ग्रेटर नोएडा के भोगपुर गांव में उस समय तनावपूर्ण माहौल बन गया, जब ग्रामीणों और किसानों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा। गांव के एक ग्राउंड की बदहाल स्थिति को लेकर भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में जोरदार विरोध प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शन का नेतृत्व भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नवीन भाटी ने किया, जिनके साथ बड़ी संख्या में किसान और स्थानीय लोग मौजूद रहे।
दरअसल, भोगपुर गांव में स्थित इस ग्राउंड की देखरेख की जिम्मेदारी शिव नाडर यूनिवर्सिटी (HCL समूह की संस्था) को सौंपी गई थी। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि लंबे समय बीत जाने के बावजूद यहां कोई सुधार कार्य नहीं किया गया। ग्राउंड की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है, जिससे गांव के बच्चों और युवाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
ग्रामीणों के मुताबिक, ग्राउंड में गड्ढे, ऊबड़-खाबड़ सतह और अव्यवस्था के कारण वहां खेलने वाले बच्चे अक्सर चोटिल हो रहे हैं। यह सिर्फ एक खेल का मैदान नहीं, बल्कि गांव के सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा है, जहां बच्चे खेलते हैं और युवा गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं। ऐसे में इसकी बदहाली ने लोगों में नाराजगी को और बढ़ा दिया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मुद्दे को लेकर कई बार संबंधित अधिकारियों और यूनिवर्सिटी प्रशासन को शिकायतें और ज्ञापन दिए गए, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। बार-बार की अनदेखी के बाद आखिरकार किसानों और ग्रामीणों ने विरोध का रास्ता अपनाया।
प्रदर्शन के दौरान नवीन भाटी ने सवाल उठाते हुए कहा कि जब ग्राउंड की जिम्मेदारी ली गई थी, तो अब तक कोई काम क्यों नहीं हुआ। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि क्या गांव के लोगों को अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी सड़क पर उतरना पड़ेगा। उनका यह बयान वहां मौजूद लोगों के गुस्से को और उजागर करता नजर आया।
किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी जमीन और संसाधनों का इस्तेमाल तो किया जाता है, लेकिन बदले में उन्हें मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिलतीं। यही कारण है कि अब वे जवाब चाहते हैं—आखिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
प्रदर्शन के अंत में किसानों ने प्रशासन और संबंधित संस्थाओं को चेतावनी दी कि यदि जल्द ही ग्राउंड की स्थिति में सुधार नहीं किया गया और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। उन्होंने साफ कर दिया कि यह सिर्फ शुरुआत है और जरूरत पड़ने पर बड़ा आंदोलन भी किया जाएगा।
भोगपुर का यह मामला अब सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सवाल खड़ा कर रहा है कि विकास और जिम्मेदारी के दावों के बीच आम लोगों की बुनियादी जरूरतें कब पूरी होंगी।
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