CBSE के नए ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि CBSE ने अपनी ही गवर्निंग बॉडी की सलाह को नजरअंदाज कर बिना पायलट प्रोजेक्ट के सिस्टम लागू किया, जिससे लाखों छात्रों और शिक्षकों को परेशानी झेलनी पड़ी। इसी के साथ शिक्षा मंत्रालय और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर शिक्षा संस्थाओं की बैठकों को नजरअंदाज करने और विशेषज्ञ सलाह को अनसुना करने के आरोप तेज हो गए हैं।
CBSE के OSM सिस्टम पर बड़ा खुलासा, उठे गंभीर सवाल
देश की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। क्लास 12 बोर्ड परीक्षाओं के मूल्यांकन के लिए इस साल लागू किए गए नए ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (OSM) को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, CBSE ने इस डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को लागू करने से पहले अपनी ही गवर्निंग बॉडी के कुछ सदस्यों की सलाह को नजरअंदाज कर दिया। बताया गया कि सदस्यों ने सुझाव दिया था कि इस सिस्टम को पहले क्षेत्रीय कार्यालयों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू किया जाए ताकि तकनीकी और प्रशासनिक समस्याओं का परीक्षण किया जा सके।
लेकिन आरोप है कि इस सलाह पर अमल नहीं किया गया और सीधे बड़े स्तर पर सिस्टम लागू कर दिया गया। नतीजतन, लाखों छात्रों, परीक्षकों और स्कूलों को कई तरह की तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
क्या है OSM सिस्टम और क्यों हुआ विवाद?
OSM यानी On-Screen Marking System एक डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली है, जिसमें उत्तर पुस्तिकाओं की जांच कंप्यूटर स्क्रीन पर की जाती है। CBSE का दावा था कि इससे मूल्यांकन प्रक्रिया तेज, पारदर्शी और अधिक सटीक होगी।
हालांकि सिस्टम लागू होने के बाद कई परीक्षकों ने तकनीकी समस्याओं की शिकायत की। इनमें सर्वर डाउन होना, लॉगिन दिक्कतें, कॉपियों का समय पर अपलोड न होना और मार्किंग प्रक्रिया में रुकावट जैसी समस्याएं शामिल थीं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या बिना पर्याप्त तैयारी और परीक्षण के यह सिस्टम लागू कर दिया गया?

शिक्षा मंत्रालय की कार्यशैली पर विपक्ष का हमला
इस पूरे विवाद के बाद विपक्ष ने सीधे केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और शिक्षा मंत्रालय की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
आरोप लगाया जा रहा है कि मंत्रालय लगातार विशेषज्ञों और सलाहकार संस्थाओं की राय को नजरअंदाज कर रहा है और फैसले केंद्रीकृत तरीके से लिए जा रहे हैं।
विपक्ष का कहना है कि यह सिर्फ OSM विवाद नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में बढ़ते प्रशासनिक अहंकार का संकेत है।
NTA को लेकर भी घिरा मंत्रालय
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में NEET, CUET और अन्य राष्ट्रीय परीक्षाओं में गड़बड़ियों और तकनीकी समस्याओं को लेकर लगातार विवाद हुए हैं।
संसदीय स्थायी समिति ने NTA को मजबूत करने के लिए कई सिफारिशें दी थीं। लेकिन आरोप है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने सार्वजनिक रूप से इन सिफारिशों को यह कहकर खारिज कर दिया कि समिति में विपक्ष के सदस्य भी शामिल हैं।
इस बयान के बाद विपक्ष ने आरोप लगाया कि शिक्षा जैसे गंभीर मुद्दे पर भी राजनीतिक दृष्टिकोण हावी हो रहा है।
CABE की बैठक 2019 के बाद नहीं हुई
शिक्षा नीति से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण सलाहकार संस्थाओं में से एक Central Advisory Board of Education यानी CABE को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
CABE एक ऐसा मंच है जहां केंद्र और राज्यों के शिक्षा मंत्री तथा वरिष्ठ अधिकारी शिक्षा नीति और सुधारों पर चर्चा करते हैं। लेकिन जानकारी के मुताबिक 2019 के बाद से इसकी बैठक नहीं बुलाई गई है।
दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में खुद सरकार ने CABE को मजबूत करने की बात कही थी। अब विपक्ष सवाल उठा रहा है कि जब नीति में इस संस्था को अहम बताया गया था, तो फिर इसे सक्रिय क्यों नहीं रखा गया?
NITSER परिषद की बैठक छह साल तक नहीं
देश के NITs और IISERs जैसे प्रमुख संस्थानों से जुड़ी NITSER परिषद को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं।
बताया गया है कि सितंबर 2019 से जनवरी 2026 तक इस परिषद की बैठक नहीं हुई। जबकि इससे पहले यह परिषद नियमित रूप से हर छह महीने में बैठक करती थी।
जनवरी 2026 में बैठक आयोजित हुई जरूर, लेकिन आरोप है कि उसके मीटिंग मिनट्स आज तक प्रतिभागियों को उपलब्ध नहीं कराए गए।

IIM Coordination Forum पर भी सवाल
IIM Act 2017 के तहत बनाए गए IIM Coordination Forum को कानून के मुताबिक हर साल कम-से-कम एक बार बैठक करनी चाहिए। लेकिन जानकारी के अनुसार यह फोरम पहली बार मई 2026 में मिला, यानी कानून बनने के लगभग नौ साल बाद।
इस फोरम की अध्यक्षता भी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान करते हैं। विपक्ष इसे प्रशासनिक उदासीनता का उदाहरण बता रहा है।
IIIT Council भी वर्षों से निष्क्रिय
IIIT संस्थानों से जुड़ी IIIT Council की आखिरी बैठक 2019 में हुई थी। इसके बाद से परिषद की कोई नियमित बैठक सामने नहीं आई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा संस्थानों के बीच संवाद और नीति समन्वय के लिए ऐसी परिषदों का सक्रिय रहना बेहद जरूरी होता है।
इस्तीफे की मांग तेज
इन सभी मुद्दों को लेकर अब विपक्ष ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग तेज कर दी है।
आरोप लगाए जा रहे हैं कि मंत्रालय छात्र हितों के प्रति संवेदनशील नहीं रहा और शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता तथा संवाद की कमी बढ़ी है।
हालांकि सरकार की ओर से अब तक इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
शिक्षा व्यवस्था पर भरोसे का सवाल
पूरा विवाद अब सिर्फ प्रशासनिक फैसलों तक सीमित नहीं रह गया है। यह देश की शिक्षा व्यवस्था में भरोसे और जवाबदेही का मुद्दा बनता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल बदलाव और शिक्षा सुधार जरूरी हैं, लेकिन उन्हें लागू करने से पहले पर्याप्त तैयारी, परीक्षण और विशेषज्ञों से संवाद बेहद आवश्यक है।
क्योंकि किसी भी नीति या तकनीकी बदलाव का सीधा असर करोड़ों छात्रों और उनके भविष्य पर पड़ता है।
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