उत्तर प्रदेश की खेती में बड़ा बदलाव लाने की तैयारी शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में यूपी-एग्रीज परियोजना के तहत कई अहम एमओयू हुए हैं। लक्ष्य सिर्फ फसल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि तकनीक, डिजिटल नेटवर्क, जलवायु अनुकूल खेती, बेहतर बाजार और वैल्यू एडिशन के जरिए किसानों की आय बढ़ाना है।
उत्तर प्रदेश की खेती अब सिर्फ हल, बीज और मौसम के भरोसे नहीं रहने वाली है। खेतों तक डेटा साइंस पहुंचेगी, किसानों को एक डिजिटल नेटवर्क के जरिए मौसम और बाजार की जानकारी मिल सकेगी और खेती को उत्पादन से आगे बढ़ाकर प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन और निर्यात से जोड़ने की तैयारी है। इसी बड़े बदलाव की तस्वीर बुधवार को लखनऊ में सामने आई, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में विश्व बैंक वित्तपोषित उत्तर प्रदेश एग्रीकल्चर ग्रोथ एंड रूरल एंटरप्राइज इकोसिस्टम स्ट्रेंथनिंग यानी यूपी-एग्रीज परियोजना के तहत कई महत्वपूर्ण समझौते किए गए।
यूपीडीएएसपी यानी उत्तर प्रदेश विविधीकृत कृषि सहायता परियोजना ने गूगल एवं नेटवर्क फॉर ह्यूमैनिटी, आईटीसी और एक्वाब्रिज के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किए। सरकार का दावा है कि यह साझेदारी पूर्वी उत्तर प्रदेश के 21 जिलों और बुंदेलखंड के 7 जिलों में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यूपी-एग्रीज का उद्देश्य केवल फसल उत्पादन बढ़ाना नहीं है। सरकार खेती को ऐसी व्यवस्था से जोड़ना चाहती है, जहां किसान की लागत कम हो, उसे आधुनिक तकनीक मिले, मौसम की चुनौतियों से निपटने की क्षमता बढ़े और उसकी फसल को बेहतर बाजार भी उपलब्ध हो।

उन्होंने कहा कि दशकों तक किसानों की जय-जयकार तो होती रही, उत्पादन बढ़ाने की बातें भी की गईं, लेकिन किसान के सामने कई बुनियादी सवाल बने रहे। लागत कैसे घटेगी, उपज कौन खरीदेगा और फसल को बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था कैसे होगी, इस दिशा में अपेक्षित काम नहीं हो पाया। यूपी-एग्रीज परियोजना इन्हीं सवालों का व्यावहारिक समाधान तलाशने का प्रयास है।
लगभग 4,000 करोड़ रुपये की विश्व बैंक समर्थित परियोजना का मुख्य फोकस पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड पर रखा गया है। इन दोनों क्षेत्रों के 28 जिलों के 123 विकास खंडों में इसे लागू किया जा रहा है। सरकार के अनुसार परियोजना के जरिए करीब 6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र, 10 लाख किसानों, 35 हजार मत्स्य उत्पादक किसानों और 3 लाख महिलाओं तक पहुंचने का लक्ष्य है।
खरीफ सत्र 2026 में अब तक करीब 1.75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को परियोजना के दायरे में शामिल किया गया है। वहीं रबी सीजन 2026-27 में भी इतने ही क्षेत्र में गेहूं, मटर, चना, मसूर और सरसों जैसी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार किसान को केवल उत्पादक के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक कृषि अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण साझेदार बनाना चाहती है। इसी सोच के तहत वैज्ञानिक और जलवायु अनुकूल खेती की तकनीकों को खेतों तक पहुंचाने की तैयारी की जा रही है। खरीफ 2026 में लगभग 3,000 हेक्टेयर क्षेत्र में डायरेक्ट सीडेड राइस यानी डीएसआर तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। इसके अलावा धान के साथ मक्का, बाजरा, ज्वार, अरहर, तिल, उड़द और मूंगफली जैसी फसलों को भी कार्ययोजना में शामिल किया गया है।

इस पूरी योजना का एक बड़ा और दिलचस्प हिस्सा कृषि का डिजिटल नेटवर्क है। गूगल और नेटवर्क फॉर ह्यूमैनिटी के साथ मिलकर ओपन नेटवर्क फॉर एग्रीकल्चर विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसका विचार यूपीआई और ओएनडीसी जैसे ओपन डिजिटल नेटवर्क मॉडल से प्रेरित बताया गया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि किसान को मौसम, बाजार भाव, मिट्टी, कृषि सलाह और अन्य एग्रीटेक सेवाओं के लिए अलग-अलग ऐप और प्लेटफॉर्म पर भटकना न पड़े। भविष्य में एक ही इंटरफेस के माध्यम से किसानों को कई जरूरी सेवाओं तक पहुंच देने की योजना है। साथ ही एग्रीटेक स्टार्टअप और निजी कंपनियां भी इस खुले नेटवर्क के जरिए बड़ी संख्या में किसानों तक अपनी सेवाएं पहुंचा सकेंगी।
आईटीसी के साथ साझेदारी के तहत धान और गेहूं के क्लाइमेट रेजिलिएंट कमोडिटी क्लस्टर विकसित करने की योजना बनाई गई है। दो लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र में क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर का विस्तार प्रस्तावित है। इसमें शून्य जुताई, डायरेक्ट सीडेड राइस, जलवायु अनुकूल उन्नत बीज और पोषक तत्वों के वैज्ञानिक प्रबंधन जैसी आधुनिक पद्धतियों को शामिल किया जाएगा।
सरकार ने बहराइच में 1,500 एकड़ का धान क्लस्टर विकसित करने का भी प्रस्ताव रखा है, जो अवशेष और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप उत्पादन पर केंद्रित होगा। इस मॉडल के जरिए किसानों की प्रति एकड़ आय में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि, यूरिया के इस्तेमाल में करीब 25 प्रतिशत कमी और श्रम व सिंचाई की लागत में 25 से 30 प्रतिशत तक बचत का लक्ष्य रखा गया है।

यूपी-एग्रीज परियोजना के तहत धान, गेहूं, मिर्च, मक्का, हरी मटर और टमाटर जैसी फसलों के लिए निजी कंपनियों के साथ भी साझेदारी की जा रही है। इसका उद्देश्य खेती की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करना है। यानी उत्पादन के बाद संग्रहण, भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच की व्यवस्था पर भी एक साथ काम होगा।
मत्स्य पालन के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। एक्वाब्रिज के साथ साझेदारी के जरिए मछली पालन को पारंपरिक गतिविधि से आगे बढ़ाकर तकनीक आधारित उद्यम बनाने की योजना है। मत्स्य किसानों, सहकारी समितियों और उद्यमियों को आधुनिक प्रशिक्षण से जोड़ा जाएगा। इसमें एआई आधारित एक्वाकल्चर मैनेजमेंट और ऑटोमेटिक फीडिंग टेक्नोलॉजी जैसी सुविधाओं पर भी काम होगा।
उन्नाव में आईएमसी इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के तहत 60 एकड़ क्षेत्र में इंटीग्रेटेड एक्वाकल्चर परियोजना विकसित करने का प्रस्ताव है। यहां हैचरी, फीड मैन्युफैक्चरिंग, प्रोसेसिंग सुविधा और एक समर्पित प्रशिक्षण केंद्र विकसित किया जाना प्रस्तावित है।
वहीं, खेती को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने की दिशा में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निकट मेगा फूड पार्क और एग्री एक्सपोर्ट सेंटर विकसित करने का प्रस्ताव भी सामने आया है। इसका उद्देश्य उत्तर प्रदेश की कृषि उपज को केवल मंडियों तक सीमित न रखकर प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन, लॉजिस्टिक्स और निर्यात से जोड़ना है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूपी-एग्रीज का मूल दर्शन “प्रोडक्टिविटी, टेक्नोलॉजी, क्लाइमेट रेजिलिएंस, मार्केट, एंटरप्राइज और फार्मर प्रॉस्पैरिटी” बताया। उनका कहना था कि 21वीं सदी की खेती केवल मिट्टी और मौसम से नहीं, बल्कि डेटा साइंस, आधुनिक तकनीक और मार्केट इंटेलिजेंस से भी संचालित होगी।
कार्यक्रम में श्रम एवं सेवायोजन मंत्री अनिल राजभर, उत्तर प्रदेश ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के सीईओ मनोज कुमार सिंह, कृषि उत्पादन आयुक्त दीपक कुमार, प्रमुख सचिव कृषि रविंद्र, प्रमुख सचिव पंधारी यादव, विश्व बैंक के अनूप जगवानी, गूगल के सिद्धार्थ प्रकाश, एक्वाब्रिज के मोहम्मद ताबिश, नेटवर्क फॉर ह्यूमैनिटी की राधा किझनट्टम, आईटीसी के सचिन शर्मा, सीआईपी के निदेशक डॉ. सुधांशु सिंह और सिद्धि नायक एग्रो लिमिटेड के हेमंत गौर समेत अन्य लोग मौजूद रहे।
अब असली सवाल यह है कि कागज पर तैयार यह विशाल कृषि मॉडल जमीन पर किसानों की जिंदगी में कितना बदलाव ला पाता है। अगर डिजिटल नेटवर्क, आधुनिक खेती, कम लागत, बेहतर बाजार और निर्यात की यह श्रृंखला वास्तव में खेत तक पहुंचती है, तो पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड की कृषि तस्वीर बदल सकती है।
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