होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव के बीच भारत द्वारा युआन में तेल खरीदने की खबर वायरल हुई, लेकिन विदेश मंत्रालय ने इसे फेक बताते हुए सच्चाई सामने रखी।
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में तेल टैंकरों की आवाजाही को लेकर उठे विवाद के बीच एक बड़ी खबर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही थी—कि भारत ने ईरान से तेल खरीदने के लिए चीनी मुद्रा युआन में भुगतान किया है। लेकिन अब इस दावे पर भारत सरकार ने स्पष्ट जवाब दे दिया है।
दरअसल, हाल ही में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के चलते होर्मुज स्ट्रेट—जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है—पर स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। इसी बीच खबरें सामने आईं कि ईरान ने अल्टीमेटम जारी करते हुए कहा है कि केवल वही तेल टैंकर इस मार्ग से गुजर पाएंगे, जो भुगतान अमेरिकी डॉलर के बजाय चीनी युआन में करेंगे।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कई यूजर्स ने दावा किया कि भारत ने इस शर्त को मानते हुए युआन में भुगतान किया है, ताकि उसके फंसे हुए तेल टैंकर सुरक्षित बाहर निकल सकें। रिपोर्ट्स के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट के पास भारत के झंडे वाले करीब 22 जहाज फंसे हुए हैं, जिनमें लगभग 17 लाख टन कच्चा तेल, LNG और PNG लदा हुआ है।
हालांकि, इन सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि युआन में भुगतान करने की खबर पूरी तरह गलत और भ्रामक है। सरकार ने ऐसी किसी भी आधिकारिक नीति या फैसले से इनकार किया है।
गौरतलब है कि एक अंतरराष्ट्रीय इंटरव्यू में ईरान के एक अधिकारी ने संकेत दिया था कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने के लिए अमेरिकी डॉलर के बजाय चीनी युआन में भुगतान स्वीकार करने पर विचार किया जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान सीमित संख्या में टैंकरों को ही इस शर्त पर अनुमति देने की योजना बना रहा है, और इसके लिए करीब 20 लाख डॉलर तक की फीस भी वसूली जा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अमेरिका के पेट्रोडॉलर सिस्टम को चुनौती देने की दिशा में एक बड़ा प्रयास हो सकता है। दशकों से वैश्विक तेल व्यापार अमेरिकी डॉलर में ही होता आया है, जिससे अमेरिका की आर्थिक पकड़ मजबूत बनी रहती है।

इसी बीच भारत लगातार कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची के बीच बातचीत जारी है, जिसमें क्षेत्रीय तनाव और तेल आपूर्ति पर चर्चा हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस मामले में लगातार संपर्क बनाए हुए हैं।
सोशल मीडिया पर इस पूरे मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ यूजर्स इसे भारत की मजबूत कूटनीति का संकेत मान रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि भारत के सभी प्रमुख देशों—ईरान, इजरायल, अमेरिका, यूएई, सऊदी अरब और कतर—से अच्छे संबंध हैं, जिससे वह संतुलन बनाए रखने में सफल रहा है।
वहीं, वैश्विक स्तर पर पेट्रोडॉलर सिस्टम को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। आंकड़ों के अनुसार, ओपेक देशों के तेल निर्यात से होने वाली कमाई में पिछले कुछ वर्षों में गिरावट आई है। 2022 में जहां यह 746 बिलियन डॉलर थी, वहीं 2025 तक इसके घटकर लगभग 455 बिलियन डॉलर रहने का अनुमान है।
इतिहास पर नजर डालें तो 1970 के दशक में पेट्रोडॉलर सिस्टम शुरू हुआ था, जिसमें तेल का व्यापार डॉलर में करने से वैश्विक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने की बात कही गई थी। लेकिन 2018 में चीन ने ‘पेट्रोयुआन’ की शुरुआत कर इस व्यवस्था को चुनौती दी। रूस भी डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठा चुका है।
ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों ने पहले ही डॉलर से अलग हटकर तेल व्यापार में अन्य मुद्राओं का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, हालांकि इसके चलते उन्हें अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना भी करना पड़ा है।
फिलहाल, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि युआन में भुगतान की खबरें निराधार हैं। लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में जारी तनाव और वैश्विक तेल बाजार में हो रहे बदलाव आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक समीकरणों को जरूर प्रभावित कर सकते हैं।
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