इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डॉक्टरों की अस्पष्ट और अपठनीय हैंडराइटिंग में तैयार पोस्टमार्टम रिपोर्टों को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने गौतमबुद्धनगर के CMO और संबंधित मेडिकल ऑफिसर को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है। कोर्ट ने मामले की पोस्टमार्टम रिपोर्ट की स्पष्ट और पठनीय प्रति तत्काल दाखिल करने का आदेश दिया है। साथ ही 2023 के अपने पुराने आदेश का हवाला देते हुए पोस्टमार्टम, इंजरी और यौन उत्पीड़न से जुड़ी रिपोर्टों को डिजिटल तरीके से आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड करने की व्यवस्था लागू करने पर जोर दिया है। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर 2026 को होगी।
किसी भी आपराधिक मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट सिर्फ कागज का एक टुकड़ा नहीं होती।
उसमें दर्ज डॉक्टर की रिपोर्ट से यह समझने में मदद मिलती है कि मौत कैसे हुई, शरीर पर किस तरह की चोटें थीं और मेडिकल जांच में क्या सामने आया।
लेकिन अगर यही रिपोर्ट इतनी अस्पष्ट लिखावट में हो कि उसे पढ़ना ही मुश्किल हो जाए, तो जांच और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के सामने सवाल खड़े हो सकते हैं।
इसी मुद्दे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने डॉक्टरों द्वारा हाथ से लिखी जाने वाली अस्पष्ट पोस्टमार्टम रिपोर्टों पर गंभीर नाराजगी जताई।
कोर्ट की चिंता साफ थी—
अगर रिपोर्ट पढ़ी ही नहीं जा सकती, तो अदालत उसके आधार पर मामले को समझेगी कैसे?
यही वजह है कि मामले में गौतमबुद्धनगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) और संबंधित मेडिकल ऑफिसर को व्यक्तिगत रूप से अदालत में तलब किया गया है।
गौतमबुद्धनगर के CMO और मेडिकल ऑफिसर को व्यक्तिगत पेशी का आदेश
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि दोनों अधिकारी अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से अदालत के सामने मौजूद रहें।
यानी अब यह मामला सिर्फ एक पोस्टमार्टम रिपोर्ट की अस्पष्ट लिखावट तक सीमित नहीं रहा है।
कोर्ट यह जानना चाहता है कि आखिर ऐसी रिपोर्ट तैयार होने की स्थिति क्यों बनी और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया को स्पष्ट और प्रभावी बनाने के लिए क्या व्यवस्था लागू है।
अदालत ने संबंधित मामले की पोस्टमार्टम रिपोर्ट की बिल्कुल साफ और पठनीय प्रति यानी Clear Copy भी तत्काल दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया में किसी मेडिकल रिपोर्ट की एक-एक जानकारी अहम हो सकती है।
रिपोर्ट में दर्ज शब्द अगर स्पष्ट न हों तो उसका अर्थ समझने में परेशानी हो सकती है और यही परेशानी आगे चलकर मामले की सुनवाई को प्रभावित कर सकती है।
‘खराब लिखावट’ सिर्फ डॉक्टर की समस्या नहीं, न्याय की प्रक्रिया का सवाल
आमतौर पर डॉक्टरों की हैंडराइटिंग को लेकर मजाक किया जाता रहा है।
लेकिन अदालत के सामने जब वही लिखावट किसी संवेदनशील आपराधिक मामले की मेडिकल रिपोर्ट का हिस्सा बनती है, तो मामला मजाक का नहीं रह जाता।
यह सीधे जांच, सबूत और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ जाता है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत से जुड़े मेडिकल निष्कर्ष दर्ज होते हैं।
इंजरी रिपोर्ट में चोटों की जानकारी होती है।
और यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में मेडिकल रिपोर्ट जांच का बेहद संवेदनशील हिस्सा होती है।
ऐसे में अगर इन रिपोर्टों को पढ़ने में ही कठिनाई हो तो जांच अधिकारी, अभियोजन पक्ष, बचाव पक्ष और अदालत—सभी के सामने समस्या खड़ी हो सकती है।
हाईकोर्ट ने इसी व्यापक समस्या की ओर ध्यान दिलाया है।
2023 के आदेश की याद दिलाई, फिर क्यों नहीं बदली व्यवस्था?
सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने साल 2023 के पुराने आदेश का भी हवाला दिया।
उस आदेश में रिपोर्टों को डिजिटल और स्पष्ट तरीके से तैयार करने की दिशा में निर्देश दिए गए थे।
लेकिन अब एक बार फिर अस्पष्ट हाथ से लिखी रिपोर्ट अदालत के सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर पुरानी व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव कितनी दूर तक लागू हुआ?
अगर तकनीक उपलब्ध है...
अगर डिजिटल रिपोर्टिंग की व्यवस्था बनाई जा सकती है...
तो फिर ऐसी रिपोर्टें क्यों तैयार हो रही हैं जिन्हें पढ़ने के लिए अदालत को अलग से स्पष्ट प्रति मांगनी पड़े?
यही वह सवाल है जिसने इस मामले को सिर्फ एक जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था का मामला नहीं रहने दिया, बल्कि मेडिकल रिपोर्टिंग की पूरी प्रक्रिया पर बहस छेड़ दी है।
अब डिजिटल होगी मेडिकल रिपोर्टिंग?
अदालत ने मेडिकल रिपोर्टिंग में तकनीक के इस्तेमाल पर विशेष जोर दिया है।
निर्देशों के मुताबिक अब पोस्टमार्टम, इंजरी और यौन उत्पीड़न से जुड़ी रिपोर्टों को आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड करने की व्यवस्था को अनिवार्य बनाने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे।
इसका उद्देश्य सिर्फ डॉक्टरों की लिखावट की समस्या खत्म करना नहीं है।
इसके पीछे बड़ा मकसद है—
रिपोर्ट स्पष्ट हो, रिकॉर्ड सुरक्षित रहे और जरूरत पड़ने पर जांच एजेंसी तथा अदालत तक जानकारी आसानी से पहुंच सके।
बताया गया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस इन संवेदनशील और जरूरी रिपोर्टों को CCTV/डिजिटल सिस्टम के जरिए सीधे पोर्टल पर देख सकेगी।
इससे जांच प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है।
खासकर ऐसे मामलों में जहां मेडिकल रिपोर्ट जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है, डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होने से रिपोर्ट तक पहुंच आसान हो सकती है।
पोस्टमार्टम से लेकर यौन उत्पीड़न तक—क्यों जरूरी है बदलाव?
कल्पना कीजिए कि किसी गंभीर अपराध की जांच चल रही है और केस की मेडिकल रिपोर्ट अदालत के सामने रखी जाती है।
लेकिन रिपोर्ट में लिखे शब्द ही स्पष्ट नहीं हैं।
फिर जांच अधिकारी उसे समझने के लिए डॉक्टर के पास जाए...
अदालत को अलग से Clear Copy मंगानी पड़े...
और इसी प्रक्रिया में समय निकलता जाए।
यही देरी संवेदनशील मामलों में महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसीलिए डिजिटल रिपोर्टिंग को व्यवस्था में शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है।
इससे रिपोर्ट तैयार होने के बाद उसे सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड के रूप में रखा जा सकेगा और संबंधित जांच एजेंसियों को जरूरत के मुताबिक जानकारी उपलब्ध हो सकेगी।
अब 15 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
इस मामले में अब सभी की निगाहें 15 सितंबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर रहेंगी।
उस दिन गौतमबुद्धनगर के CMO और संबंधित मेडिकल ऑफिसर को व्यक्तिगत रूप से अदालत के सामने पेश होना होगा।
साथ ही संबंधित पोस्टमार्टम रिपोर्ट की स्पष्ट प्रति दाखिल करने का निर्देश भी दिया गया है।
अब सवाल यह है कि अगली सुनवाई में अधिकारी अदालत को क्या जवाब देते हैं?
क्या यह सिर्फ एक रिपोर्ट की तकनीकी समस्या थी?
या फिर मेडिकल रिपोर्टिंग की मौजूदा व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत है?
हाईकोर्ट की सख्ती ने कम से कम एक बात साफ कर दी है—
न्यायिक प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली मेडिकल रिपोर्ट ऐसी नहीं हो सकती जिसे पढ़ने और समझने में ही मुश्किल हो।
डॉक्टर की लिखावट व्यक्तिगत हो सकती है...
लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनते ही उसकी स्पष्टता सार्वजनिक और कानूनी महत्व का विषय बन जाती है।
अब देखना यह है कि 15 सितंबर की सुनवाई में क्या जवाब सामने आता है और डिजिटल रिपोर्टिंग को लेकर अदालत के निर्देश जमीन पर कितनी तेजी से लागू होते हैं।
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