लखनऊ स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) ने अपना 67वां स्थापना दिवस मनाते हुए आयुष अनुसंधान, किसान उन्नति और MSME सहयोग को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण समझौते किए।
लखनऊ में स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) ने शुक्रवार को उत्साह, नव संकल्प और वैज्ञानिक उपलब्धियों के गौरव के साथ अपना 67वां स्थापना दिवस मनाया। यह अवसर न केवल संस्थान की छह दशकों से अधिक की उत्कृष्ट वैज्ञानिक यात्रा का प्रतीक रहा, बल्कि भविष्य की दिशा में नवाचार, अनुसंधान और सहयोग की नई संभावनाओं का भी संकेतक बना।
कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ, जिसके बाद वैज्ञानिक-जी डॉ. संजय कुमार ने कार्यक्रम का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। इस आयोजन में देशभर से प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया और औषधीय एवं सगंध पौधों के क्षेत्र में सीमैप के योगदान पर विचार साझा किए।
वैज्ञानिक दृष्टि और प्रेरणा का संदेश
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. अनिल कुमार त्रिपाठी, जो भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर), मोहाली के निदेशक और सीमैप के पूर्व निदेशक रह चुके हैं, ने “जिज्ञासा, आविष्कार और नवाचार के ज़रिये मानव सभ्यता की विकास यात्रा” विषय पर स्थापना दिवस व्याख्यान दिया।
अपने संबोधन में उन्होंने सीमैप द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किए गए प्रभावी कार्यों की सराहना की और विशेष रूप से किसानों के साथ अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्हें प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि संस्थान के सतत प्रयासों से किसानों की आजीविका में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जिससे सीमैप को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और उसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
डॉ. त्रिपाठी ने विज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति पर बल देते हुए कहा कि अब केवल अन्वेषण ही नहीं, बल्कि नवाचार और आविष्कार की दिशा में आगे बढ़ना समय की आवश्यकता है, जो ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होगा।

वैज्ञानिक संस्थानों की भूमिका पर जोर
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. ज्योति यादव, प्रमुख, भर्ती एवं मूल्यांकन बोर्ड, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर), ने अपने विचार रखते हुए कहा कि वैज्ञानिक संस्थान देश के विकास, नवाचार और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आज के समय में अनुसंधान को समाज और उद्योग से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है, ताकि उसका लाभ सीधे आम जनता तक पहुंच सके।
संस्थान की उपलब्धियां और भविष्य की दिशा
अपने स्वागत भाषण में डॉ. ज़बीर अहमद, निदेशक, सीमैप ने संस्थान की प्रमुख उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने अत्याधुनिक अनुसंधान, किसान संपर्क कार्यक्रमों और विशेष रूप से ‘अरोमा मिशन’ जैसे राष्ट्रीय अभियानों में संस्थान की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि सीमैप अपनी समृद्ध विरासत को संजोते हुए भविष्य में और अधिक प्रभावशाली योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए उन्होंने सभी हितधारकों के बीच सामूहिक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।
एमओयू से मजबूत हुआ सहयोग
इस स्थापना दिवस समारोह का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण विभिन्न समझौता ज्ञापनों (एमओयू) का आदान-प्रदान रहा, जिसने संस्थान के सहयोगात्मक अनुसंधान और उद्योग साझेदारी को नई मजबूती प्रदान की।
सीमैप ने केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच), नई दिल्ली के साथ एक महत्वपूर्ण अनुसंधान सहयोग स्थापित किया। इस समझौते के तहत चयनित होम्योपैथिक औषधियों की स्थिरता और शेल्फ-लाइफ का अध्ययन ICH Q1A (R2) दिशानिर्देशों के अनुसार किया जाएगा। यह पहल आयुष क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रमाणिकता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

इसके अलावा, टीबीआईसी प्लेटफॉर्म के अंतर्गत ‘विमला एंड कंपनी’ और सीमैप के बीच “क्लीन जर्म” नामक हर्बल फ्लोर क्लीनर के व्यावसायीकरण हेतु भी एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए। यह उत्पाद पर्यावरण-अनुकूल और स्वदेशी समाधान को बढ़ावा देने की दिशा में एक अभिनव प्रयास है, जो MSME क्षेत्र को भी नई ऊर्जा देगा।
प्रकाशन और जनसंपर्क पहल
इस अवसर पर सीमैप द्वारा ‘औस विज्ञान’ अंक-9, 2026 का विमोचन भी किया गया, जिसमें संस्थान की नवीनतम वैज्ञानिक उपलब्धियों और जनसंपर्क गतिविधियों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. संजय कुमार और डॉ. सुम्या पाठक ने संयुक्त रूप से किया, जबकि समापन पर डॉ. अरविंद सिंह नेगी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
समाज से जुड़ाव का प्रयास
स्थापना दिवस के अवसर पर संस्थान को किसानों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों के लिए भी खुला रखा गया। इस पहल का उद्देश्य समाज के साथ व्यापक संवाद और सहभागिता को प्रोत्साहित करना था, जिससे वैज्ञानिक अनुसंधान का लाभ सीधे जनता तक पहुंच सके।
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