महिला आरक्षण संशोधन बिल को लेकर संसद में जोरदार टकराव के आसार हैं। टीएमसी के शुरुआती रुख से विपक्ष मुश्किल में दिख रहा था, लेकिन राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद समीकरण बदल गए हैं।
संसद के विशेष सत्र की शुरुआत के साथ ही महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को लेकर राजनीतिक माहौल बेहद गर्म हो गया है। एक तरफ केंद्र सरकार इस बिल को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, तो वहीं विपक्ष इसके कुछ अहम प्रावधानों को लेकर खुलकर विरोध में उतर आया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया, जब विपक्षी एकता टूटती नजर आई और फिर अचानक सब कुछ बदल गया।
दरअसल, यह पूरा मामला “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” से जुड़ा है, जिसे 2023 में पारित किया गया था। अब सरकार इसमें संशोधन कर परिसीमन की शर्त के साथ लागू करना चाहती है। यही शर्त विपक्ष के गले नहीं उतर रही और इसी को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है।
संसद सत्र से एक दिन पहले बुधवार को विपक्षी दलों की एक अहम बैठक हुई। इस बैठक में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने पूरे विपक्ष को असहज स्थिति में ला दिया। तृणमूल कांग्रेस की ओर से यह साफ कर दिया गया कि पश्चिम बंगाल में चल रहे चुनावों के कारण उनके केवल 5 से 7 सांसद ही संसद में वोटिंग के लिए पहुंच पाएंगे।

यह बयान अपने आप में बड़ा संकेत था। टीएमसी जैसे बड़े दल की सीमित मौजूदगी का मतलब था कि विपक्ष की एकजुटता कमजोर पड़ सकती है और इसका सीधा फायदा सत्तारूढ़ पक्ष को मिल सकता है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि विपक्ष अपने ही रणनीतिक असंतुलन के कारण शर्मिंदगी झेल सकता है।
इसी नाजुक मोड़ पर कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने सक्रिय भूमिका निभाई। बैठक में मौजूद सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी टीएमसी के इस रुख से असहज नजर आए। उन्होंने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए यह स्पष्ट किया कि अगर विपक्षी दल इस तरह कम उपस्थिति के साथ जाएंगे, तो यह सीधे-सीधे सरकार को फायदा पहुंचाने जैसा होगा।
राहुल गांधी ने जोर देकर कहा कि यह सिर्फ एक बिल का मुद्दा नहीं, बल्कि विपक्ष की विश्वसनीयता और एकजुटता की परीक्षा है। उनके इस तर्क का असर हुआ और माहौल बदलने लगा।
बैठक के बाद तृणमूल कांग्रेस ने अपने रुख में नरमी दिखाई। Mamata Banerjee की पार्टी ने साफ किया कि वह किसी भी कीमत पर सरकार को फायदा नहीं पहुंचाना चाहती।
टीएमसी की ओर से यह भरोसा दिया गया कि कम से कम 20 सांसद वोटिंग के दौरान मौजूद रहेंगे और इस संख्या को बढ़ाने की कोशिश भी की जाएगी। हालांकि, कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी सामने रखी गईं—जैसे कि सुदीप बंदोपाध्याय की अस्वस्थता, Abhishek Banerjee का चुनावी व्यस्तता में होना और अन्य सांसदों का अपने क्षेत्रों में जरूरी होना।

इसके बावजूद टीएमसी ने यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी मंशा पूरी तरह विपक्ष के साथ खड़े रहने की है।
महिला आरक्षण विधेयक का मूल उद्देश्य लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देना है। लेकिन सरकार ने इसे एक महत्वपूर्ण शर्त के साथ जोड़ा है—परिसीमन।
सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक, यह आरक्षण तब लागू होगा जब नए परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। यानी मौजूदा 543 सीटों पर यह तुरंत लागू नहीं होगा। विपक्ष का कहना है कि अगर महिलाओं को आरक्षण देना ही है, तो मौजूदा सीटों पर ही लागू किया जाए, न कि इसे भविष्य की अनिश्चित प्रक्रिया से जोड़ा जाए।
सरकार का तर्क है कि 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 850 तक की जा सकती है। इसके बाद नए परिसीमन के जरिए सीटों का पुनर्वितरण होगा और फिर महिला आरक्षण लागू किया जाएगा।
इस योजना के तहत 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले इस व्यवस्था को लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का मानना है कि इससे प्रतिनिधित्व ज्यादा संतुलित और प्रभावी होगा।

यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक विधेयक तक सीमित नहीं है। यह विपक्ष की एकजुटता, रणनीति और राजनीतिक ताकत की भी परीक्षा है। अगर टीएमसी जैसे बड़े दल की अनुपस्थिति होती, तो न केवल वोटिंग के नतीजे प्रभावित होते, बल्कि विपक्षी गठबंधन की साख पर भी सवाल उठते।
लोकसभा में इस समय सरकार के पास कुल 293 सांसद हैं, जिनमें बीजेपी के 240 सांसद शामिल हैं। लेकिन संविधान संशोधन विधेयक पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 364 वोटों की जरूरत होती है।
इस हिसाब से सरकार अभी भी 71 वोट पीछे है।
वहीं, विपक्षी गठबंधन के पास करीब 230 से 240 सांसद हैं। इनमें कांग्रेस के 98, समाजवादी पार्टी के 37, टीएमसी के 28 और डीएमके के 22 सांसद शामिल हैं।
अगर विपक्ष पूरी तरह एकजुट रहता है और सभी सांसद मौजूद रहते हैं, तो सरकार के लिए यह बिल पास कराना आसान नहीं होगा।
अब सबकी नजर संसद की कार्यवाही पर टिकी है। क्या विपक्ष अपनी एकजुटता बनाए रख पाएगा? क्या सरकार अपनी रणनीति में बदलाव करेगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या महिला आरक्षण का सपना जल्द हकीकत बनेगा या फिर यह सियासी खींचतान में उलझा रहेगा?
फिलहाल इतना तय है कि संसद का यह सत्र सिर्फ विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सियासी ताकत का भी बड़ा इम्तिहान बनने जा रहा है।
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