लखनऊ के SGPGIMS में 6 किलोग्राम से कम वजन वाले दो 7 महीने के शिशुओं में रोबोटिक लिवर रिसेक्शन सफलतापूर्वक किया गया। दोनों बच्चे हेपेटोब्लास्टोमा से पीड़ित थे। संस्थान के अनुसार, भारत में इतने कम वजन वाले शिशुओं में इस तरह की रोबोटिक लिवर सर्जरी के ये शुरुआती और संभवतः पहले मामले हैं। दोनों बच्चों की रिकवरी संतोषजनक है और उनकी आगे की कीमोथेरेपी जारी है।
लखनऊ से आई यह खबर सिर्फ दो ऑपरेशन की कहानी नहीं, बल्कि पीडियाट्रिक सर्जरी में बदलती तकनीक की तस्वीर है
सोचिए… उम्र महज 7 महीने, वजन 6 किलो से भी कम, और बीमारी ऐसी जिसमें लिवर के प्रभावित हिस्से को सर्जरी के जरिए निकालना जरूरी हो।
इतने छोटे शरीर में सर्जरी अपने आप में बड़ी चुनौती है। लेकिन लखनऊ के संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी SGPGIMS में डॉक्टरों ने ऐसे ही दो बेहद छोटे मरीजों में रोबोट की मदद से लिवर रिसेक्शन सफलतापूर्वक किया है।
संस्थान के पीडियाट्रिक सर्जिकल सुपर स्पेशलिटीज विभाग के अनुसार, दोनों शिशु हेपेटोब्लास्टोमा से पीड़ित थे। सर्जरी के समय दोनों का वजन 6 किलोग्राम से कम था।
संस्थान की उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, भारत में शिशुओं पर की गई ये पहली रोबोटिक लिवर रिसेक्शन सर्जरी हैं और देश में बच्चों पर की गई शुरुआती कुछ रोबोटिक लिवर रिसेक्शन प्रक्रियाओं में शामिल हैं। हालांकि, इसे संस्थान द्वारा उपलब्ध जानकारी के आधार पर बताया गया है।
पहला मामला—5 किलो के 7 महीने के बच्चे की रोबोटिक सर्जरी
पहला मरीज करीब 5 किलोग्राम वजन वाला 7 महीने का लड़का था। जांच में उसके लिवर के बाएं हिस्से यानी लेफ्ट लोब में हेपेटोब्लास्टोमा पाया गया।
बच्चे को पहले प्री-ऑपरेटिव कीमोथेरेपी दी गई। इसके बाद 5 सितंबर 2026 को SGPGIMS में उसकी रोबोटिक लेफ्ट लेटरल सेक्शनेक्टॉमी की गई।
इस प्रक्रिया में लिवर के बीमारी से प्रभावित बाएं हिस्से को सर्जरी के जरिए हटाया गया।

दूसरा मामला—करीब 6 किलो की बच्ची की भी रोबोटिक सर्जरी
दूसरा मरीज करीब 6 किलोग्राम वजन वाली 7 महीने की बच्ची थी। उसे भी लिवर के बाएं हिस्से में हेपेटोब्लास्टोमा का पता चला था।
बच्ची को नियोएडजुवेंट कीमोथेरेपी देने के बाद 3 अक्टूबर 2026 को SGPGIMS में रोबोटिक लेफ्ट हेपेटेक्टॉमी की गई।
यानी दोनों मामलों में बीमारी के उपचार के लिए लिवर के प्रभावित हिस्से को रोबोटिक तकनीक की सहायता से हटाया गया।
इतने छोटे बच्चों में सर्जरी क्यों थी बड़ी चुनौती?
शिशुओं में लिवर की सर्जरी करना सामान्य परिस्थितियों में भी जटिल माना जाता है। जब मरीज का वजन 6 किलो से कम हो, तो चुनौती और बढ़ जाती है।
पेट के अंदर काम करने के लिए जगह बेहद सीमित होती है। शरीर की संरचनाएं बहुत छोटी और नाजुक होती हैं। लिवर से जुड़ी रक्त वाहिकाएं और पित्त नलिकाएं बेहद पतली होती हैं।
ऐसे में सर्जरी के दौरान रक्तस्राव को नियंत्रित करना और साथ ही लिवर के स्वस्थ हिस्से को सुरक्षित रखना बेहद सटीकता मांगता है।
यही वजह है कि इतने कम वजन वाले शिशुओं में रोबोटिक लिवर रिसेक्शन को तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
रोबोटिक तकनीक से क्या बदला?
पीडियाट्रिक मिनिमली इनवेसिव सर्जरी में रोबोटिक सिस्टम का इस्तेमाल डॉक्टरों को बेहद छोटे स्थान में अधिक सटीकता के साथ काम करने में मदद कर सकता है।

SGPGIMS में लगातार एडवांस्ड मिनिमली इनवेसिव और रोबोटिक पीडियाट्रिक सर्जरी का विस्तार किया जा रहा है। संस्थान में बच्चों से जुड़ी जटिल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, हेपेटोबिलियरी, यूरोलॉजिकल और थोरेसिक प्रक्रियाओं में रोबोटिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है।
इन दो मामलों ने यह दिखाया है कि विशेषज्ञ टीम और उपयुक्त तकनीकी संसाधनों के साथ बेहद कम वजन वाले शिशुओं में भी जटिल रोबोटिक प्रक्रियाओं को अंजाम दिया जा सकता है।
सफलता के पीछे सिर्फ रोबोट नहीं, पूरी टीम की भूमिका
इन दोनों बच्चों का उपचार केवल एक सर्जिकल टीम की कोशिश से संभव नहीं हुआ। SGPGIMS के अनुसार, इसमें पीडियाट्रिक सर्जिकल, पीडियाट्रिक एनेस्थीसिया, पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी, रेडियोडायग्नोसिस और मल्टीडिसिप्लिनरी सपोर्ट टीमों के बीच करीबी समन्वय रहा।
दोनों बच्चों की सर्जरी के बाद रिकवरी संतोषजनक रही है। फिलहाल दोनों बच्चे ठीक बताए जा रहे हैं और उनकी नियोजित एडजुवेंट कीमोथेरेपी जारी है।
भारत में पीडियाट्रिक रोबोटिक सर्जरी के लिए बड़ा संकेत
इन दोनों मामलों को SGPGIMS के लिए ही नहीं, बल्कि भारत में पीडियाट्रिक रोबोटिक सर्जरी के बढ़ते दायरे के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अब तक रोबोटिक सर्जरी को लेकर आम धारणा मुख्य रूप से बड़े मरीजों और अपेक्षाकृत सामान्य प्रक्रियाओं तक सीमित रही है। लेकिन तकनीक और विशेषज्ञता बढ़ने के साथ इसका इस्तेमाल बहुत छोटे बच्चों की जटिल सर्जरी तक पहुंच रहा है।
SGPGIMS की यह उपलब्धि इसी बदलाव की ओर इशारा करती है।
संस्थान का कहना है कि वह बच्चों के इलाज में एडवांस्ड तकनीक को शामिल करते हुए सुरक्षित, सटीक और मिनिमली इनवेसिव पीडियाट्रिक सर्जरी की संभावनाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
दो नन्हे मरीज… 6 किलो से कम वजन… लिवर की बेहद जटिल बीमारी… और रोबोटिक तकनीक के जरिए सफल सर्जरी—लखनऊ का SGPGI इस उपलब्धि के साथ पीडियाट्रिक सर्जरी के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ता नजर आ रहा है।
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