पश्चिम बंगाल में जैश-ए-मोहम्मद से कथित संबंध रखने वाले एक संदिग्ध नेटवर्क के खुलासे के बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। बर्धमान से गिरफ्तार किए गए संदिग्ध मोहम्मद हामिम मंडल और झारखंड से पकड़ी गई अर्पिता सरकार से पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इस नेटवर्क का इस्तेमाल राजनीतिक हस्तियों को हनी ट्रैप में फंसाने और संवेदनशील सूचनाएं हासिल करने के लिए किया जा रहा था।
पश्चिम बंगाल में सुरक्षा एजेंसियों ने एक ऐसे मामले का खुलासा किया है, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर खुफिया एजेंसियों तक सभी को सतर्क कर दिया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह मामला केवल एक संदिग्ध व्यक्ति की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार एक बड़े नेटवर्क से जुड़े हो सकते हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, जैश-ए-मोहम्मद से कथित तौर पर जुड़े संदिग्ध ऑपरेटिव मोहम्मद हामिम मंडल को 30 जुलाई को पश्चिम बंगाल के बर्धमान शहर से गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद झारखंड के साहिबगंज से अर्पिता सरकार नाम की एक महिला को हिरासत में लिया गया।
जांच अधिकारियों का दावा है कि अर्पिता सरकार और मोहम्मद हामिम मंडल के बीच लंबे समय से संपर्क था और दोनों के बीच सोशल मीडिया तथा व्हाट्सऐप के माध्यम से लगातार बातचीत हो रही थी।
बर्धमान से शुरू हुई जांच
पश्चिम बंगाल एसटीएफ को काफी समय से एक संदिग्ध नेटवर्क के सक्रिय होने की जानकारी मिल रही थी। जांच के दौरान पता चला कि बर्धमान शहर के एक आवासीय परिसर में रहने वाला मोहम्मद हामिम मंडल कई संदिग्ध गतिविधियों में शामिल था।
इसके बाद एसटीएफ की टीम ने छापेमारी करके उसे गिरफ्तार कर लिया। जांच एजेंसियों को संदेह है कि वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े नेटवर्क के संपर्क में था।
हालांकि, अभी तक इस संबंध में कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है और जांच जारी है।
अर्पिता सरकार की भूमिका पर उठे सवाल
मामले में सबसे अधिक चर्चा झारखंड की रहने वाली अर्पिता सरकार को लेकर हो रही है। जांच एजेंसियों के मुताबिक, वह संदिग्ध ऑपरेटिव की करीबी सहयोगी थी।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अर्पिता सरकार कथित तौर पर प्रभावशाली लोगों के साथ संपर्क स्थापित करने और उनके बारे में जानकारी जुटाने का काम कर रही थी।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या यह नेटवर्क किसी सुनियोजित हनी ट्रैप अभियान का हिस्सा था।
नेताओं की गतिविधियों पर रखी जा रही थी नजर
जांच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, संदिग्ध नेटवर्क का उद्देश्य राजनीतिक नेताओं और अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों की गतिविधियों पर नजर रखना था।
सूत्रों के मुताबिक, कुछ नेताओं के कार्यक्रमों, उनके यात्रा मार्गों और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी जानकारियां जुटाने की कोशिश की जा रही थी।
इस मामले में कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और डिजिटल रिकॉर्ड की भी जांच की जा रही है।
व्हाट्सऐप चैट से मिले अहम सुराग
जांच के दौरान पुलिस को कई डिजिटल साक्ष्य मिले हैं। इनमें मोबाइल फोन, सोशल मीडिया रिकॉर्ड और व्हाट्सऐप चैट शामिल हैं।
अधिकारियों का कहना है कि इन चैट के आधार पर कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। फिलहाल साइबर विशेषज्ञ इन आंकड़ों का विश्लेषण कर रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में बढ़ी हलचल
इस मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया है। विपक्षी दलों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
वहीं, सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि आखिर इस नेटवर्क के पीछे कौन लोग सक्रिय थे और उनका अंतिम उद्देश्य क्या था।
सबसे बड़ा सवाल अब भी बरकरार
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं।
क्या यह केवल जासूसी का मामला था या फिर इसके पीछे कोई बड़ा षड्यंत्र छिपा हुआ है?
क्या राजनीतिक नेताओं और प्रभावशाली लोगों को निशाना बनाने के लिए हनी ट्रैप का इस्तेमाल किया जा रहा था?
क्या यह नेटवर्क देश के दूसरे राज्यों में भी सक्रिय था?
इन सभी सवालों के जवाब आने वाले दिनों में जांच पूरी होने के बाद ही सामने आ पाएंगे।
सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड पर
पश्चिम बंगाल एसटीएफ, साइबर विशेषज्ञों और अन्य केंद्रीय एजेंसियों की टीमें इस मामले की जांच में जुटी हुई हैं। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
हालांकि, इतना जरूर स्पष्ट हो गया है कि आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं।
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