E20 पेट्रोल को लेकर सरकार और ऑटो इंडस्ट्री के बीच बहस ने नया मोड़ ले लिया है। रिपोर्ट के मुताबिक 21 राज्यों के 250 से अधिक पेट्रोल पंपों से लिए गए सैंपल में कई जगह क्लोराइड और नमी की मात्रा तय मानकों से काफी अधिक मिली। दूसरी ओर सरकार E20 को सुरक्षित बता रही है। आखिर मामला क्या है और गाड़ियों के लिए वास्तविक खतरा कहां है?
देश में पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर एक ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने सरकार की E20 पेट्रोल नीति और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री दोनों को सवालों के घेरे में ला दिया है।
एक तरफ सरकार E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम कदम बता रही है। सरकार का तर्क है कि इससे प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी और कच्चे तेल के आयात पर भारत का भारी खर्च भी घटेगा।
लेकिन दूसरी तरफ एक रिपोर्ट के बाद ऑटोमोबाइल सेक्टर में हलचल बढ़ गई है।
मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी बड़ी कंपनियों की कथित आंतरिक बातचीत में पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर चिंता सामने आने का दावा किया गया है।
यही वह बिंदु है, जहां से पूरा मामला बेहद गंभीर हो जाता है।
21 राज्यों के 250 से ज्यादा पेट्रोल पंपों से लिए गए सैंपल
रिपोर्ट के मुताबिक ऑटो कंपनियों ने देश के 21 राज्यों में 250 से ज्यादा पेट्रोल पंपों से पेट्रोल के सैंपल जुटाए थे।
इन सैंपलों को लैब में जांच के लिए भेजा गया।
दावा है कि जांच के दौरान 18 राज्यों के सैंपलों में क्लोराइड और नमी का स्तर सरकारी मानकों से काफी अधिक पाया गया।
यहीं से कंपनियों की चिंता और बढ़ी।
बताया गया कि पेट्रोल में क्लोराइड की निर्धारित सीमा करीब 3 पार्ट्स पर मिलियन यानी PPM है। लेकिन रिपोर्ट में दावा किया गया कि दिल्ली, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कुछ सैंपलों में यह स्तर 300 से 570 PPM तक पहुंच गया।
अगर ये आंकड़े सही पाए जाते हैं तो यह सामान्य अंतर नहीं बल्कि बेहद बड़ा अंतर होगा।
और इसी वजह से अब सबसे बड़ा सवाल पेट्रोल के मिश्रण से ज्यादा उसकी क्वालिटी कंट्रोल व्यवस्था पर उठ रहा है।
क्लोराइड बढ़ा तो गाड़ी के इंजन पर क्या असर पड़ सकता है?
ऑटो इंडस्ट्री से जुड़े विशेषज्ञों की कथित चिंता का केंद्र पेट्रोल में मौजूद क्लोराइड है।
रिपोर्ट के अनुसार मारुति और महिंद्रा से जुड़े विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि फ्यूल इंजेक्टर बेहद कम मात्रा में भी क्लोराइड को लेकर संवेदनशील हो सकते हैं।
दावा यहां तक किया गया कि अगर पेट्रोल में ऑर्गेनिक क्लोराइड की मात्रा बहुत ज्यादा हो तो कम दूरी चलने के बाद भी इंजन और फ्यूल सिस्टम में गंभीर समस्या पैदा हो सकती है।
कुछ ईमेल संवादों में करीब 200 किलोमीटर के भीतर इंजन फेल होने जैसी आशंकाओं का भी उल्लेख होने की बात सामने आई है।
हालांकि इन दावों को अंतिम तकनीकी निष्कर्ष मानने से पहले स्वतंत्र और आधिकारिक जांच जरूरी है।
क्योंकि किसी वाहन की खराबी सिर्फ पेट्रोल में मौजूद एक तत्व से ही हो, यह निष्कर्ष बिना विस्तृत परीक्षण के नहीं निकाला जा सकता।
नमी भी बढ़ा सकती है परेशानी
मामला सिर्फ क्लोराइड तक सीमित नहीं है।
पेट्रोल में ज्यादा नमी होने पर फ्यूल सिस्टम में जंग लगने, ईंधन की सप्लाई प्रभावित होने और फ्यूल लाइन में समस्या पैदा होने का खतरा बढ़ सकता है।
यानी अगर ईंधन की गुणवत्ता वास्तव में खराब है तो इसका असर केवल इंजन पर नहीं, बल्कि वाहन के पूरे फ्यूल सिस्टम पर पड़ सकता है।
इसी वजह से ऑटो कंपनियों के लिए सवाल यह नहीं है कि E20 में एथेनॉल की मात्रा कितनी है।
सवाल यह भी है कि पेट्रोल पंप तक पहुंचने के बाद उस ईंधन की गुणवत्ता कितनी सुरक्षित और नियंत्रित रहती है।
बाहर समर्थन, अंदर चिंता?
इस विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू ऑटो इंडस्ट्री का कथित दोहरा रुख बताया जा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक SIAM यानी Society of Indian Automobile Manufacturers ने जुलाई के आखिर में सरकार को E20 पेट्रोल में क्लोराइड के स्तर को लेकर चिंता जताते हुए एक औपचारिक पत्र भेजा था।
लेकिन इसके कुछ समय बाद जब सरकार की तरफ से E20 पेट्रोल को सुरक्षित बताया गया, तो SIAM ने कथित तौर पर अपना पत्र वापस ले लिया और आंकड़ों की दोबारा जांच की जरूरत बताई।
यहीं से सवाल पैदा हुआ—
अगर समस्या इतनी गंभीर नहीं थी तो शिकायत की जरूरत क्यों पड़ी?
और अगर शिकायत वास्तविक थी तो उसे वापस लेने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
दूसरी ओर रिपोर्ट में दावा किया गया कि कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुए ईमेल संवाद में पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर चिंता बनी हुई थी।
कुछ अधिकारियों ने पेट्रोल भरवाने के बाद वाहनों में आई खराबियों और ईंधन की गुणवत्ता के बीच संभावित संबंध पर चर्चा की थी।
लेकिन यहां भी यह साफ करना जरूरी है कि लीक हुए ईमेल अपने आप में किसी तकनीकी कारण को अंतिम रूप से साबित नहीं करते।
महिंद्रा ने दी सफाई, मारुति और टाटा ने साधी चुप्पी
विवाद बढ़ने के बाद महिंद्रा एंड महिंद्रा की तरफ से सफाई सामने आई।
कंपनी का कहना है कि ईमेल के आधार पर निकाले जा रहे निष्कर्ष उसके वास्तविक पक्ष को सही तरीके से नहीं दर्शाते और रिपोर्ट में बातचीत को गलत संदर्भ में पेश किया गया है।
वहीं मारुति सुजुकी और टाटा मोटर्स की ओर से इस कथित लीक रिपोर्ट पर फिलहाल कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
इससे भी इस पूरे विवाद को लेकर सवाल और बढ़ गए हैं।
सरकार का जवाब—E20 सुरक्षित है
अब बात सरकार के रुख की।
पेट्रोलियम मंत्रालय और भारी उद्योग मंत्रालय की ओर से E20 पेट्रोल को सुरक्षित बताया गया है।
सरकार का कहना है कि बड़े स्तर पर किए गए परीक्षणों और ट्रायल में इंजन के असामान्य रूप से घिसने या खराब होने जैसी कोई ऐसी समस्या सामने नहीं आई है, जिससे E20 को असुरक्षित माना जाए।
सरकार की तरफ से यह भी संकेत दिया गया है कि अगर कहीं पेट्रोल की गुणवत्ता में समस्या मिल रही है तो उसका कारण E20 मिश्रण नहीं, बल्कि पेट्रोल पंपों के भूमिगत टैंकों की सफाई, रखरखाव या पाइपलाइन सिस्टम में लापरवाही हो सकता है।
यानी सरकार और ऑटो इंडस्ट्री की चिंता का केंद्र फिलहाल अलग-अलग दिखाई दे रहा है।
असल सवाल E20 नहीं, क्वालिटी कंट्रोल का भी है
E20 को लेकर चल रहे विवाद में सबसे जरूरी बात यह समझना है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति और पेट्रोल की गुणवत्ता—दोनों को एक ही सवाल नहीं माना जा सकता।
अगर E20 नीति का उद्देश्य आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और प्रदूषण घटाना है, तो उसके साथ सख्त क्वालिटी कंट्रोल भी उतना ही जरूरी है।
पेट्रोल पंपों के टैंक, पाइपलाइन, स्टोरेज और वितरण व्यवस्था की नियमित जांच होनी चाहिए।
क्योंकि ग्राहक जब पेट्रोल पंप पर गाड़ी लेकर पहुंचता है तो उसके लिए यह मायने रखता है कि टैंक में जा रहा ईंधन सरकारी मानकों पर खरा उतरता है या नहीं।
अब सबसे बड़ा सवाल
E20 को लेकर विवाद का असली जवाब किसी कंपनी के ईमेल, किसी राजनीतिक बयान या किसी दावे से नहीं मिलेगा।
जरूरत है स्वतंत्र, पारदर्शी और वैज्ञानिक जांच की।
अगर सैंपलों में क्लोराइड और नमी की मात्रा तय सीमा से ज्यादा पाई गई है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
और अगर जांच में यह साबित होता है कि E20 पेट्रोल स्वयं सुरक्षित है तथा समस्या केवल कुछ पेट्रोल पंपों की स्टोरेज व्यवस्था में है, तो उन पंपों और सप्लाई चेन के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ E20 का नहीं है।
सवाल देश के करोड़ों वाहन मालिकों की सुरक्षा और उनके वाहन की विश्वसनीयता का है।
सरकार का दावा अपनी जगह है, कंपनियों की चिंता अपनी जगह...
लेकिन आखिर में फैसला लैब रिपोर्ट, स्वतंत्र जांच और ठोस वैज्ञानिक सबूत ही करेंगे।
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