नोएडा के सेक्टर-121 से जुड़े हिंडन डूब क्षेत्र में अवैध निर्माण और अतिक्रमण को लेकर कार्रवाई के दावों के बीच कई सवाल सामने आ रहे हैं। वर्क सर्किल-6 की निगरानी, जेई स्तर के अधिकारी एमएल रावत की लंबे समय से तैनाती, 1 जनवरी 2025 से बताए जा रहे दो वर्ष के सेवा विस्तार और उनकी कथित संपत्तियों को लेकर उठ रहे सवालों की अब रिकॉर्ड के आधार पर पड़ताल की जा रही है।
नोएडा में हिंडन डूब क्षेत्र को लेकर कार्रवाई कोई नई बात नहीं है। कभी बुलडोजर की तस्वीरें सामने आती हैं, कभी अवैध निर्माण के खिलाफ अभियान की जानकारी दी जाती है और कभी प्राधिकरण की ओर से सख्ती के दावे किए जाते हैं। लेकिन इन तमाम दावों के बीच सेक्टर-121 से जुड़े हिंडन डूब क्षेत्र को लेकर कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब सिर्फ प्रेस नोट से नहीं, बल्कि ग्राउंड रिपोर्ट और रिकॉर्ड से तलाशना जरूरी हो जाता है।
यह इलाका वर्क सर्किल-6 के अंतर्गत आता है। आरोप हैं कि कार्रवाई और निगरानी के बावजूद यहां कथित तौर पर निर्माण सामग्री पहुंचने, प्लॉटिंग होने और निर्माण गतिविधियां जारी रहने की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि डूब क्षेत्र में निर्माण रोकना और अतिक्रमण पर कार्रवाई करना व्यवस्था की जिम्मेदारी है, तो फिर कथित तौर पर निर्माण गतिविधियां दोबारा या लगातार दिखाई क्यों देती हैं?
क्या सेक्टर-121 के लिए कार्रवाई के नियम अलग हैं?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नोएडा के दूसरे डूब क्षेत्रों में प्राधिकरण की कार्रवाई जमीन पर दिखाई देती रही है। ऐसे में सेक्टर-121 को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यहां निगरानी व्यवस्था में कोई कमी है या कार्रवाई और उसके क्रियान्वयन के बीच कोई अंतर रह जा रहा है।
मामला सिर्फ निर्माण का नहीं है। सवाल उस प्रशासनिक सिस्टम का भी है, जिसकी जिम्मेदारी निर्माण को रोकने, शिकायतों पर कार्रवाई करने और कार्रवाई के बाद दोबारा निर्माण न होने देने की है।
यदि किसी स्थान पर कार्रवाई का आदेश जारी होता है, लेकिन उसके बाद भी निर्माण जारी रहने के दावे सामने आते हैं, तो जवाबदेही तय करने की जरूरत और बढ़ जाती है।

निगरानी व्यवस्था के बीच एमएल रावत का नाम क्यों?
इसी पड़ताल के दौरान एमएल रावत का नाम भी सामने आता है। उन्हें जूनियर इंजीनियर स्तर का अधिकारी बताया जाता है और लंबे समय से वर्क सर्किल-6 से जुड़े क्षेत्र में उनकी तैनाती की बात सामने आती रही है।
उनकी भूमिका को लेकर शिकायतों और आरोपों का उल्लेख भी सामने आता रहा है। हालांकि इन आरोपों को प्रमाणित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि क्या इन शिकायतों की कभी स्वतंत्र और निष्पक्ष समीक्षा हुई?
यदि जांच हुई, तो उसका निष्कर्ष क्या रहा?
और यदि जांच नहीं हुई, तो इसकी वजह क्या थी?
यही वे सवाल हैं जिनके जवाब आधिकारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट होने चाहिए।
दो साल के सेवा विस्तार पर भी उठे सवाल
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा Extension Culture से जुड़ा है।
मौजूदा रिपोर्ट और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर जेई स्तर के कर्मचारियों को सेवा विस्तार दिए जाने का कोई स्पष्ट सामान्य उदाहरण सामने नहीं आता। हालांकि अलग-अलग समय पर कई कर्मचारियों के नाम सेवा विस्तार के लिए भेजे जाने की बातें सामने आती रही हैं, लेकिन हर नाम को सेवा विस्तार मिला हो, ऐसा स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
इसी संदर्भ में सवाल उठता है कि 1 जनवरी 2025 से एमएल रावत को दो वर्ष का सेवा विस्तार किस नियम और प्रशासनिक आधार पर दिया गया?
क्या इसके पीछे कोई विशेष तकनीकी या प्रशासनिक आवश्यकता थी?
क्या सेवा विस्तार से पहले उनकी तैनाती, क्षेत्रीय जिम्मेदारी और उनके खिलाफ सामने आई शिकायतों की समीक्षा की गई?
और यदि दूसरे कर्मचारियों के नाम भी सेवा विस्तार के लिए विचाराधीन रहे थे, तो एमएल रावत के मामले में अपनाई गई प्रक्रिया क्या थी?

तीन साल पुरानी कार्रवाई भी चर्चा में
करीब तीन वर्ष पहले डूब क्षेत्र में बड़े स्तर पर कार्रवाई के बाद वर्क सर्किल-6 के तत्कालीन एसएम के.वी. सिंह को उनके मूल विभाग वापस भेजे जाने की बात सामने आई थी।
इस घटनाक्रम को वर्तमान स्थिति के संदर्भ में देखना इसलिए जरूरी है क्योंकि उस समय क्षेत्रीय जिम्मेदारी और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर निर्णय लिया गया था।
अब सवाल यह है कि वर्तमान व्यवस्था में कथित निर्माण और शिकायतों को लेकर जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की गई है?
क्या वर्क सर्किल-6 की पूरी निगरानी व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा हुई है?
कथित संपत्तियों की अब होगी पड़ताल
मामले का अगला और सबसे संवेदनशील पहलू एमएल रावत की कथित चल-अचल संपत्तियों से जुड़े आरोप हैं।
इन संपत्तियों को लेकर कई दावे सामने आते रहे हैं, लेकिन किसी भी संपत्ति को लेकर निष्कर्ष निकालने से पहले उसके दस्तावेज, स्वामित्व, खरीद की तारीख, मूल्य और संबंधित व्यक्ति की घोषित आय जैसे तथ्यों की जांच जरूरी है।
इसीलिए अब पड़ताल का फोकस यह होगा कि कथित तौर पर संपत्तियां कहां-कहां हैं, किसके नाम दर्ज हैं, कब खरीदी गईं और उनसे जुड़े दस्तावेज क्या कहते हैं।
सबसे अहम सवाल यह होगा कि क्या उपलब्ध रिकॉर्ड और घोषित आय के बीच कोई ऐसा अंतर दिखाई देता है, जिसकी सक्षम एजेंसी द्वारा नियमानुसार जांच आवश्यक हो।
यदि कोई शिकायत या दस्तावेजी जांच पहले से लंबित है, तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए। और यदि जांच में कोई अनियमितता नहीं मिलती, तो संबंधित विभाग द्वारा तथ्यात्मक स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए।

अब जवाब रिकॉर्ड से चाहिए
सेक्टर-121 के हिंडन डूब क्षेत्र से लेकर वर्क सर्किल-6 की निगरानी व्यवस्था और एमएल रावत के सेवा विस्तार तक सवालों की एक लंबी कड़ी सामने है।
क्या सेक्टर-121 की स्वतंत्र जांच होगी?
क्या वर्क सर्किल-6 की निगरानी व्यवस्था की समीक्षा होगी?
क्या कथित मिलीभगत के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी?
क्या एमएल रावत की लंबे समय से चली आ रही तैनाती की समीक्षा की जाएगी?
क्या 1 जनवरी 2025 से दिए गए दो वर्ष के सेवा विस्तार का प्रशासनिक आधार सार्वजनिक किया जाएगा?
और क्या कथित संपत्तियों से जुड़े आरोपों की सक्षम एजेंसी रिकॉर्ड के आधार पर जांच करेगी?
इन सवालों का जवाब किसी एक अधिकारी के खिलाफ फैसला सुनाने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी है।
अगर आरोप गलत हैं, तो जांच के बाद तस्वीर साफ होनी चाहिए। अगर नियमों के तहत सब कुछ हुआ है, तो उसका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। और यदि कहीं लापरवाही या अनियमितता मिलती है, तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
भारत न्यूज़ 360 TV की पड़ताल यहीं खत्म नहीं होती।
अब अगला फोकस एमएल रावत से जुड़ी कथित संपत्तियों पर है—दस्तावेज क्या कहते हैं, स्वामित्व किसका है, संपत्तियां कब खरीदी गईं और उपलब्ध आय से उनका क्या संबंध है।
पड़ताल जारी है… सवाल जारी हैं… और अब इंतजार है जवाब का।
COMMENTS