दादरी तहसील क्षेत्र में सरकारी और नोएडा प्राधिकरण की जमीन से जुड़े कथित कब्जे तथा पैमाइश में अनियमितता का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता नागेंद्र ने नोएडा मीडिया क्लब में प्रेस वार्ता कर पटवारी राकेश नागर पर पैमाइश रिपोर्ट में कथित हेरफेर का आरोप लगाया। उन्होंने खसरा संख्या 47 की करीब 0.4810 हेक्टेयर सरकारी भूमि समेत खसरा 42 और 45 की जमीन की निष्पक्ष दोबारा पैमाइश और राजस्व अभिलेखों का मौके की स्थिति से मिलान कराने की मांग की है।
दादरी तहसील क्षेत्र में जमीन की पैमाइश को लेकर उठे सवाल अब प्रशासन के सामने एक गंभीर शिकायत के रूप में पहुंच गए हैं। मामला सरकारी और नोएडा प्राधिकरण की जमीन से कथित कब्जे तथा मौके पर की गई पैमाइश की रिपोर्ट से जुड़ा है। शिकायतकर्ता नागेंद्र पुत्र प्रताप ने बृहस्पतिवार को नोएडा मीडिया क्लब में प्रेस वार्ता कर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि संबंधित जमीन की वास्तविक स्थिति और सरकारी रिकॉर्ड के बीच अंतर होने के बावजूद पैमाइश के बाद तैयार की गई रिपोर्ट में मौके की स्थिति को सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया। उनका दावा है कि यदि मामले की दोबारा निष्पक्ष जांच कराई जाए तो सरकारी जमीन से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।
खसरा नंबर 47 की जमीन को लेकर क्या है विवाद?
शिकायतकर्ता के अनुसार, खसरा संख्या-47 में करीब 0.4810 हेक्टेयर एलएमसी/एलएंडएम सरकारी भूमि शामिल है। इसी जमीन की पैमाइश को लेकर सबसे गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
नागेंद्र का कहना है कि 30 नवंबर को तहसीलदार की ओर से पटवारी राकेश नागर को पुलिस बल के साथ मौके पर जाकर पैमाइश करने के निर्देश दिए गए थे। शिकायतकर्ता के मुताबिक, निर्देश का उद्देश्य मौके की वास्तविक स्थिति और जमीन की स्थिति को स्पष्ट करना था।
लेकिन आरोप है कि मौके पर जाकर की गई पैमाइश के बाद जो रिपोर्ट अधिकारियों को भेजी गई, उसमें वास्तविक स्थिति का सही उल्लेख नहीं किया गया। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि मौके की स्थिति से अलग रिपोर्ट तैयार होने के कारण कथित कब्जेदारों को लाभ पहुंचा।
हालांकि, इन आरोपों की अभी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों या पटवारी का पक्ष इस शिकायत के संदर्भ में सामने आना बाकी है।
खसरा 42 और 45 पर भी उठाए सवाल
मामला केवल खसरा संख्या 47 तक सीमित नहीं है। प्रेस वार्ता में शिकायतकर्ता ने खसरा संख्या 42 और 45 से संबंधित जमीन को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए।
उनका दावा है कि इन खसरा नंबरों से जुड़ी निजी भूमि का बैनामा कराने के बाद कथित रूप से कब्जा नोएडा प्राधिकरण की जमीन पर कराया गया। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला सिर्फ निजी जमीन के विवाद का नहीं, बल्कि सरकारी अथवा प्राधिकरण की भूमि की सुरक्षा से भी जुड़ सकता है।

शिकायतकर्ता ने इस वजह से सरकारी जमीन को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये की संभावित क्षति की आशंका भी जताई है।
यह रकम कितनी है और सरकारी भूमि का वास्तविक क्षेत्रफल कितना प्रभावित हुआ है, इसका निर्धारण आधिकारिक राजस्व जांच और मौके की पैमाइश के बाद ही संभव होगा।
प्रभावशाली लोगों के दबाव का भी आरोप
प्रेस वार्ता के दौरान नागेंद्र ने यह भी आरोप लगाया कि मामले में प्रभावशाली लोगों का दबाव काम कर रहा है। उनका दावा है कि इसी दबाव के चलते संबंधित विभागों में कथित तौर पर ऐसी रिपोर्ट तैयार कराई जा रही हैं, जिनसे कुछ लोगों को फायदा पहुंच सकता है।
हालांकि, इस दावे के समर्थन में फिलहाल कोई स्वतंत्र आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। इसलिए इन आरोपों की सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
शिकायतकर्ता की क्या है मांग?
नागेंद्र ने प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष और दोबारा पैमाइश कराने की मांग की है। उनका कहना है कि केवल पुराने निरीक्षण या रिपोर्ट के आधार पर मामले को समाप्त करने के बजाय जमीन की वास्तविक स्थिति को मौके पर जाकर दोबारा जांचा जाना चाहिए।
उन्होंने मांग की है कि संबंधित खसरा नंबरों के राजस्व अभिलेखों और मौके की वास्तविक स्थिति का मिलान कराया जाए। साथ ही यह भी जांच हो कि जमीन का स्वामित्व किसके नाम दर्ज है, मौके पर किसका कब्जा है और पैमाइश के दौरान सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज सीमाओं का पालन हुआ या नहीं।
शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि यदि जांच में सरकारी जमीन पर कब्जे अथवा किसी स्तर पर अनियमितता की पुष्टि होती है तो संबंधित व्यक्तियों के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
अब प्रशासन की जांच पर टिकी निगाहें
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजस्व रिकॉर्ड और मौके की वास्तविक स्थिति एक-दूसरे से मेल खाती है? अगर दोनों में अंतर है तो उसकी वजह क्या है और जिम्मेदारी किसकी बनती है?
वहीं, यदि पहले की पैमाइश रिपोर्ट सही पाई जाती है तो शिकायतकर्ता के आरोपों की स्थिति भी स्पष्ट हो जाएगी।
फिलहाल मामला आरोप और शिकायत के स्तर पर है। पटवारी राकेश नागर अथवा संबंधित विभाग की ओर से इस मामले में कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए आरोपों को अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह खसरा संख्या 42, 45 और 47 से जुड़े रिकॉर्ड, मौके की स्थिति और पूर्व पैमाइश रिपोर्ट की निष्पक्ष तरीके से जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाए।
अगर सरकारी जमीन पर कब्जे या रिपोर्ट में किसी तरह की अनियमितता की पुष्टि होती है तो यह केवल जमीन विवाद नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और राजस्व व्यवस्था की पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर मामला बन जाएगा। फिलहाल सबकी निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई और प्रस्तावित जांच पर टिकी हैं।
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