भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। हैदराबाद की निजी कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने श्रीहरिकोटा से भारत के पहले निजी ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल 'विक्रम-1' का सफल प्रक्षेपण किया। इस सफलता के साथ भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा देश बन गया है, जहां निजी कंपनी ने सफलतापूर्वक ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च कर पेलोड को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत के नवाचार, युवाओं और अंतरिक्ष सुधारों की ऐतिहासिक उपलब्धि बताया।
18 जुलाई 2026 का दिन भारत के अंतरिक्ष इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग ने वह उपलब्धि हासिल कर ली, जिसका सपना कई वर्षों से देखा जा रहा था। हैदराबाद स्थित निजी स्पेस स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने अपने पहले ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल 'विक्रम-1' का सफल प्रक्षेपण कर भारत को अंतरिक्ष क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
आंध्र प्रदेश के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR), श्रीहरिकोटा से लॉन्च हुए इस रॉकेट ने लगभग 450 किलोमीटर ऊंचाई वाली लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में अपने पेलोड को सफलतापूर्वक स्थापित किया। इस मिशन को 'मिशन आगमन' नाम दिया गया था। इसके साथ ही भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा देश बन गया है, जहां किसी निजी कंपनी ने स्वयं विकसित ऑर्बिटल रॉकेट के जरिए उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया है।
निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि
भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने के बाद यह अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इससे पहले वर्ष 2022 में स्काईरूट एयरोस्पेस ने 'विक्रम-S' नामक सब-ऑर्बिटल रॉकेट का सफल परीक्षण किया था, जिसे 'प्रारंभ' मिशन के नाम से जाना गया। अब 'मिशन आगमन' के जरिए कंपनी ने पूर्ण ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता का सफल प्रदर्शन कर दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सफलता भारत के निजी स्पेस उद्योग को वैश्विक लॉन्च बाजार में मजबूत पहचान दिलाएगी और भविष्य में व्यावसायिक सैटेलाइट लॉन्च सेवाओं के लिए नए अवसर खोलेगी।
क्या है विक्रम-1 की सबसे बड़ी खासियत?
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर विकसित विक्रम-1 पूरी तरह भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया है। लगभग 23 से 24 मीटर लंबे इस लॉन्च व्हीकल को अत्याधुनिक कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से तैयार किया गया है, जिससे इसका वजन कम और क्षमता अधिक हो गई है।
रॉकेट में तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल (OAM) लगाया गया है। यह लगभग 350 किलोग्राम तक के पेलोड को 450 किलोमीटर ऊंची लो-अर्थ ऑर्बिट तथा लगभग 260 किलोग्राम तक के पेलोड को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित करने में सक्षम है।
यह लॉन्च व्हीकल छोटे उपग्रहों के लिए समर्पित (Dedicated) और राइड-शेयर लॉन्च सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।
'डायमंड लोटस' भी पहुंचा अंतरिक्ष
इस ऐतिहासिक मिशन में बेंगलुरु की कंपनी कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा प्रयोगशाला में तैयार किया गया विशेष 'डायमंड लोटस' भी पेलोड के रूप में अंतरिक्ष में भेजा गया। इसके अलावा मिशन के दौरान ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल की विभिन्न तकनीकों का भी सफल परीक्षण किया गया।

PM मोदी ने फोन कर दी बधाई
मिशन की सफलता के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीहरिकोटा स्थित मिशन कंट्रोल सेंटर में मौजूद स्काईरूट एयरोस्पेस की टीम से फोन पर बातचीत कर उन्हें बधाई दी।
प्रधानमंत्री ने कहा कि जब सरकार ने स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोलने का निर्णय लिया था, तब कई तरह की आशंकाएं व्यक्त की गई थीं। लेकिन आज देश के युवाओं ने अपने नवाचार और प्रतिभा के बल पर उन सभी आशंकाओं को गलत साबित कर दिया है।
उन्होंने कहा,
"यह मिशन केवल एक लॉन्च नहीं, बल्कि 'आगमन' है। इस आगमन को अभी बहुत आगे जाना है। देश के नौजवानों पर भरोसा करना चाहिए, वे करके दिखाते हैं।"
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि विक्रम-1 भारत के नवाचार, उद्यमशीलता और वर्ष 2020 में किए गए अंतरिक्ष सुधारों की सफलता का प्रतीक है।
'वंदे मातरम्' भी पहुंचा ऑर्बिट में
प्रधानमंत्री मोदी ने स्काईरूट टीम को 'वंदे मातरम्' लिखा हुआ एक विशेष पोस्टकार्ड भी भेजा था। मिशन की सफलता के बाद स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक एवं CEO पवन कुमार चंदाना ने प्रधानमंत्री से कहा,
"सर, आपका 'वंदे मातरम्' अब ऑर्बिट में है।"

उन्होंने इस मिशन को भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग के लिए भी ऐतिहासिक क्षण बताया और कहा कि पूरा रॉकेट भारतीय इंजीनियरों द्वारा भारत में विकसित किया गया है।
पूर्व ISRO प्रमुख ने भी दी शुभकामनाएं
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ ने स्काईरूट की पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह केवल एक रॉकेट का परीक्षण नहीं, बल्कि भारत की निजी रॉकेट निर्माण क्षमता का वास्तविक आगमन है। उनके अनुसार इस सफलता से भारतीय उद्योग, स्टार्टअप और वैश्विक स्पेस इकोनॉमी में भारत की भूमिका और मजबूत होगी।
कमर्शियल स्पेस सेक्टर को मिलेगा बड़ा फायदा
विशेषज्ञों का मानना है कि विक्रम-1 की सफलता के बाद भारत वैश्विक छोटे उपग्रह लॉन्च बाजार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर सकता है। अर्थ ऑब्जर्वेशन, कम्युनिकेशन, वैज्ञानिक अनुसंधान और टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन मिशनों के लिए समर्पित लॉन्च सेवाओं की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में स्काईरूट जैसी भारतीय कंपनियों के लिए नए व्यावसायिक अवसर खुलेंगे और भारत की स्पेस इकोनॉमी को नई गति मिलेगी।
वर्ष 2022 के 'प्रारंभ' मिशन से लेकर 2026 के 'आगमन' मिशन तक का सफर यह साबित करता है कि भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र अब केवल प्रयोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक लॉन्च सेवाओं में प्रतिस्पर्धा करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
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