मिडिल ईस्ट में तनाव खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने हिजबुल्लाह के साथ मिलकर इजरायल पर बड़े हमले का दावा किया है। वहीं फारस की खाड़ी में दो ऑयल टैंकरों पर हमला हुआ है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में भी उथल-पुथल देखने को मिल रही है।
मिडिल ईस्ट में एक बार फिर हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं और क्षेत्र में बड़े संघर्ष की आशंका बढ़ती जा रही है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने लेबनान के संगठन हिजबुल्लाह के साथ मिलकर इजरायल पर एक बड़ा संयुक्त हमला किया है। इस हमले के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और भी बढ़ गया है।
आईआरजीसी के अनुसार यह हमला लगभग पांच घंटे तक लगातार चला, जिसमें मिसाइल, रॉकेट और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। संगठन ने दावा किया कि इजरायल के अलग-अलग हिस्सों में 50 से ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाया गया। बयान के मुताबिक इस ऑपरेशन में ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों का उपयोग किया, जबकि हिजबुल्लाह ने बड़े पैमाने पर रॉकेट और अटैक ड्रोन दागे।
हमले के दायरे में इजरायल के कई महत्वपूर्ण शहर शामिल बताए जा रहे हैं। आईआरजीसी ने कहा कि उत्तरी शहर हाइफा से लेकर तेल अवीव और दक्षिण के बेर्शेबा तक कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। इजरायली सेना ने भी इस बात की पुष्टि की है कि ईरान और हिजबुल्लाह ने एक ‘कोऑर्डिनेटेड मिसाइल अटैक’ किया, जिसका मुख्य निशाना मध्य इजरायल था।
इस बढ़ते संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। मिडिल ईस्ट दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है और यहां तनाव बढ़ने से तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ जाती है।

इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल बाजार को स्थिर रखने के लिए बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने अमेरिका के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) से 172 मिलियन बैरल तेल जारी करने की मंजूरी दे दी है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार यह प्रक्रिया अगले सप्ताह से शुरू होगी और लगभग 120 दिनों में यह तेल बाजार में पहुंच जाएगा।
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री ने यह भी बताया कि अमेरिका अगले एक साल में लगभग 200 मिलियन बैरल तेल दोबारा अपने रिजर्व में जोड़ने की योजना बना रहा है। यह मात्रा निकाले गए तेल से करीब 20 प्रतिशत अधिक होगी। विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका है।
इस बीच फारस की खाड़ी में दो विदेशी ऑयल टैंकरों पर हमले की बड़ी घटना सामने आई है। इराकी पोर्ट्स कंपनी के प्रमुख फरहान अल-फार्तूसी के अनुसार हमले के बाद दोनों जहाजों में आग लग गई। बचाव अभियान के दौरान जहाजों से 38 चालक दल के सदस्यों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, लेकिन इस घटना में कम से कम एक व्यक्ति की मौत हो गई।
अधिकारियों के अनुसार जिन जहाजों को निशाना बनाया गया उनमें माल्टा के झंडे वाला “जेफिरोस” और मार्शल आइलैंड्स का “सेफसी विष्णु” शामिल हैं। फिलहाल विस्फोट की वास्तविक वजह स्पष्ट नहीं हो सकी है। हालांकि सुरक्षा सूत्रों को शक है कि विस्फोटकों से लैस एक ईरानी नाव इन जहाजों से टकराई हो सकती है। इस मामले की जांच अभी जारी है।

इस घटनाक्रम के बीच ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा ठिकानों पर हमलों की एक नई लहर भी शुरू कर दी है। इन हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई है। कई देशों ने संभावित संकट को देखते हुए अपने रणनीतिक तेल भंडार से रिकॉर्ड मात्रा में तेल जारी करना शुरू कर दिया है।
ईरान ने अपने पड़ोसी खाड़ी देशों और इजरायल पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। तेहरान ने चेतावनी दी है कि अगर यह युद्ध लंबा चला तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
हालांकि इस तनाव के बीच भारत के लिए एक राहत भरी खबर भी सामने आई है। ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत के बाद भारतीय झंडे वाले तेल टैंकरों को हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दे दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार “पुष्पक” और “परिमलनाम” नाम के भारतीय टैंकर सुरक्षित रूप से हॉर्मुज से गुजर गए हैं।
हॉर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है और भारत की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। मौजूदा तनाव के कारण अमेरिका, यूरोप और इजरायल से जुड़े जहाजों पर अभी भी पाबंदियां जारी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मिडिल ईस्ट में यह संघर्ष और बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।
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