINet जैसे सिस्टम पर नियंत्रण धीरे-धीरे दिल्ली स्थित IT तंत्र में केंद्रित हो रहा है और इससे स्थानीय Electoral Registration Officers यानी EROs की भूमिका सीमित हो सकती है।
ERO वही अधिकारी होते हैं जो चुनाव क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने और उससे जुड़े मामलों को संभालते हैं। इसलिए सवाल यह है कि अंतिम निर्णय लेने की व्यावहारिक शक्ति स्थानीय स्तर पर रहेगी या तकनीकी सिस्टम के जरिए ऊपर केंद्रित होती जाएगी।

पश्चिम बंगाल की SIR प्रक्रिया पहले से ही विवादों में रही है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद करीब 60 लाख मतदाताओं से जुड़े मामलों की जांच न्यायिक अधिकारियों के जरिए हुई। चुनाव आयोग ने बाद में बताया कि SIR के दौरान 27.16 लाख नाम हटाए गए और कुल 38.31 लाख अपील दायर हुईं। इनमें 22.21 लाख अपील हटाए गए नामों को वापस जोड़ने की मांग वाली थीं, जबकि 16.10 लाख अपील ऐसे नामों के खिलाफ थीं जिन्हें न्यायिक प्रक्रिया के बाद सूची में बनाए रखा गया था।
रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने यह सवाल उठाया कि आयोग की ओर से इन 16 लाख से अधिक मामलों में अपील किसने और किसकी अनुमति से दाखिल की। उनका सवाल यह था कि यदि ऐसी अपील आयोग के नाम से की जा रही है, तो इसकी संस्थागत मंजूरी किस स्तर पर हुई।
चौथा मामला: गोवा के 97 पात्र मतदाता
गोवा का मामला इस बहस को तकनीकी स्तर से निकालकर सीधे मताधिकार तक ले आया। रिपोर्ट के अनुसार 97 मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच के बाद स्थानीय ERO ने उन्हें अंतिम सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर में उनके नाम दोबारा दर्ज करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था।
11 से 17 फरवरी के बीच गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने इस समस्या को दूर करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को आठ पत्र भेजे, लेकिन तकनीकी व्यवस्था समय पर सक्रिय नहीं हो सकी। नतीजे के तौर पर ये 97 नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए।
फिर “लोकतंत्र के लिए खतरा” वाली बात क्यों?
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक दलों ने रिपोर्ट को व्यापक लोकतांत्रिक चिंता से जोड़ दिया। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि अगर पात्र मतदाता का नाम तकनीकी प्रक्रिया, केंद्रीकृत नियंत्रण या प्रशासनिक फैसले के कारण सूची में दर्ज न हो सके, तो सवाल सिर्फ सॉफ्टवेयर का नहीं बल्कि मताधिकार की सुरक्षा और चुनावी पारदर्शिता का हो जाता है। इसीलिए कई नेताओं ने इसे लोकतंत्र और संविधान के लिए गंभीर खतरे के रूप में वर्णित किया है। ये राजनीतिक दावे हैं, स्थापित न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
विपक्ष का हमला, लेकिन चुनाव आयोग का जवाब भी सामने
रिपोर्ट आने के बाद राहुल गांधी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे समेत कई विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कड़े कदम उठाने की मांग की। कुछ नेताओं ने गिरफ्तारी, हटाने, SIR रोकने और हालिया चुनावों पर दोबारा मतदान जैसी मांगें भी रखीं।
वहीं चुनाव आयोग ने रिपोर्ट की व्याख्या से असहमति जताई। आयोग के अनुसार सदस्यों के बीच अलग-अलग टिप्पणियां, सवाल और सुझाव बहु-सदस्यीय संस्था में सामान्य आंतरिक जांच-पड़ताल का हिस्सा हैं। आयोग का कहना है कि SIR समेत उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और सभी तीनों आयुक्तों की मंजूरी थी।
इसलिए अभी सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि राजनीतिक बहस कितनी तेज है, बल्कि यह है कि सामने आई औपचारिक आपत्तियों, आयोग के जवाब और संबंधित प्रशासनिक रिकॉर्ड से वास्तविक निर्णय-प्रक्रिया की तस्वीर क्या निकलती है। SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी विभिन्न पहलुओं पर सुनवाई और निगरानी जारी है, जिससे यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराने की संभावना है।
COMMENTS