NHAI के टोल प्लाजा पर कथित फर्जीवाड़े और अवैध तरीके से टोल रकम डायवर्ट करने के मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने बड़ी कार्रवाई की है। ED ने उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, दिल्ली-NCR और पश्चिम बंगाल में करीब 14 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। जांच एजेंसी अब डिजिटल सबूत, बैंक खातों और कथित लाभार्थियों तक पहुंचने की कोशिश में जुटी है।
देशभर के नेशनल हाईवे पर दौड़ने वाले वाहनों से टोल वसूली की व्यवस्था लंबे समय से डिजिटल सिस्टम के जरिए संचालित हो रही है। लेकिन इसी व्यवस्था में सेंध लगाकर टोल की रकम को कथित तौर पर सरकारी हिसाब-किताब से बाहर करने का मामला सामने आया है। अब इस पूरे नेटवर्क की जांच प्रवर्तन निदेशालय यानी ED के हाथ में पहुंच चुकी है और बुधवार, 2 सितंबर को जांच एजेंसी ने एक साथ कई राज्यों में छापेमारी कर कार्रवाई को और तेज कर दिया।
ED ने NHAI के अलग-अलग टोल प्लाजा पर कथित धोखाधड़ी से टोल वसूली और उससे जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के तहत करीब 14 ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया। उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, दिल्ली-NCR और पश्चिम बंगाल के कोलकाता तक ED की टीमें संदिग्ध परिसरों में पहुंचीं।
जानकारी के मुताबिक, यह कार्रवाई ED के लखनऊ जोनल ऑफिस की ओर से प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी PMLA, 2002 के तहत की गई। केंद्रीय एजेंसी ने पुलिस की दो FIR में दर्ज आरोपों और सामने आए तथ्यों के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई है।
फर्जी टोल रसीदों के पीछे क्या था खेल?
जांच का सबसे अहम पहलू कथित तौर पर इस्तेमाल किया गया अनधिकृत सॉफ्टवेयर है। आरोप है कि कुछ टोल प्लाजा पर आधिकारिक सिस्टम के बजाय ऐसे सॉफ्टवेयर और एप्लिकेशन का इस्तेमाल किया गया, जिनके जरिए टोल रसीदें तैयार की जाती थीं।
आरोप यहीं खत्म नहीं होते। जांच एजेंसियों को शक है कि टोल वसूली से आने वाली रकम का एक हिस्सा NHAI के आधिकारिक अकाउंटिंग सिस्टम में दर्ज होने के बजाय बाहर डायवर्ट किया जा रहा था। यानी वाहन चालकों से पैसा लिया गया, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में पूरी रकम का हिसाब नहीं पहुंचा।
अगर जांच में ये आरोप साबित होते हैं तो मामला केवल टोल वसूली में अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कथित तौर पर अवैध तरीके से हासिल रकम को छिपाने और उसे अलग-अलग माध्यमों से इस्तेमाल करने की दिशा में भी जांच आगे बढ़ सकती है।
NHAI रिकॉर्ड और फॉरेंसिक जांच में क्या मिला?
ED अधिकारियों के मुताबिक, फॉरेंसिक जांच और NHAI के रिकॉर्ड में अनधिकृत सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की पुष्टि हुई है। यही वजह है कि अब जांच का फोकस केवल टोल प्लाजा के रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है।
ED की टीमें छापेमारी के दौरान कंप्यूटर, डिजिटल डिवाइस, दस्तावेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड खंगाल रही हैं। एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित तौर पर टोल की रकम कहां गई, किन खातों में पहुंची और इस पूरे नेटवर्क से कौन-कौन लोग आर्थिक रूप से लाभान्वित हुए।
जांच में बैंक खातों, वित्तीय लेनदेन और कथित बेनामी संपत्तियों से जुड़े दस्तावेजों को भी अहम माना जा रहा है। ED का उद्देश्य कथित अपराध से हुई कमाई का पूरा मनी ट्रेल सामने लाना है।
टोल संचालकों और IT नेटवर्क पर भी नजर
जांच के दायरे में टोल प्लाजा से जुड़े संचालकों के साथ-साथ IT से जुड़े कर्मचारियों और अन्य संदिग्ध लोगों की भूमिका भी देखी जा रही है। आरोपों में यह भी सामने आया है कि कथित तौर पर टोल संचालकों, IT कर्मियों और अन्य आरोपियों के बीच रकम बांटने का नेटवर्क हो सकता है।
इसके अलावा फर्जी FASTag के जरिए ओवरलोडेड और कमर्शियल वाहनों को टोल व्यवस्था में कथित तौर पर गलत तरीके से निकालने के आरोप भी जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। उत्तर प्रदेश STF और केंद्रीय जांच एजेंसियां पहले से ही इस मामले से जुड़े कई टोल संचालकों की गतिविधियों पर नजर रख रही हैं।
कथित मास्टरमाइंड आलोक सिंह की गिरफ्तारी से खुली परतें
इस पूरे मामले में आलोक सिंह का नाम भी सामने आया है। वाराणसी से उसे कथित टोल घोटाले का मास्टरमाइंड बताते हुए गिरफ्तार किए जाने की जानकारी सामने आई थी। आरोप है कि वह वाराणसी के हरहुआ इलाके से कथित अवैध नेटवर्क को संचालित कर रहा था।
वहीं वाराणसी के लाला नगर टोल प्लाजा पर करीब 62.87 करोड़ रुपये की स्टांप चोरी से जुड़े मामले की भी जांच चल रही है। इस पूरे प्रकरण ने टोल वसूली की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
200 से ज्यादा टोल प्लाजा जांच के घेरे में
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देशभर के 200 से ज्यादा टोल प्लाजा जांच के दायरे में बताए जा रहे हैं। इनमें करीब 100 टोल प्लाजा उत्तर प्रदेश के होने की जानकारी सामने आई है।
ED की मौजूदा कार्रवाई को इसी व्यापक जांच का अहम हिस्सा माना जा रहा है। इससे पहले भी टोल प्लाजा पर कथित फर्जी टोल वसूली से जुड़े मामले में ED ने PMLA की धारा 17 के तहत कई ठिकानों पर तलाशी ली थी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अनधिकृत सॉफ्टवेयर का नेटवर्क आखिर कितना बड़ा था? टोल से कथित तौर पर बाहर निकाली गई रकम कितनी है? इस रकम के अंतिम लाभार्थी कौन हैं और क्या यह नेटवर्क सिर्फ कुछ टोल प्लाजा तक सीमित था या देशभर में फैला हुआ था?
ED की छापेमारी के बाद इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश तेज हो गई है। आने वाले दिनों में डिजिटल रिकॉर्ड और वित्तीय लेनदेन की जांच से इस कथित टोल फर्जीवाड़े की और परतें खुल सकती हैं।
COMMENTS