उत्तर प्रदेश में मानसून के अंतिम दौर की बारिश ने 48 घंटे के भीतर भारी तबाही मचा दी। 56 लोगों की मौत, 46 घायल, 1,020 से अधिक मकान क्षतिग्रस्त और 107 मवेशियों की मौत की सूचना है। वहीं ओडिशा में नदियों का जलस्तर बढ़ने और उत्तराखंड में गंगा का बहाव तेज होने से खतरा बढ़ गया है।
उत्तर प्रदेश में सितंबर का आखिरी दौर आमतौर पर मानसून की विदाई का समय माना जाता है। लेकिन इस बार आसमान से बरसी बारिश ने जाते-जाते ऐसा कहर बरपाया कि कई इलाकों में जिंदगी थम सी गई। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि इतनी बारिश क्यों हुई, बल्कि सवाल यह भी है कि महज 48 घंटे में हालात इतने भयावह कैसे हो गए?
राहत आयुक्त कार्यालय के अनुसार, 25 सितंबर की सुबह से 27 सितंबर की सुबह तक उत्तर प्रदेश में 97.6 मिमी बारिश दर्ज की गई, जबकि इस अवधि में सामान्य बारिश करीब 4.5 मिमी मानी जाती है। यानी बारिश सामान्य से कई गुना ज्यादा रही।
इस भारी बारिश और तूफान से जुड़ी घटनाओं में 56 लोगों की मौत और 46 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है। राहत आयुक्त ऋषिकेश भास्कर यशोद के मुताबिक, प्रदेश में 1,020 से ज्यादा मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं, जबकि 107 मवेशियों की भी जान गई है।
प्रदेश के 75 में से 56 जिले अति-वृष्टि से प्रभावित बताए गए हैं। बारिश की तीव्रता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुछ जिलों में सामान्य बारिश के मुकाबले हजारों प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज हुई।
कहीं सामान्य से 7 हजार फीसदी ज्यादा बारिश
मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, फर्रुखाबाद में सामान्य से 7,385 फीसदी अधिक बारिश दर्ज की गई। वहीं कन्नौज में यह आंकड़ा 5,664 फीसदी, शाहजहांपुर में 4,408 फीसदी, हमीरपुर में 4,240 फीसदी और महोबा में 4,100 फीसदी अधिक रहा।
यानी जिन इलाकों में इस अवधि में सीमित बारिश की उम्मीद होती है, वहां कुछ ही समय में पानी का ऐसा दबाव बना कि सड़कें, घर और स्थानीय जल निकासी व्यवस्था सब पर असर पड़ा।
आखिर आसमान से इतना पानी एक साथ क्यों बरसा?
इसके पीछे मौसम की दो अलग-अलग प्रणालियों का असामान्य मेल अहम माना जा रहा है।
बंगाल की खाड़ी से उठा गहरा डिप्रेशन बड़ी मात्रा में नमी लेकर उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश और दक्षिणी उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ा। इसी दौरान भूमध्यसागरीय क्षेत्र से आने वाला वेस्टर्न डिस्टर्बेंस भी सक्रिय था। दोनों मौसम प्रणालियों के प्रभाव से मध्य उत्तर प्रदेश और तराई क्षेत्र में बारिश की तीव्रता अचानक बढ़ गई।
48 घंटे के दौरान औसत बारिश करीब 66.5 मिमी तक पहुंचने की बात सामने आई है, जबकि इस समय सामान्य औसत करीब 7.6 मिमी बताया गया है।
इतनी तेज और लगातार बारिश का सबसे सीधा असर उन इलाकों पर पड़ा जहां जल निकासी की क्षमता इतनी बड़ी मात्रा में पानी संभालने के लिए पर्याप्त नहीं थी।
मिट्टी के घर से लेकर बिजली के खंभों तक, कई वजह बनीं जानलेवा
इस बारिश में बड़ी संख्या में मौतें केवल बाढ़ के पानी से नहीं हुईं। कई जगह 20 से 24 घंटे तक लगातार बारिश के कारण मिट्टी के घर, पुरानी ईंटों की संरचनाएं और बाउंड्री वॉल अचानक ढह गईं।
सीतापुर, हरदोई, लखीमपुर खीरी और बहराइच समेत कई ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में बड़ी संख्या में मकानों के क्षतिग्रस्त होने की सूचना है।
इसके साथ ही 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलीं। कई स्थानों पर वज्रपात भी हुआ। खुले में काम कर रहे ग्रामीणों और मजदूरों के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक साबित हुई। पेड़ों के गिरने, बिजली के खंभे उखड़ने और करंट की चपेट में आने से भी हादसे हुए।
क्या बदलते मौसम का है असर?
सितंबर के अंतिम दिनों में सामान्य तौर पर मानसून कमजोर पड़ने और धीरे-धीरे पीछे हटने लगता है। लेकिन विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं कि समुद्री सतह के तापमान में बदलाव और जलवायु परिवर्तन मौसम प्रणालियों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
बंगाल की खाड़ी का पानी लंबे समय तक गर्म रहने पर वातावरण में अधिक नमी उपलब्ध हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में मानसून की विदाई के करीब भी मजबूत निम्न दबाव या डिप्रेशन विकसित हो सकते हैं। इसका नतीजा कम समय में बहुत ज्यादा बारिश के रूप में सामने आ सकता है।
हालांकि किसी एक बारिश की घटना को केवल जलवायु परिवर्तन से जोड़ने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण जरूरी होता है।
IMD के मुताबिक अब कुछ राहत
लगातार 48 घंटे की बारिश के बाद मौसम में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिले हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, सक्रिय मौसम प्रणाली का प्रभाव अब मुख्य रूप से तराई क्षेत्रों तक सीमित हो गया है।
लेकिन यूपी की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। कई इलाकों में जलभराव, क्षतिग्रस्त मकान, टूटे पेड़ और बिजली व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं राहत और बचाव कार्य के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
ओडिशा में नदियां उफान पर, निचले इलाकों पर नजर
उत्तर और मध्य भारत में बारिश का असर ओडिशा में भी दिखाई दे रहा है। महानदी नदी प्रणाली में पानी का बहाव तेजी से बढ़ा है।
जल संसाधन विभाग के इंजीनियर-इन-चीफ दिलीप कुमार राउत के अनुसार, मुंडली के पास जलस्तर करीब 8 लाख क्यूसेक तक पहुंचने की संभावना है।
खुर्दा, कटक, पुरी और जगतसिंहपुर के निचले इलाकों में जलभराव का खतरा बढ़ गया है। वहीं लूना, करंडिया, चित्रोत्पला, काठाजोड़ी, कुआखाई, बैतरणी, सालंदी और सुवर्णरेखा समेत कई नदियों के खतरे के निशान से ऊपर बहने की जानकारी सामने आई है।
उत्तराखंड में गंगा का बढ़ा जलस्तर, राफ्टिंग पर रोक
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में लगातार बारिश का असर गंगा के जलस्तर पर भी पड़ा है। मुनि-की-रेती, ऋषिकेश के पास गंगा का बहाव बढ़ने के बाद सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रिवर राफ्टिंग गतिविधियों को अनिश्चितकाल के लिए रोक दिया गया है।
टिहरी गढ़वाल के पर्यटन अधिकारी सोबत सिंह राणा के अनुसार, गंगा के जलस्तर और मौसम की स्थिति में सुधार आने के बाद ही राफ्टिंग दोबारा शुरू करने पर फैसला लिया जाएगा।
यानी एक तरफ यूपी में 48 घंटे की बारिश ने तबाही के आंकड़े बढ़ा दिए, तो दूसरी तरफ ओडिशा और उत्तराखंड में नदियों का बढ़ता जलस्तर नई चिंता पैदा कर रहा है। मानसून की विदाई का यह दौर आखिर कितना और असर दिखाएगा, इसका जवाब आने वाले दिनों के मौसम पर निर्भर करेगा।
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