Monday, June 08, 2026

1500 फर्जी आयुष्मान कार्ड, करोड़ों के इलाज का खेल! STF ने दबोचा बड़ा मास्टरमाइंड, खुलेंगे और भी राज

दूसरों की फैमिली आईडी में नाम जोड़कर अपात्र लोगों के बनवाए जाते थे आयुष्मान कार्ड, फर्जी पोर्टल और ओटीपी बाईपास तकनीक से सरकारी योजना को लगाया जा रहा था करोड़ों का चूना

Bahrampur , Latest Updated On - Jun 03 2026 | 17:55:00 PM
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उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने आयुष्मान भारत योजना में बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा करते हुए लखनऊ से एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। आरोपी पर आरोप है कि उसने संगठित गिरोह के साथ मिलकर लगभग 1500 फर्जी आयुष्मान कार्ड बनवाए और अपात्र लोगों को सरकारी योजना का लाभ दिलाकर सरकार को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया।

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प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत) के तहत गरीब और जरूरतमंद लोगों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने एक ऐसे संगठित गिरोह के सदस्य को गिरफ्तार किया है, जो कथित रूप से हजारों अपात्र व्यक्तियों के फर्जी आयुष्मान कार्ड बनवाकर सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा रहा था।

एसटीएफ के अनुसार गिरफ्तार आरोपी की पहचान चक्र शेख उर्फ अभिषेक उर्फ अजय के रूप में हुई है। वह मूल रूप से हरदोई जिले का निवासी है और वर्तमान में लखनऊ के तालकटोरा क्षेत्र में रह रहा था। आरोपी को 2 जून 2026 को दुबग्गा स्थित एक कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) से गिरफ्तार किया गया।

क्या था पूरा खेल?

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि आरोपी और उसके साथी अपात्र लोगों को पात्र परिवारों की फैमिली आईडी में जोड़कर आयुष्मान कार्ड बनवाते थे। इसके लिए विशेष रूप से तैयार किए गए एक कथित फर्जी पोर्टल का इस्तेमाल किया जाता था।

जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पोर्टल में उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों का फैमिली आईडी डाटा मौजूद था। आरोपी आधार कार्ड में दर्ज पिता के नाम और अन्य विवरणों के आधार पर किसी भी पात्र परिवार की पहचान करता था और फिर अपात्र व्यक्ति को उसी परिवार का सदस्य दिखाकर जोड़ देता था।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस प्रक्रिया में ओटीपी परिवार के वास्तविक मुखिया के पास न जाकर सीधे उस व्यक्ति के मोबाइल नंबर पर पहुंचता था, जिसे परिवार में जोड़ा जा रहा था। इससे पूरी सत्यापन प्रक्रिया को कथित तौर पर दरकिनार कर दिया जाता था।

फर्जी पोर्टल और सॉफ्टवेयर डेवलपर की भूमिका

पूछताछ में आरोपी ने खुलासा किया कि वर्ष 2025 में उसकी मुलाकात एक सॉफ्टवेयर डेवलपर से कराई गई थी। इसी डेवलपर ने कथित रूप से ऐसा पोर्टल तैयार किया था जिसके माध्यम से फर्जी तरीके से आयुष्मान कार्ड बनाने और अप्रूव कराने का नेटवर्क संचालित किया जा रहा था।

आरोपी के अनुसार, प्रति कार्ड 500 से 800 रुपये तक लिए जाते थे। कई मामलों में कार्डों को पहले ISA (Implementation Support Agency) के माध्यम से और रिजेक्ट होने पर SHA (State Health Agency) स्तर पर दोबारा अप्रूव कराया जाता था।

एक साल में 1500 कार्ड बनाने का दावा

पूछताछ के दौरान आरोपी ने बताया कि उसने पिछले लगभग एक वर्ष में करीब 1500 आयुष्मान कार्ड फर्जी तरीके से बनवाने में भूमिका निभाई। इन कार्डों के माध्यम से अनेक अपात्र व्यक्तियों ने विभिन्न अस्पतालों में मुफ्त इलाज का लाभ उठाया।

एसटीएफ का मानना है कि इस पूरे नेटवर्क के कारण सरकार को करोड़ों रुपये की राजस्व क्षति हुई हो सकती है। हालांकि वास्तविक नुकसान का आंकलन जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

क्या-क्या हुआ बरामद?

गिरफ्तारी के दौरान एसटीएफ ने आरोपी के कब्जे से कई महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेजी साक्ष्य बरामद किए हैं।

बरामद सामान में एक मोबाइल फोन, एक लैपटॉप, दो सीपीयू, एक मॉनिटर, थम्ब स्कैनर, वेबकैम, प्रिंटर, आयुष्मान कार्ड, मोहर, पैन कार्ड, आधार कार्ड, सीएससी आईडी कार्ड, फर्जी कार्डों से संबंधित डिजिटल डाटा, एक कार तथा नकदी शामिल है।

जांच एजेंसियों का मानना है कि इन उपकरणों से गिरोह के नेटवर्क और अन्य सदस्यों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।

पहले भी हो चुकी हैं गिरफ्तारियां

एसटीएफ ने बताया कि इसी गिरोह के खिलाफ पहले भी कार्रवाई की जा चुकी है। जून 2025 में प्रयागराज से दो आरोपियों और दिसंबर 2025 में लखनऊ से सात आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था।

इन गिरफ्तारियों में चन्द्रभान वर्मा, राजेश मिश्रा, सुजीता कंगोजिया, सौरभ मौर्य, विवेकजीत सिंह, रजनी सिंह और अंकित यादव समेत कई नाम सामने आए थे। इनमें से कई आरोपियों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।

अब आगे क्या?

एसटीएफ और साइबर क्राइम थाना की संयुक्त टीम आरोपी से मिले इनपुट के आधार पर गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश कर रही है। बरामद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का फॉरेंसिक परीक्षण कराया जाएगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस नेटवर्क का दायरा कितना बड़ा था और कितने लोगों को इसका लाभ पहुंचाया गया।

फिलहाल आरोपी के खिलाफ साइबर क्राइम थाना लखनऊ में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज मुकदमे में आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

यह मामला न केवल सरकारी योजनाओं में सेंध लगाने वाले संगठित अपराध का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि डिजिटल सिस्टम में छोटी सी कमजोरी का दुरुपयोग कर किस तरह करोड़ों रुपये की सार्वजनिक धनराशि को नुकसान पहुंचाया जा सकता है। अब जांच एजेंसियों की नजर इस पूरे नेटवर्क की जड़ों तक पहुंचने पर है।

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COMMENTS
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