नोएडा के छिजारसी और चोटपुर के डूब क्षेत्र में कथित अवैध बिजली नेटवर्क के खिलाफ बड़ी कार्रवाई हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 13 हजार अनधिकृत कनेक्शन संचालित होने की बात सामने आई थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के स्तर पर मामला पहुंचने और UPPCL से जवाब-तलब के बाद विद्युत निगम ने अभियान चलाकर करीब 3 हजार कनेक्शन काटे, 10 ट्रांसफॉर्मर और 300 मीटर 11 केवी लाइन जब्त की। शुरुआती कार्रवाई में 19 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। वहीं करीब ₹1.30 करोड़ प्रतिमाह की कथित वसूली का अनुमान भी सामने आया है।
नोएडा के छिजारसी इलाके से सामने आया बिजली का यह मामला सिर्फ बिजली चोरी तक सीमित नहीं दिख रहा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस डूब क्षेत्र में वर्ष 2017 से नए बिजली कनेक्शन पर रोक बताई जा रही है, वहां हजारों घरों तक बिजली का नेटवर्क आखिर कैसे पहुंच गया?
रिपोर्टों के मुताबिक, छिजारसी के डूब क्षेत्र में करीब 13 हजार अनधिकृत बिजली कनेक्शनों का पता चला है, जबकि करीब 3,800 वैध कनेक्शन बताए गए हैं। आरोप है कि निजी स्तर पर मीटर और बिजली नेटवर्क के जरिए लोगों को बिजली उपलब्ध कराई जा रही थी।
मामला CM योगी तक पहुंचा, फिर शुरू हुई ताबड़तोड़ कार्रवाई
इस पूरे मामले की जानकारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने रखे जाने की बात सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के CEO मनोज कुमार सिंह ने छिजारसी में चल रहे कथित अवैध बिजली नेटवर्क का मुद्दा मुख्यमंत्री के सामने उठाया। इसके बाद पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन आशीष गोयल से जवाब मांगा गया।
इसके बाद बिजली विभाग और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई शुरू हुई। अभियान के दौरान करीब 3 हजार अनधिकृत कनेक्शन काटे गए। साथ ही बिजली चोरी और अवैध नेटवर्क से जुड़े लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी शुरू की गई। शुरुआती कार्रवाई में 19 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
10 ट्रांसफॉर्मर और अवैध बिजली नेटवर्क पर चोट
कार्रवाई सिर्फ कनेक्शन काटने तक सीमित नहीं रही। बिजली विभाग ने कथित अवैध नेटवर्क में इस्तेमाल किए जा रहे 10 ट्रांसफॉर्मर भी जब्त किए। इसके साथ ही अवैध तरीके से बिजली आपूर्ति के लिए बिछाए गए तार और नेटवर्क को भी हटाया गया।
यानी जिस समानांतर व्यवस्था के जरिए बिजली पहुंचाए जाने का आरोप है, उसकी बुनियादी संरचना पर ही विभाग ने कार्रवाई शुरू कर दी है।
₹1.30 करोड़ महीने की वसूली का अनुमान, लेकिन रकम की पुष्टि अभी बाकी
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू कथित वसूली है। रिपोर्टों के मुताबिक, यदि करीब 13 हजार अनधिकृत कनेक्शनों से न्यूनतम 1,000 रुपये प्रति कनेक्शन प्रति माह लिए जाने का अनुमान लगाया जाए, तो रकम करीब 1.30 करोड़ रुपये महीने बैठती है।
लेकिन यहां एक बात साफ रखना जरूरी है—₹1.30 करोड़ की रकम अभी वास्तविक रूप से साबित हुई वसूली नहीं है, बल्कि उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर लगाया गया अनुमान है। कथित निजी सिंडिकेट ने वास्तव में कितनी रकम वसूली और इस रकम का पूरा नेटवर्क किसके हाथ में था, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
असली सवाल बिजली विभाग की निगरानी पर भी
मामला यहां सबसे ज्यादा गंभीर हो जाता है। अगर डूब क्षेत्र में नए कनेक्शन पर रोक थी और इसके बावजूद हजारों अनधिकृत कनेक्शन चल रहे थे, तो इतने बड़े नेटवर्क की जानकारी संबंधित बिजली अधिकारियों को कब हुई?
रिपोर्टों में नोएडा बिजली विभाग के मुख्य अभियंता एसके जैन के हवाले से बताया गया है कि वर्ष 2017 में नए कनेक्शन बंद होने के बाद कुछ लोगों ने विभागीय व्यवस्था का अवैध इस्तेमाल कर अपना नेटवर्क तैयार कर लिया। विभाग का यह भी कहना है कि पहले कार्रवाई के बाद कथित तौर पर लाइनें दोबारा जोड़ दी जाती थीं।
यही वजह है कि अब सवाल केवल कथित बिजली चोरों पर कार्रवाई का नहीं है। यह भी जांच का विषय है कि इतने बड़े पैमाने पर अवैध नेटवर्क लंबे समय तक कैसे चलता रहा।
डूब क्षेत्र में अवैध निर्माण और बिजली का कनेक्शन—दोनों पर उठे सवाल
छिजारसी का मामला नोएडा के डूब क्षेत्रों में अवैध निर्माण और अनधिकृत बस्तियों की पुरानी समस्या से भी जुड़ता है। जहां निर्माण को लेकर पहले से सवाल हैं, वहां बिजली जैसी बुनियादी सुविधा का समानांतर नेटवर्क खड़ा होना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है।
हालांकि यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी निर्माण के अवैध होने और किसी बिजली कनेक्शन की कानूनी स्थिति अलग-अलग विषय हैं। इसलिए पूरे इलाके में मौजूद हर उपभोक्ता को बिजली चोर मानना उचित नहीं होगा। विभाग को वैध उपभोक्ताओं और अनधिकृत कनेक्शनों के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए कार्रवाई करनी होगी।
क्या UPPCL के अधिकारी भी जांच के घेरे में आएंगे?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल अब UPPCL और स्थानीय बिजली विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर है। अभी तक उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर अधिकारियों की कथित मिलीभगत को तथ्य के रूप में कहना सही नहीं होगा।
लेकिन जांच यह जरूर तय कर सकती है कि वर्षों तक इतने बड़े पैमाने पर ट्रांसफॉर्मर, तार और कनेक्शन का नेटवर्क कैसे चलता रहा। यदि जांच में किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई जरूरी होगी।
फिलहाल कार्रवाई जारी है। करीब 3 हजार कनेक्शन काटे जा चुके हैं और 10 ट्रांसफॉर्मर जब्त किए गए हैं। दूसरी ओर, बाद की रिपोर्टों में व्यापक अभियान के दौरान 40 FIR दर्ज होने की भी जानकारी सामने आई है, इसलिए कार्रवाई का आंकड़ा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।
अब असली सवाल यही है—अगर 2017 से नए कनेक्शन पर रोक थी, तो फिर हजारों घरों तक बिजली पहुंचाने वाला यह कथित नेटवर्क इतने वर्षों तक आखिर किसके संरक्षण, लापरवाही या निगरानी की कमी से चलता रहा?
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