नोएडा-ग्रेटर नोएडा के स्टेडियमों में महंगी खेल फीस और अकादमियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। दावा है कि करीब 50 अकादमियों के पांच साल के संचालन के बावजूद एक भी मेडल नहीं मिला। सवाल है कि आम और ग्रामीण परिवारों के प्रतिभाशाली बच्चों को ओलंपिक स्तर तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था क्या कर रही है?
जिस स्टेडियम में सुबह किसी बच्चे के कदमों की आवाज के साथ देश के लिए मेडल जीतने का सपना दौड़ना चाहिए, वहां अब खेल व्यवस्था को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में करोड़ों रुपये की लागत से बने स्टेडियम खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं देने के लिए तैयार किए गए, लेकिन आरोप है कि इन सुविधाओं तक पहुंच अब हर बच्चे के लिए आसान नहीं रह गई है।
दावा है कि महंगी फीस के कारण आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे इन स्टेडियमों में नियमित प्रशिक्षण लेने से पीछे रह रहे हैं, जबकि निजी अकादमियों के लिए यही मैदान और सुविधाएं कमाई का जरिया बनती जा रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर स्टेडियम में प्रतिभा से ज्यादा जेब देखी जाएगी, तो गांव और सामान्य परिवारों से आने वाला खिलाड़ी आखिर ओलंपिक तक कैसे पहुंचेगा?
पांच साल में 50 अकादमियों से एक भी मेडल नहीं?
खेल प्रशिक्षण से जुड़ी व्यवस्था पर सबसे गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि करीब 50 अकादमियों के पांच साल के संचालन के बावजूद एक भी मेडल नहीं मिलने का दावा सामने आया है। यदि यह आंकड़ा सही है तो यह केवल अकादमियों पर नहीं, बल्कि पूरे खेल सिस्टम की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।
आखिर इन अकादमियों में कितने बच्चों ने प्रशिक्षण लिया? कितने खिलाड़ी जिला स्तर से राज्य स्तर तक पहुंचे? कितने ने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और कितने खिलाड़ियों ने पदक जीते?
और सबसे अहम—अगर किसी अकादमी से लगातार वर्षों तक कोई बड़ा खिलाड़ी नहीं निकल रहा, तो क्या उसके प्रदर्शन का कभी स्वतंत्र मूल्यांकन किया गया?
एडमिशन से पहले फीस, फिर सपने
आरोप है कि कई खेलों में प्रशिक्षण की फीस इतनी अधिक है कि सामान्य परिवार के लिए बच्चे को लंबे समय तक प्रशिक्षण दिलाना आसान नहीं।
दिए गए शुल्क के अनुसार अलग-अलग खेलों की मासिक फीस कुछ इस तरह बताई गई है—
- तीरंदाजी: 6,000 रुपये प्रतिमाह
- बास्केटबॉल/फुटबॉल: 4,500 रुपये प्रतिमाह, ग्राउंड का किराया अलग
- स्विमिंग: 8,000 रुपये प्रतिमाह
- तलवारबाजी: 12,000 रुपये प्रतिमाह
- लॉन टेनिस: 6,000 रुपये प्रतिमाह, रैकेट अलग
- बैडमिंटन: 6,000 रुपये प्रतिमाह
- टेबल टेनिस: 5,000 रुपये प्रतिमाह
- एथलेटिक्स: 6,000 रुपये प्रतिमाह
- शूटिंग: 15,000 रुपये प्रतिमाह
इन फीस के अलावा खेल के हिसाब से उपकरण, किट, जूते, प्रतियोगिता शुल्क, यात्रा और अन्य खर्च भी परिवारों पर पड़ सकते हैं।
यानी जिस बच्चे में प्रतिभा है, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं, उसके सामने सवाल सिर्फ खेल सीखने का नहीं बल्कि लगातार कई वर्षों तक उस प्रशिक्षण का खर्च उठाने का भी है।
क्या स्टेडियम आम बच्चों से दूर हो रहे हैं?
यहीं से पूरी व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल उठता है। स्टेडियम सार्वजनिक खेल सुविधाओं के रूप में विकसित किए गए हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या वहां प्रशिक्षण का मॉडल ऐसा है, जिसमें प्रतिभाशाली लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को भी मौका मिले?
आरोप है कि मैदान और स्टेडियम की सुविधाओं का इस्तेमाल करने वाली अकादमियां फीस वसूल रही हैं, लेकिन खिलाड़ियों के प्रदर्शन और पदक की जवाबदेही उतनी स्पष्ट नहीं है।
अगर कोच की जिम्मेदारी केवल बच्चों से फीस जमा कराने तक सीमित हो और उसके प्रदर्शन का आकलन खिलाड़ियों के पदक से न हो, तो व्यवस्था में प्रतिभा से ज्यादा कारोबार हावी होने का खतरा पैदा हो जाता है।
चीन और हरियाणा का मॉडल क्यों चर्चा में?
रिपोर्ट में चीन और हरियाणा की खेल व्यवस्था का उदाहरण भी सामने आता है। चीन में कम उम्र से ही प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए सरकारी स्तर पर व्यापक व्यवस्था की चर्चा होती है। वहीं हरियाणा में खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, भोजन और रहने जैसी सुविधाओं के साथ आर्थिक प्रोत्साहन देने की योजनाएं भी चर्चा में रही हैं।
इसके मुकाबले सवाल नोएडा-ग्रेटर नोएडा की व्यवस्था से है—क्या यहां भी आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाओं की पहचान कर उन्हें सरकारी सहायता के साथ उच्चस्तरीय प्रशिक्षण नहीं दिया जा सकता?
सिर्फ स्टेडियम बना देना खेल प्रतिभा तैयार करने के लिए पर्याप्त नहीं है। उसके लिए चयन, प्रशिक्षण, पोषण, उपकरण, प्रतियोगिताओं में भागीदारी और लगातार प्रदर्शन की निगरानी—पूरी व्यवस्था चाहिए।
दादरी से जेवर तक प्रतिभा की तलाश कौन करेगा?
सबसे बड़ा सवाल ग्रामीण क्षेत्र को लेकर है। दादरी, जेवर, दनकौर और रबूपुरा जैसे इलाकों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में भी खेल प्रतिभाएं हो सकती हैं। लेकिन आरोप है कि इन क्षेत्रों में नियमित रूप से प्रतिभा खोजने के लिए ट्रायल या चयन अभियान पर्याप्त स्तर पर नहीं पहुंच पा रहे हैं।
यही वे बच्चे हैं जिनके पास महंगी अकादमी की फीस देने की क्षमता शायद नहीं है, लेकिन खेल के मैदान में खुद को साबित करने की क्षमता हो सकती है।
अगर चयन प्रक्रिया स्टेडियम की फीस भरने की क्षमता से शुरू होगी, तो संभव है कि कई प्रतिभाएं शुरुआत में ही सिस्टम से बाहर हो जाएं।
स्टेडियम में शादियां, खिलाड़ियों के लिए कितनी जगह?
नोएडा-ग्रेटर नोएडा के स्टेडियमों में खेल गतिविधियों के साथ अन्य आयोजनों और शादियों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में मूल सवाल यही है कि इन परिसरों की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए—खेल प्रतिभाओं को तैयार करना या व्यावसायिक आयोजनों से राजस्व जुटाना?
राजस्व जरूरी है, लेकिन यदि सार्वजनिक खेल सुविधाओं का इस्तेमाल इस तरह हो कि नियमित खिलाड़ियों के प्रशिक्षण और मैदान की उपलब्धता प्रभावित हो, तो व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब जरूरत है जवाबदेही की
समस्या का समाधान केवल अकादमियों को बंद करना नहीं है। जरूरत इस बात की है कि प्राधिकरण और संबंधित खेल विभाग एक स्पष्ट सिस्टम तैयार करें।
हर अकादमी के लिए खिलाड़ियों की संख्या, कोच की योग्यता, प्रशिक्षण शुल्क, प्रतियोगिताओं में भागीदारी और पिछले वर्षों के प्रदर्शन का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जा सकता है। आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए फ्री या बेहद कम शुल्क पर प्रशिक्षण की सीटें निर्धारित की जा सकती हैं।
दादरी, जेवर, दनकौर और रबूपुरा के सरकारी स्कूलों में नियमित ट्रायल कैंप लगाए जाएं। बेहतर प्रदर्शन करने वाले बच्चों को स्टेडियमों में मुफ्त प्रशिक्षण, उपकरण और प्रतियोगिताओं तक पहुंच दी जाए।
क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि स्टेडियम कितना शानदार है। असली सवाल यह है कि उस स्टेडियम से कितने खिलाड़ी देश के लिए मेडल लेकर निकल रहे हैं।
अगर करोड़ों की लागत से बने मैदानों में प्रतिभा की जगह सिर्फ फीस की ताकत तय करेगी कि कौन खेलेगा, तो फिर ओलंपिक का सपना उन बच्चों का कैसे पूरा होगा जिनके माता-पिता महंगी अकादमी की फीस नहीं भर सकते?
नोएडा-ग्रेटर नोएडा को सिर्फ स्टेडियम नहीं, एक ऐसा खेल सिस्टम चाहिए जहां खिलाड़ी की पहचान उसकी प्रतिभा से हो—उसके पिता की सैलरी स्लिप से नहीं।
COMMENTS