ग्रेटर नोएडा के ग्राम भनौता स्थित खसरा नंबर 386 में पांच मंजिला निर्माण को लेकर GNIDA के वर्क सर्किल-2 की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि निर्माण की नींव पड़ने के समय से ही अधिकारियों को जानकारी थी। 13 अक्टूबर 2026 को कार्रवाई के निर्देश जारी होने के बावजूद सीलिंग और अन्य कार्रवाई की मौजूदा स्थिति स्पष्ट करने की मांग उठ रही है।
किसी निर्माण की नींव रखी जाए, फिर धीरे-धीरे दीवारें उठें, मंजिलें बनें और इमारत पांच मंजिल तक पहुंच जाए—तो यह सवाल स्वाभाविक है कि संबंधित विभाग को इसकी जानकारी कब मिली और उसने समय रहते क्या कदम उठाए? ग्रेटर नोएडा के ग्राम भनौता स्थित खसरा नंबर 386 में कथित अवैध कॉलोनाइजेशन और पांच मंजिला फ्लैट निर्माण को लेकर अब यही सवाल उठ रहे हैं।
मामले में ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (GNIDA) के वर्क सर्किल-2 की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। आरोप है कि निर्माण की नींव डाले जाने के समय से ही संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद निर्माण आगे बढ़ता रहा और अब पांच मंजिला इमारत तैयार होने की बात सामने आ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि समय रहते जानकारी मिल गई थी, तो शुरुआती स्तर पर निर्माण रोकने के लिए क्या कार्रवाई की गई? और यदि कार्रवाई के निर्देश जारी हुए थे, तो उनका जमीन पर कितना असर दिखाई दिया?
13 अक्टूबर के निर्देश के बाद क्या हुआ?
इस मामले में 13 अक्टूबर 2026 को उच्च स्तर से कार्रवाई के निर्देश जारी होने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में संबंधित अधिकारियों से यह स्पष्ट किए जाने की जरूरत है कि निर्देश मिलने के बाद मौके पर निरीक्षण हुआ या नहीं, निर्माण की स्थिति का आकलन किया गया या नहीं और सीलिंग की प्रक्रिया किस चरण में है।
किसी भी विभाग में आदेश जारी होना कार्रवाई की शुरुआत हो सकती है, लेकिन उसकी वास्तविक प्रभावशीलता अनुपालन से तय होती है। यदि निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे, तो उनके पालन की स्थिति भी सार्वजनिक होनी चाहिए।
क्या आदेश के बाद कोई टीम मौके पर पहुंची? क्या निर्माण रोकने के लिए नियमानुसार कदम उठाए गए? क्या सीलिंग की कार्रवाई हुई? यदि हुई, तो उसका रिकॉर्ड क्या है? और यदि नहीं हुई, तो देरी का कारण क्या है?
इन सवालों के जवाब संबंधित प्राधिकरण के आधिकारिक पक्ष और कार्रवाई के दस्तावेजों से ही स्पष्ट हो सकते हैं।
नींव से पांच मंजिल तक निर्माण, निगरानी व्यवस्था पर सवाल
इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू निर्माण के कथित रूप से लगातार आगे बढ़ने की अवधि है। यदि अधिकारियों को शुरुआती चरण में ही शिकायत या सूचना मिल गई थी, तो यह जांचना जरूरी है कि उस समय क्या कदम उठाए गए थे।

अवैध निर्माण के मामलों में समय पर निरीक्षण और नियमानुसार कार्रवाई महत्वपूर्ण होती है। शुरुआती स्तर पर प्रभावी हस्तक्षेप होने से निर्माण के आगे बढ़ने और लोगों के धन के जोखिम में पड़ने की आशंका को कम किया जा सकता है।
अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित भूमि का वास्तविक उपयोग क्या है, निर्माण के लिए कोई स्वीकृति या नक्शा जारी हुआ था या नहीं, और यदि निर्माण नियमों के विपरीत पाया गया, तो प्राधिकरण ने किस प्रावधान के तहत कार्रवाई शुरू की।
केवल नोटिस जारी करने या फाइल पर निर्देश दर्ज होने से मामला समाप्त नहीं होता। आदेशों के अनुपालन और मौके की वास्तविक स्थिति का मिलान करना भी जरूरी है।
सीलिंग के निर्देश के बावजूद कार्रवाई में देरी क्यों?
मामले में सबसे गंभीर प्रश्न सीलिंग से जुड़ा है। यदि सीलिंग के निर्देश वास्तव में जारी हुए थे, तो उनकी वर्तमान स्थिति क्या है? क्या संबंधित अधिकारियों को कार्रवाई की जिम्मेदारी सौंपी गई थी? क्या किसी कानूनी या प्रशासनिक कारण से कार्रवाई रुकी हुई है?
निर्माण जारी रहने और कार्रवाई में कथित देरी के बीच किसी तरह की मिलीभगत या संरक्षण की आशंका भी सवालों के रूप में उठाई जा रही है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। इसकी पुष्टि जांच, दस्तावेजों और संबंधित पक्षों के जवाब से ही होगी।
यदि आदेशों के पालन में लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय करने और नियमानुसार कार्रवाई करने की मांग भी उचित रूप से उठती है।
GNIDA के वरिष्ठ अधिकारी क्या मौके की जांच कराएंगे?
अब निगाहें प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारियों पर हैं। मामले में निर्माण की अनुमति, स्वीकृत नक्शे, भूमि उपयोग, जारी नोटिस, सीलिंग संबंधी निर्देश और उनके अनुपालन की जांच कराई जानी चाहिए।
जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि निर्माण के अलग-अलग चरणों में संबंधित अधिकारियों को क्या जानकारी थी, शिकायत मिलने पर क्या कदम उठाए गए और 13 अक्टूबर के निर्देशों के बाद क्या कार्रवाई हुई।
यदि निर्माण नियमों के विपरीत पाया जाता है, तो प्राधिकरण को लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं, यदि किसी अधिकारी की लापरवाही सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी भी निर्धारित की जानी चाहिए।
Bharat News 360 TV के सीधे सवाल
भनौता के खसरा नंबर 386 में पांच मंजिला निर्माण की अनुमति किस आधार पर दी गई, यदि कोई अनुमति जारी हुई थी?
क्या संबंधित अधिकारियों को निर्माण की जानकारी नींव पड़ने के समय ही मिल गई थी?
13 अक्टूबर 2026 को जारी बताए जा रहे कार्रवाई के निर्देशों पर अब तक क्या कदम उठाए गए?
सीलिंग की कार्रवाई हुई है या नहीं? यदि नहीं, तो इसकी वजह क्या है?
क्या GNIDA के वरिष्ठ अधिकारी मौके का निरीक्षण कर जांच रिपोर्ट और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करेंगे?
अब जरूरत स्पष्ट जवाब और दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई की स्थिति सामने लाने की है। भनौता के खसरा नंबर 386 का मामला केवल एक इमारत तक सीमित नहीं है; यह प्राधिकरण की निगरानी, आदेशों के अनुपालन और जवाबदेही से जुड़े सवाल भी उठाता है। GNIDA का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कार्रवाई कहां तक पहुंची है और आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।
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