ग्रेटर नोएडा स्थित गवर्नमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (GIMS) में 14 अक्टूबर 2026 को विश्व एनाटॉमी दिवस मनाया गया। कार्यक्रम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में एनाटॉमी की पढ़ाई, कैडेवरिक डिसेक्शन, मेडिकल शिक्षा में देहदान के योगदान और विद्यार्थियों के शैक्षणिक अनुशासन पर विशेष जोर दिया गया।
मेडिकल शिक्षा की दुनिया तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI जहां पढ़ाई के नए रास्ते खोल रहा है, वहीं डॉक्टर बनने की यात्रा में किताबों, प्रयोगात्मक अभ्यास और मानवीय संवेदनाओं का महत्व आज भी उतना ही अहम है। इसी सवाल को केंद्र में रखते हुए ग्रेटर नोएडा स्थित गवर्नमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (GIMS) में विश्व एनाटॉमी दिवस मनाया गया। कार्यक्रम में आधुनिक तकनीक और पारंपरिक शिक्षण पद्धतियों के बीच संतुलन बनाने के साथ-साथ देहदान के महत्व को भी प्रमुखता से सामने रखा गया।
संस्थान के एकेडमिक ब्लॉक स्थित संजीवनी हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य मेडिकल शिक्षा में एनाटॉमी यानी शरीर रचना विज्ञान की अहमियत को रेखांकित करना, पढ़ाई के नए और प्रभावी तरीकों को प्रोत्साहित करना तथा समाज में देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना था।
AI के दौर में एनाटॉमी की पढ़ाई कैसी हो?
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण नई दिल्ली के वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एवं सफदरजंग अस्पताल के एनाटॉमी विभाग की निदेशक एवं प्रोफेसर डॉ. वंदना मेहता का विशेष व्याख्यान रहा। उन्होंने “Learning Anatomy in the Age of AI: Striking the Right Balance” विषय पर अपने विचार साझा किए।

व्याख्यान में इस बात पर जोर दिया गया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीकें एनाटॉमी की पढ़ाई को अधिक प्रभावी और रोचक बनाने में मदद कर सकती हैं, लेकिन इनके साथ पारंपरिक शिक्षण पद्धतियों का महत्व भी बनाए रखना जरूरी है। मेडिकल विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन, कैडेवरिक डिसेक्शन यानी दान किए गए मानव शरीर पर आधारित अध्ययन, प्रायोगिक कक्षाएं और शिक्षकों का मार्गदर्शन चिकित्सा शिक्षा के महत्वपूर्ण आधार हैं।
संदेश स्पष्ट था—तकनीक सीखने का तरीका बेहतर बना सकती है, लेकिन एक कुशल चिकित्सक बनने के लिए गहन अध्ययन, व्यावहारिक अनुभव और अनुभवी शिक्षकों का मार्गदर्शन भी जरूरी है।
निदेशक ने विद्यार्थियों को दिया अनुशासन और मेहनत का संदेश
GIMS के निदेशक डॉ. (ब्रिगेडियर) राकेश कुमार गुप्ता ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विद्यार्थियों को मेहनत करने, अनुशासन बनाए रखने और अपने शैक्षणिक लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित रखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने छात्रों को ऐसी गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी, जो उनकी पढ़ाई से ध्यान भटका सकती हैं और उनके शैक्षणिक एवं व्यावसायिक विकास में बाधा बन सकती हैं।
मेडिकल शिक्षा में नियमित अध्ययन, एकाग्रता और जिम्मेदारी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। निदेशक का संदेश भी इसी दिशा में था कि विद्यार्थियों को अपने लक्ष्य के प्रति गंभीर रहते हुए ज्ञान और कौशल दोनों को मजबूत बनाना चाहिए।
जब कैडेवर बने विद्यार्थियों के ‘पहले शिक्षक’
विश्व एनाटॉमी दिवस के अवसर पर प्रथम वर्ष MBBS के 2026 बैच के विद्यार्थियों ने ऐसे पोस्टर तैयार किए, जिनमें कैडेवर यानी चिकित्सा अध्ययन के लिए दान किए गए मानव शरीर को अपना ‘पहला शिक्षक’ बताया गया।

इन पोस्टरों के माध्यम से विद्यार्थियों ने उन देहदाताओं के अमूल्य योगदान को सम्मान दिया, जिनके दान से भविष्य के चिकित्सकों को मानव शरीर की संरचना समझने और व्यावहारिक ज्ञान हासिल करने का अवसर मिलता है। यह पहल केवल रचनात्मक प्रस्तुति तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने मेडिकल शिक्षा में देहदान की भूमिका और उससे जुड़े नैतिक मूल्यों को भी सामने रखा।
पोस्टर प्रस्तुतियों का मूल्यांकन डॉ. भारती भंडारी और डॉ. एकता अरोड़ा ने किया। उत्कृष्ट पोस्टर बनाने वाले विद्यार्थियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। इस माध्यम से छात्रों की रचनात्मकता और देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उनके प्रयासों को पहचान मिली।
विभागाध्यक्ष के नेतृत्व में हुआ आयोजन
कार्यक्रम का नेतृत्व एनाटॉमी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. रंजना वर्मा ने किया। आयोजन में संस्थान के निदेशक डॉ. (ब्रिगेडियर) राकेश कुमार गुप्ता, डॉ. पी. एस. मित्तल, डॉ. सोनू, डॉ. पी. विनीेल, अन्य विभागाध्यक्ष, संकाय सदस्य, जूनियर रेजिडेंट और प्रथम वर्ष MBBS के विद्यार्थी शामिल हुए।
कार्यक्रम का संचालन एनाटॉमी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सोनू ने मास्टर ऑफ सेरेमनी के रूप में किया। उन्होंने आयोजन की विभिन्न गतिविधियों का समन्वय भी किया।
तकनीक के साथ संवेदनशीलता और नैतिक मूल्यों पर जोर
विश्व एनाटॉमी दिवस का यह आयोजन मेडिकल शिक्षा में अकादमिक उत्कृष्टता, नवाचारपूर्ण शिक्षण पद्धतियों, नैतिक मूल्यों और देहदाताओं के प्रति सम्मान की प्रतिबद्धता को दोहराने का अवसर बना। कार्यक्रम के समापन पर अतिथि वक्ता, संस्थान के नेतृत्व, संकाय सदस्यों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
इस आयोजन ने एक अहम संदेश दिया—चिकित्सा शिक्षा केवल किताबों और तकनीक तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में मानवीय जीवन को समझने की क्षमता, व्यावहारिक ज्ञान और उन देहदाताओं के प्रति सम्मान भी है, जिनका योगदान भविष्य के डॉक्टरों के प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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