ग्रेटर नोएडा के राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जीआईएमएस) में भर्ती कराई गई एक 32 वर्षीय महिला के मामले ने मानसिक स्वास्थ्य और घरेलू हिंसा जैसे गंभीर मुद्दों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। चिकित्सकों का कहना है कि समय रहते उपचार मिलने से महिला की जान बच गई। इस अध्ययन ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब आत्महत्या के प्रयास को केवल अपराध के रूप में नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी एक गंभीर समस्या के रूप में देखा जा रहा है।
कई बार किसी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान दिखाई देती है, लेकिन उसके भीतर कितना दर्द छिपा होता है, इसका अंदाज़ा लगाना आसान नहीं होता। ग्रेटर नोएडा स्थित राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जीआईएमएस) का एक मामला इसी कड़वी सच्चाई को सामने लाया है।
जीआईएमएस के मनोचिकित्सा विभाग और फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किए गए एक अध्ययन में एक 32 वर्षीय विवाहित महिला के मामले का विश्लेषण किया गया है। यह महिला कथित रूप से ज़हर खाने के बाद अस्पताल के आपातकालीन विभाग में भर्ती कराई गई थी।
शुरुआत में इस घटना को एक दुर्घटना के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन डॉक्टरों की गहन जांच में कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने पूरे मामले की तस्वीर बदल दी।
समय रहते बच गई जान
अस्पताल के आपातकालीन विभाग की टीम ने महिला को तुरंत प्राथमिक उपचार देकर उसकी स्थिति को स्थिर किया। इसके बाद उसे आगे की जांच और उपचार के लिए मनोचिकित्सा विभाग भेजा गया।
मनोचिकित्सा विभाग की विशेषज्ञ डॉ. किरण जाखड़ के अनुसार, जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि महिला लंबे समय से वैवाहिक तनाव, घरेलू हिंसा और गंभीर अवसाद जैसी समस्याओं से जूझ रही थी। मानसिक दबाव लगातार बढ़ता गया और अंततः उसने आत्महत्या करने की कोशिश की।
हालांकि समय पर उपचार मिलने के कारण उसकी जान बच गई और अब उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है।

घरेलू हिंसा और मानसिक स्वास्थ्य का गहरा संबंध
विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू हिंसा केवल शारीरिक पीड़ा तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह मानसिक रूप से भी व्यक्ति को पूरी तरह तोड़ सकती है।
लगातार तनाव, अपमान, भय और अकेलेपन की भावना किसी भी व्यक्ति को गहरे अवसाद में धकेल सकती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ समय रहते मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की पहचान और उपचार पर ज़ोर दे रहे हैं।
जीआईएमएस के चिकित्सकों का मानना है कि इस प्रकार के मामलों में परिवार और समाज दोनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
क्या कहता है कानून?
फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग की विशेषज्ञ डॉ. अंजू रानी ने इस मामले के कानूनी पहलुओं पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस)-2023 और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम-2017 के तहत अब आत्महत्या के प्रयास को केवल एक आपराधिक घटना के रूप में नहीं देखा जाता है।
इसके पीछे छिपे मानसिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों को समझने का प्रयास किया जाता है। कानून का उद्देश्य अब दंड देना नहीं, बल्कि पीड़ित व्यक्ति को उचित उपचार, परामर्श और भावनात्मक सहयोग प्रदान करना है।

मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बेहद ज़रूरी
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में हर वर्ष लाखों लोग अवसाद और मानसिक तनाव जैसी समस्याओं का सामना करते हैं। भारत में भी तेजी से बदलती जीवनशैली, पारिवारिक तनाव, आर्थिक दबाव और सामाजिक चुनौतियों के कारण ऐसे मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई दे, वह खुद को समाज से अलग करने लगे, अत्यधिक तनाव में रहने लगे या निराशा व्यक्त करने लगे तो उसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
मदद मांगना कमजोरी नहीं है
जीआईएमएस के चिकित्सकों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि मानसिक परेशानी का सामना कर रहे लोगों को चुप रहने के बजाय सहायता लेनी चाहिए।
इसके लिए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन 'किरण' (1800-599-0019) और संकटग्रस्त लोगों की सहायता करने वाली संस्था 'आसरा' (91-9820466726) जैसी सेवाएं उपलब्ध हैं, जहां प्रशिक्षित विशेषज्ञ पूरी गोपनीयता के साथ सहायता प्रदान करते हैं।
समाज के लिए एक बड़ा संदेश
ग्रेटर नोएडा का यह मामला केवल एक महिला की कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल भी है। आखिर कितने लोग ऐसे होंगे, जो हर दिन मानसिक संघर्षों से जूझ रहे हैं, लेकिन अपनी पीड़ा किसी से साझा नहीं कर पाते?
शायद अब समय आ गया है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही गंभीरता से लें, जितनी किसी शारीरिक बीमारी को देते हैं। क्योंकि कई बार सबसे गहरे घाव दिखाई नहीं देते, लेकिन उनका दर्द सबसे अधिक होता है।
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