नोएडा के सेक्टर-100 और 110 स्थित लोटस बुलेवर्ड और लोटस पनाश के बायर्स वेलफेयर असोसिएशन को सुप्रीम कोर्ट में बड़ी राहत मिली है। पिछले करीब डेढ़ साल से नोएडा अथॉरिटी के साथ चल रही कानूनी लड़ाई में बायर्स की जीत हुई है। अब अथॉरिटी की ओर से सील किए गए टावरों को दोबारा खोले जाने और अधूरे प्रोजेक्ट का निर्माण आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।
नोएडा में अधूरे प्रोजेक्ट और अपने घर के इंतजार से जूझ रहे हजारों होम बायर्स के बीच लोटस बुलेवर्ड और लोटस पनाश से जुड़ी खबर राहत देने वाली है। जिस प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी कभी बिल्डर के भरोसे थी, उसी प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का फैसला बायर्स ने खुद लिया। वर्षों तक पैसा लगाने और घर का इंतजार करने के बाद खरीदारों ने ऐसा मॉडल अपनाया, जिसमें प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए बायर्स ने खुद पैसे जुटाए और निर्माण की जिम्मेदारी संभाली।
अब इसी लड़ाई का एक बड़ा पड़ाव सुप्रीम कोर्ट में सामने आया है। लोटस बुलेवर्ड और लोटस पनाश के बायर्स वेलफेयर असोसिएशन ने नोएडा अथॉरिटी के खिलाफ चल रही करीब डेढ़ साल पुरानी कानूनी लड़ाई जीतने का दावा किया है। इसके बाद अथॉरिटी की ओर से सील किए गए टावरों को फिर से खोले जाने और निर्माण कार्य आगे बढ़ाने का रास्ता साफ होने की बात कही गई है।
जब बिल्डर पीछे हटा तो बायर्स ने खुद उठाई जिम्मेदारी
लोटस पनाश वेलफेयर असोसिएशन को शहर की ऐसी प्रमुख बायर्स असोसिएशन के तौर पर बताया जा रहा है, जिसने अपने अधूरे प्रोजेक्ट को खुद पूरा करने का फैसला लिया था।
मामला 10 जनवरी 2019 से जुड़ा है। उस समय बिल्डर ने दिवालिया प्रक्रिया में जाने का फैसला किया। इसके बाद प्रोजेक्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि जिन लोगों ने अपनी जिंदगी की कमाई घर खरीदने में लगा दी, उनके फ्लैट आखिर पूरे कौन करेगा?
ऐसे समय में बायर्स के एक समूह ने आगे आकर फैसला लिया कि प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए बायर्स खुद जिम्मेदारी उठाएंगे। इसके तहत बायर्स से बकाया रकम का कलेक्शन कर निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने की योजना बनाई गई।
250 करोड़ जुटाए और 2700 फ्लैट किए तैयार
बायर्स असोसिएशन के मुताबिक, 2019 से 2024 के बीच करीब 250 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया गया। इसी रकम के जरिए निर्माण कार्य को आगे बढ़ाया गया और करीब 2700 फ्लैट खरीदारों को बनाकर डिलिवर किए गए।
यानी जिस प्रोजेक्ट के खरीदार लंबे समय तक बिल्डर के भरोसे अपने घर का इंतजार कर रहे थे, उन्हीं खरीदारों ने खुद पैसा जुटाकर निर्माण को आगे बढ़ाया और हजारों परिवारों को उनके घर तक पहुंचाया।
हालांकि पूरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।
करीब तीन टावरों में लगभग 350 फ्लैट अभी पूरे होने बाकी थे। इन्हीं अधूरे हिस्सों के निर्माण के बीच नोएडा अथॉरिटी ने अपना बकाया लेने के लिए इन तीनों टावरों को सील कर दिया।
इसके बाद बायर्स के सामने फिर वही सवाल खड़ा हो गया—जब वे खुद पैसा जुटाकर हजारों फ्लैट पूरे कर चुके हैं, तो बाकी बचे घरों का निर्माण कैसे पूरा होगा?
डेढ़ साल पहले पहुंच गए सुप्रीम कोर्ट
टावर सील होने के बाद बायर्स वेलफेयर असोसिएशन ने इस कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। असोसिएशन के अध्यक्ष अमित चौहान के मुताबिक, करीब डेढ़ साल पहले बायर्स सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
असोसिएशन ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि बायर्स खुद कलेक्शन करके प्रोजेक्ट को पूरा कर रहे हैं और अब तक बड़ी संख्या में फ्लैट तैयार करके खरीदारों को सौंपे जा चुके हैं।
बायर्स का आरोप था कि नोएडा अथॉरिटी ने मैप वैलिडेशन और टाइम एक्सटेंशन चार्ज के नाम पर उनके ऊपर करीब 350 करोड़ रुपये की देनदारी निकाल दी।
यहीं से मामला और पेचीदा हो गया। एक तरफ बायर्स का कहना था कि वे अपने स्तर पर प्रोजेक्ट पूरा कर रहे हैं और करीब 2700 फ्लैट डिलिवर किए जा चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ अथॉरिटी अपने बकाये की मांग कर रही थी।
अब फिर खुलेंगे सील टावर, निर्माण का रास्ता साफ
सुप्रीम कोर्ट में चली इस लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बायर्स असोसिएशन ने अपनी जीत की जानकारी दी है। इसके साथ ही नोएडा अथॉरिटी की ओर से सील किए गए तीनों टावरों को दोबारा खोले जाने और अधूरे निर्माण को आगे बढ़ाने की उम्मीद जगी है।
बायर्स के लिए यह सिर्फ अदालत में मिली राहत नहीं है, बल्कि उन करीब 350 फ्लैटों के पूरा होने की उम्मीद भी है, जो अब तक अधूरे हैं।
2019 में बिल्डर के दिवालिया प्रक्रिया में जाने से शुरू हुई मुश्किलों के बाद बायर्स ने खुद जिम्मेदारी उठाई, करोड़ों रुपये जुटाए और हजारों फ्लैट पूरे किए। लेकिन तीन टावरों पर सील लगने के बाद एक बार फिर उनका सफर अदालत तक पहुंचा।
अब सुप्रीम कोर्ट में मिली इस जीत के बाद निगाहें इस बात पर हैं कि सील किए गए टावर कब खोले जाते हैं और करीब 350 अधूरे फ्लैटों का निर्माण कितनी तेजी से पूरा होता है। फिलहाल, वर्षों से अपने घर की राह देख रहे इन खरीदारों के लिए यह फैसला उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया है
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