महर्षि दयानंद सरस्वती के 143वें बलिदान दिवस पर केंद्रीय आर्य युवक परिषद की ओर से ऑनलाइन विचार गोष्ठी आयोजित की गई। इसमें वक्ताओं ने उनके सामाजिक और वैचारिक योगदान को याद करते हुए युवाओं से उनके आदर्शों पर चलने की अपील की। कार्यक्रम में गायक कलाकारों ने मधुर गीतों के माध्यम से श्रद्धांजलि भी अर्पित की।
समाज में फैले अंधविश्वास, पाखंड और रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती के विचार आज भी चर्चा और चिंतन का विषय बने हुए हैं। उन्होंने अपने समय में केवल धार्मिक मान्यताओं पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि लोगों को तर्क, शिक्षा, स्वाभिमान और सामाजिक जागरूकता का रास्ता दिखाने का प्रयास किया। उनके इसी योगदान को याद करते हुए शुक्रवार को केंद्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में 143वां महर्षि दयानंद सरस्वती बलिदान दिवस मनाया गया।
इस अवसर पर ऑनलाइन विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने महर्षि दयानंद सरस्वती के जीवन, विचारों और सामाजिक योगदान पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके बताए आदर्शों को वर्तमान समय में अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
वैचारिक क्रांति के अग्रदूत थे महर्षि दयानंद: अनिल आर्य
केंद्रीय आर्य युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने देश में वैचारिक क्रांति का शंखनाद किया था। उन्होंने लोगों के सोचने और समझने की दिशा बदलने का काम किया। उस दौर में जब समाज में अनेक प्रकार के पाखंड और अंधविश्वास प्रचलित थे, तब स्वामी दयानंद ने उनके खिलाफ निर्भीक होकर आवाज उठाई।

अनिल आर्य ने कहा कि महर्षि दयानंद एक निडर संन्यासी थे, जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों को चुनौती देने में कभी संकोच नहीं किया। आर्य समाज की स्थापना के माध्यम से उन्होंने ऐसी संस्था खड़ी की, जिसने समाज में जागरूकता और सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अनुसार, आर्य समाज ने समाज के चौकीदार की तरह काम करते हुए गलत परंपराओं और रूढ़ियों पर सवाल उठाने का कार्य किया।
उन्होंने महर्षि दयानंद के स्वदेशी राज्य संबंधी विचार को भी याद किया। अनिल आर्य ने कहा कि स्वामी जी का स्पष्ट संदेश था—“कोई कितना ही करे, परंतु स्वदेशी राज्य सर्वोत्तम है।” उनके विचारों और प्रेरणा से प्रभावित होकर सैकड़ों नौजवान आजादी की लड़ाई में शामिल हुए। इस तरह महर्षि दयानंद का प्रभाव केवल धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश की स्वतंत्रता की चेतना को भी प्रेरित करता रहा।
आज भी प्रासंगिक हैं स्वामी दयानंद के आदर्श: प्रवीण आर्य
आर्य नेता प्रवीण आर्य ने अपने विचार रखते हुए कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती के आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने उनके समय में थे। जरूरत केवल उनके विचारों को याद करने की नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन और व्यवहार में उतारने की है।
उन्होंने कहा कि स्वामी दयानंद को वेदों वाला भी कहा जाता है। उन्होंने वेदों के अध्ययन और उनके प्रचार-प्रसार पर विशेष जोर दिया। प्रवीण आर्य ने बताया कि स्वामी जी ने जर्मनी से वेदों को मंगवाकर उन्हें पुनर्स्थापित करने का कार्य किया। उनके अनुसार, महर्षि दयानंद का जीवन ज्ञान, सत्य और सामाजिक जागरूकता के प्रति समर्पण का संदेश देता है।

प्रवीण आर्य ने लोगों से अपील की कि वे उनके आदर्शों को अपनाएं और समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वास तथा भेदभाव के खिलाफ जागरूकता फैलाने में अपनी भूमिका निभाएं।
गीतों के जरिए दी गई श्रद्धांजलि
कार्यक्रम में आचार्य महेंद्र भाई ने आयोजन की सराहना करते हुए आयोजकों को बधाई दी। उन्होंने इस तरह के कार्यक्रमों को महापुरुषों के विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बताया।
विचार गोष्ठी के दौरान गायक कलाकार नरेंद्र आर्य सुमन, सुदेश आर्य और पिंकी आर्या सहित अन्य कलाकारों ने मधुर गीत प्रस्तुत किए। गीतों के माध्यम से महर्षि दयानंद सरस्वती के विचारों और उनके योगदान को याद किया गया। प्रस्तुतियों से कार्यक्रम का माहौल श्रद्धा और उल्लास से भर गया।
नई पीढ़ी तक पहुंचें महर्षि दयानंद के विचार
महर्षि दयानंद सरस्वती का बलिदान दिवस मनाने के पीछे केवल उनके जीवन को याद करना ही नहीं, बल्कि उनके विचारों की प्रासंगिकता पर चर्चा करना भी महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए शिक्षा, विवेक, सत्य और जागरूकता जरूरी हैं।
ऑनलाइन माध्यम से आयोजित इस विचार गोष्ठी में महर्षि दयानंद के सामाजिक सुधार, वैचारिक निर्भीकता, वेदों के प्रचार और स्वदेशी राज्य के विचारों को याद किया गया। कार्यक्रम के जरिए यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि किसी भी महापुरुष को सच्ची श्रद्धांजलि उनके विचारों को जीवन में अपनाकर ही दी जा सकती है।
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