लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए चार आरोपियों की गिरफ्तारी और चार अधिकारियों के निलंबन के आदेश दिए हैं। इस बीच सामने आए दस्तावेजों ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस इमारत को वर्ष 2016 में अवैध निर्माण के चलते गिराने का आदेश दिया गया था, उसका आदेश दो महीने के भीतर आखिर क्यों निरस्त कर दिया गया। अब SIT की जांच बड़े अधिकारियों की भूमिका तक पहुंच सकती है।
राजधानी लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड के बाद उत्तर प्रदेश सरकार पूरी तरह एक्शन मोड में दिखाई दे रही है। हादसे में कई लोगों की जान जाने और बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटनास्थल से लेकर अस्पताल और फिर अपने आवास पर उच्चस्तरीय बैठकों के जरिए ताबड़तोड़ फैसले लिए। वहीं अब इस मामले में सामने आए पुराने दस्तावेजों ने जांच को एक नया और गंभीर मोड़ दे दिया है।
सबसे बड़ा सवाल उस भवन को लेकर उठ रहा है, जिसके खिलाफ वर्ष 2016 में अवैध निर्माण के चलते ध्वस्तीकरण का आदेश जारी हुआ था, लेकिन दो माह से भी कम समय में वह आदेश निरस्त कर दिया गया। अब यह मामला केवल एक अग्निकांड नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और संभावित लापरवाही की बड़ी जांच का विषय बन गया है।
अग्निकांड के समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अलीगढ़ में एक सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। मंच से ही उन्हें घटना की जानकारी मिली। जानकारी मिलते ही उन्होंने अपने शेष कार्यक्रम रद्द कर दिए और तत्काल लखनऊ रवाना हो गए।

इससे पहले मुख्यमंत्री ने उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक सहित वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को घटनास्थल पर पहुंचकर राहत एवं बचाव कार्य तेज करने के निर्देश दिए थे।
लखनऊ पहुंचने के बाद मुख्यमंत्री सबसे पहले घटनास्थल पहुंचे, जहां उन्होंने बचाव कार्यों की समीक्षा की। इसके बाद उन्होंने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) पहुंचकर घायलों का हालचाल जाना। अस्पताल में चिकित्सकों से बातचीत कर उन्होंने सभी घायलों को सर्वोत्तम उपचार उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री ने प्रत्येक मृतक के परिजनों को 5-5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। वहीं घायलों को 50-50 हजार रुपये की सहायता राशि देने का भी निर्णय लिया गया।

KGMU से लौटने के बाद मुख्यमंत्री ने पांच कालिदास मार्ग स्थित अपने सरकारी आवास पर उच्चस्तरीय बैठक बुलाई। बैठक में शासन और पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
बैठक में मुख्यमंत्री ने मामले की गहन जांच के लिए दो सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) गठित करने के निर्देश दिए। इस SIT की अगुवाई अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात और अपर पुलिस महानिदेशक (लखनऊ जोन) प्रवीण कुमार करेंगे।
मुख्यमंत्री ने SIT को सात दिनों के भीतर जांच पूरी कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

घटना के संबंध में थाना अलीगंज में अभियोग संख्या 115/2026 दर्ज किया गया है। मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं तथा उत्तर प्रदेश अग्निशमन सेवा अधिनियम के तहत दर्ज किया गया है।
पुलिस ने इस मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
गिरफ्तार आरोपियों में अलीगंज निवासी रामकृष्ण उपाध्याय, बड़ा दुर्गा मंदिर सीतापुर रोड निवासी वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला, बालागंज निवासी तुषॉक कृष्णा जायसवाल तथा मड़ियांव निवासी सुरेश कुमार साहू शामिल हैं।
पुलिस का कहना है कि मामले में अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर तत्काल प्रभाव से चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया।
निलंबित अधिकारियों में जानकीपुरम बिजली विभाग के एक्सईएन (कलेक्शन) गौरव कुमार, फायर विभाग के एफएसएसओ कमलेन्द्र कुमार सिंह, लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के सहायक अभियंता अनिल कुमार तथा जूनियर इंजीनियर प्रमोद पांडे शामिल हैं।
सरकारी सूत्रों का मानना है कि जांच आगे बढ़ने के साथ और भी अधिकारियों की जवाबदेही तय हो सकती है।
अग्निकांड की जांच के बीच जो तथ्य सामने आया है, उसने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।
जिस भवन में हादसा हुआ, उसके खिलाफ वर्ष 2016 में अवैध निर्माण को लेकर ध्वस्तीकरण आदेश जारी किया गया था।

दस्तावेजों के अनुसार अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस-102/डी का मूल आवंटन 11 जुलाई 1980 को विजय कुमार के नाम हुआ था। बाद में यह संपत्ति वर्ष 2005 में विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुई।
इसके बाद 19 जनवरी 2013 को यह भवन वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला के नाम बेचा गया। वर्ष 2014 में लखनऊ विकास प्राधिकरण ने इनके पक्ष में नामांतरण भी कर दिया।
करीब 1992 वर्गफुट क्षेत्रफल वाले इस भवन का मानचित्र 20 अगस्त 2014 को आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था।
हालांकि बाद में भवन में कथित अनधिकृत निर्माण की शिकायतें सामने आईं। इसके बाद LDA ने वर्ष 2016 में मामला दर्ज किया और जांच के बाद 10 मई 2016 को ध्वस्तीकरण आदेश जारी कर दिया गया।
लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह आदेश दो महीने के भीतर ही 5 जुलाई 2016 को निरस्त कर दिया गया।
अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किन परिस्थितियों में ध्वस्तीकरण आदेश वापस लिया गया? क्या उस समय नियमों का पालन हुआ था? और यदि भवन में अनियमितताएं थीं तो बाद में उस पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

अब SIT की जांच केवल आग लगने के कारणों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भवन की स्वीकृति, अवैध निर्माण, फायर सेफ्टी मानकों, प्रशासनिक निगरानी और वर्षों से चली आ रही संभावित लापरवाहियों की भी पड़ताल करेगी।
सूत्रों के अनुसार जांच का दायरा बढ़ने पर कई बड़े अधिकारियों और पूर्व जिम्मेदार पदाधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में आ सकती है।
अलीगंज अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि समय रहते नियमों का पालन कराया गया होता और प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी कार्रवाई हुई होती, तो क्या इतना बड़ा हादसा टाला जा सकता था। अब पूरे प्रदेश की नजर SIT की रिपोर्ट पर टिकी है, जो आने वाले दिनों में कई महत्वपूर्ण खुलासे कर सकती है।
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