दक्षिण-पूर्वी दिल्ली पुलिस ने ओखला इंडस्ट्रियल एरिया में एक्सपायर हो चुके अंतरराष्ट्रीय और नामी ब्रांडों के खाद्य उत्पादों की एक्सपायरी डेट बदलकर उन्हें दोबारा पैक कर बाजार और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बेचने वाले संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है। 20 लाख रुपये से अधिक का सामान जब्त हुआ और सात आरोपी गिरफ्तार किए गए। लेकिन यह मामला केवल एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा, उपभोक्ता अधिकार और नियामक व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी खड़े करता है।
एक्सपायरी डेट बदलने का कारोबार—यह सिर्फ मिलावट नहीं, लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है
जब हम किसी सुपरमार्केट, किराना दुकान या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से कोई खाद्य उत्पाद खरीदते हैं, तो सबसे पहले उसकी मैन्युफैक्चरिंग डेट, एक्सपायरी डेट, बैच नंबर और ब्रांड पर भरोसा करते हैं। यही भरोसा तय करता है कि हमारे परिवार की थाली में रखा भोजन सुरक्षित है।
लेकिन दिल्ली के ओखला इंडस्ट्रियल एरिया से सामने आया मामला इस भरोसे की नींव को हिला देने वाला है।
दक्षिण-पूर्वी दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो एक्सपायर हो चुके अंतरराष्ट्रीय और बड़े ब्रांडों के खाद्य उत्पादों की एक्सपायरी और मैन्युफैक्चरिंग डेट बदलकर, उन्हें नए रैपर और नकली लेबल के साथ दोबारा पैक करता था और फिर बाजार तथा ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर असली उत्पाद बताकर बेच देता था।
पुलिस ने इस कार्रवाई में 20 लाख रुपये से अधिक मूल्य का सामान जब्त किया और सात आरोपियों को गिरफ्तार किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक फैक्ट्री का मामला है, या देशभर में फैले किसी बड़े नेटवर्क की एक कड़ी?

एक शिकायत, जिसने खोल दिया बड़ा राज
दिलचस्प बात यह है कि पुलिस यहां किसी फूड फ्रॉड की जांच करने नहीं पहुंची थी।
ओखला इंडस्ट्रियल एरिया थाना पुलिस को बाल मजदूरी की सूचना मिली थी। इसी आधार पर पुलिस ने बदरपुर के एसडीएम, मिशन मुक्ति नामक एनजीओ और एफएसएसएआई की टीम के साथ एक्स-57, ओखला फेज-2 स्थित वेस्टेंड कॉर्पोरेशन प्राइवेट लिमिटेड में संयुक्त छापेमारी की।
हालांकि वहां कोई बाल मजदूर नहीं मिला, लेकिन विस्तृत जांच के दौरान जो सामने आया, उसने जांच का पूरा रुख बदल दिया।
पुलिस को वहां ऐसी मशीनें मिलीं, जिनसे उत्पादों पर नई एक्सपायरी डेट, नई मैन्युफैक्चरिंग डेट, नकली बैच नंबर, नई एमआरपी और नए लेबल छापे जा रहे थे। यही नहीं, री-पैकेजिंग और सीलिंग की पूरी व्यवस्था भी मौके पर मौजूद थी।
यह किसी छोटे स्तर की धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित औद्योगिक स्तर का फर्जीवाड़ा था।
कौन-कौन से उत्पाद हो रहे थे प्रभावित?
जांच में सामने आया कि गिरोह केवल स्थानीय या अनजान ब्रांडों तक सीमित नहीं था।
पुलिस के अनुसार मौके से थम्स अप, फैंटा, बॉर्नविटा, हॉर्लिक्स, मैगी, घी, पेपर बोट जूस, दो लीटर की कोल्ड ड्रिंक बोतलें और कोल्ड ड्रिंक कैन जैसे कई लोकप्रिय उत्पाद बरामद हुए।
यानी वे उत्पाद, जिन्हें बच्चे, बुजुर्ग और आम परिवार रोजाना खरीदते और इस्तेमाल करते हैं।
यदि ये उत्पाद वास्तव में एक्सपायर हो चुके थे और उनकी तारीख बदलकर दोबारा बेचे जा रहे थे, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है।

गिरोह कैसे करता था खेल?
जांच के अनुसार, आरोपी पहले एक्सपायरी के करीब या एक्सपायर हो चुके खाद्य उत्पाद बेहद कम कीमत पर खरीदते थे।
इसके बाद केमिकल थिनर की मदद से उत्पादों पर लिखी मूल तारीखें मिटाई जाती थीं।
फिर विशेष प्रिंटिंग मशीनों की सहायता से नई तारीखें, नया बैच नंबर, नई एमआरपी और अन्य जानकारी छाप दी जाती थी।
इसके बाद नए रैपर और पैकेजिंग में उत्पाद को इस तरह तैयार किया जाता कि सामान्य ग्राहक असली और नकली में अंतर ही न कर सके।
इसके बाद यही सामान देशभर के बाजारों और कथित तौर पर विभिन्न ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुंचाया जाता था।
यदि यह आरोप सही सिद्ध होते हैं, तो यह भारत की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में निगरानी की गंभीर चुनौती को भी सामने लाता है।
सिर्फ पुलिस कार्रवाई काफी नहीं
दिल्ली पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं—275, 318(4), 336, 340 और 61(2)—के तहत मामला दर्ज कर सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
गिरफ्तार आरोपियों में कंपनी के मालिक दर्शन सिंह सचदेवा, मैनेजर, अकाउंटेंट, ऑपरेटर, वेयरहाउस कीपर और दो सुपरवाइजर शामिल हैं।
लेकिन इस कार्रवाई के बाद कई बड़े सवाल भी खड़े होते हैं।
यदि यह फैक्ट्री लंबे समय से चल रही थी, तो क्या किसी नियामक एजेंसी को इसकी भनक नहीं लगी?
क्या सप्लाई चेन की नियमित जांच पर्याप्त नहीं थी?
क्या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले खाद्य उत्पादों की सत्यता की जांच की कोई प्रभावी व्यवस्था मौजूद है?
और सबसे महत्वपूर्ण—यदि यह नेटवर्क देश के अन्य हिस्सों तक फैला हुआ है, तो क्या ऐसे और भी केंद्र सक्रिय हो सकते हैं?

उपभोक्ता भी रहें सतर्क
इस घटना से एक और सीख मिलती है कि केवल ब्रांड का नाम देखकर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है।
उपभोक्ताओं को पैकेजिंग, प्रिंटिंग की गुणवत्ता, एक्सपायरी डेट, बैच नंबर और खरीदारी के स्रोत पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
यदि किसी उत्पाद की पैकेजिंग संदिग्ध लगे, स्टिकर दोबारा चिपका हुआ दिखाई दे या कीमत असामान्य रूप से कम हो, तो ऐसे उत्पाद से बचना ही बेहतर है।
साथ ही, केवल अधिकृत दुकानों और विश्वसनीय विक्रेताओं से ही खाद्य उत्पाद खरीदना सुरक्षित विकल्प है।
भविष्य की चुनौती
भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य उपभोक्ता बाजार बनने की ओर बढ़ रहा है।
ऐसे में खाद्य सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, उपभोक्ता अधिकार और राष्ट्रीय विश्वास का प्रश्न भी है।
दिल्ली पुलिस की यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन इससे भी अधिक आवश्यक है कि एफएसएसएआई, राज्य खाद्य सुरक्षा विभाग, ई-कॉमर्स कंपनियां और स्थानीय प्रशासन मिलकर ऐसी गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखें।
क्योंकि एक्सपायरी डेट बदलना सिर्फ कानून तोड़ना नहीं है—यह लोगों के जीवन, स्वास्थ्य और भरोसे के साथ सीधा खिलवाड़ है।
यदि ऐसे मामलों पर समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो बाजार में बिकने वाला हर पैकेट उपभोक्ता के मन में एक नया सवाल छोड़ जाएगा—क्या जो मैं खरीद रहा हूं, वह सचमुच सुरक्षित है?
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