ग्रेटर नोएडा के ग्राम भनौता स्थित खसरा नंबर 386 में कथित कॉलोनाइजेशन और विला निर्माण को लेकर सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं। आरोप है कि निर्माण रुकने के बजाय दिन-प्रतिदिन आगे बढ़ रहा है, जबकि कार्रवाई के लिए जिम्मेदार GNIDA के वर्क सर्किल-2 की ओर से कभी फोर्स की कमी तो कभी मौके पर बदसलूकी का हवाला दिया जाता है। अब सवाल सीधे SM प्रदीप कुमार और GNIDA के उच्च अधिकारियों से है कि कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है और कथित निर्माण पर अब तक जमीन पर क्या कदम उठाए गए हैं?
भनौता में कथित अवैध निर्माण का खेल... आखिर कब रुकेगा?
ग्रेटर नोएडा में अगर किसी जमीन पर नियमों को दरकिनार कर निर्माण शुरू हो जाए तो सवाल सिर्फ उस निर्माण का नहीं होता... सवाल पूरी निगरानी व्यवस्था पर उठता है।
कुछ ऐसा ही सवाल इन दिनों ग्राम भनौता के खसरा नंबर 386 को लेकर खड़ा हो रहा है।
आरोप है कि यहां कथित तौर पर कॉलोनाइजेशन और विला निर्माण का काम लगातार आगे बढ़ रहा है। निर्माण रुकने के बजाय दिन-प्रतिदिन बढ़ता दिखाई दे रहा है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—
जब नींव रखी जा रही थी, तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जब निर्माण शुरू हुआ, तब रोक क्यों नहीं लगी?
और जब विला तैयार होने की तरफ बढ़ने लगे, तब नोटिस, विरोध और कार्रवाई की बातें क्यों सामने आ रही हैं?
यही सवाल अब स्थानीय स्तर पर लगातार उठ रहे हैं।
क्योंकि अगर किसी निर्माण को शुरुआत में ही रोक दिया जाए तो नुकसान सीमित रह सकता है। लेकिन अगर निर्माण खड़ा हो जाए, विला बन जाएं और फिर कार्रवाई होती है, तो उसका असर सिर्फ निर्माण करने वाले तक सीमित नहीं रहता।
खामियाजा आखिर भुगतेगा कौन?
जरा उस आम आदमी के बारे में सोचिए जिसने अपनी जिंदगी भर की कमाई लगाकर कोई विला खरीद लिया।
अगर बाद में उस निर्माण को अवैध घोषित कर कार्रवाई होती है तो सबसे बड़ी परेशानी किसे होगी?
कॉलोनाइजर को?
संभव है कि वह तब तक अपना प्रोजेक्ट बेचकर आगे निकल चुका हो।
लेकिन वह परिवार?
जिसने बैंक का लोन लिया होगा...
अपनी जमा पूंजी लगाई होगी...
बच्चों के भविष्य की बचत लगाई होगी...
उसके सामने फिर क्या बचेगा?
इसी तरह सवाल उस किसान को लेकर भी है, जिसके खिलाफ भविष्य में मुकदमे या FIR जैसी कार्रवाई की स्थिति पैदा हो सकती है।
यानी निर्माण के समय अगर कथित तौर पर निगरानी कमजोर रही, तो बाद में कार्रवाई का सबसे बड़ा बोझ आम आदमी या जमीन से जुड़े लोगों पर पड़ सकता है।
SM प्रदीप कुमार से सीधा सवाल—आखिर कब तक?
अब सवाल सीधे SM प्रदीप कुमार से है।
जब से SM प्रदीप कुमार ने वर्क सर्किल-2 की जिम्मेदारी संभाली है, तब से खसरा नंबर 386 को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट के जरिए बार-बार जवाब मांगा जा रहा है।
लेकिन कार्रवाई के बजाय अलग-अलग कारण सामने आने की बात कही जा रही है।
कभी कहा जाता है—
“फोर्स नहीं मिल रही।”
कभी मौके पर बदसलूकी की बात सामने आती है।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर ये बहाने कब तक?
अगर सिर्फ बहाने बनाने से कथित अवैध निर्माण रुक जाता, तो शायद GNIDA को कार्रवाई के लिए बुलडोजर और प्रवर्तन तंत्र की जरूरत ही नहीं पड़ती।
एक ही GNIDA... फिर कार्रवाई में इतना फर्क क्यों?
यहां एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है।
उसी GNIDA में... उसी विभाग में... उसी व्यवस्था के तहत दूसरे वर्क सर्किलों में कार्रवाई होती दिखाई देती है।
तो फिर सवाल है—
वर्क सर्किल-2 में खसरा नंबर 386 पर कार्रवाई क्यों नहीं?
क्या वहां नियम अलग हैं?
क्या वहां कार्रवाई के लिए अलग कानून है?
या फिर मामला कुछ और है?
अगर दूसरे मामलों में पुलिस और प्रशासन से फोर्स की व्यवस्था हो सकती है तो यहां क्यों नहीं?
अगर किसी अधिकारी के साथ बदसलूकी का खतरा है तो पुलिस और प्रशासन से सहयोग लेना किसकी जिम्मेदारी है?
और अगर मौके पर बदसलूकी की बात सही है, तो GNIDA के उच्च अधिकारी ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई क्यों नहीं करते?
क्या कार्रवाई टालने का तरीका बन गया है फोर्स का बहाना?
स्थानीय स्तर पर अब यह सवाल भी उठ रहा है कि कहीं फोर्स की कमी का हवाला सिर्फ कार्रवाई को टालने का माध्यम तो नहीं बन गया?
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हम किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार या मिलीभगत का आरोप तथ्य के रूप में नहीं लगा रहे हैं।
लेकिन जब किसी कथित निर्माण को लेकर लगातार सवाल उठें और कार्रवाई के बजाय बार-बार अलग-अलग कारण सामने आएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
यहां तक कि कुछ लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि कहीं कार्रवाई न होने के पीछे किसी तरह का “चढ़ावा” या निजी लाभ तो कारण नहीं?
यह केवल एक आरोप/आशंका है, जिसका कोई स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं रखा गया है।
इसलिए अब जरूरी है कि SM प्रदीप कुमार खुद सामने आएं और स्पष्ट जवाब दें—
फोर्स कब मांगी गई?
किससे मांगी गई?
कितनी बार मांगी गई?
अगर फोर्स नहीं मिली तो उसकी वजह क्या थी?
और सबसे अहम—
खसरा नंबर 386 में कथित निर्माण को रोकने के लिए अब तक जमीन पर वास्तव में क्या कार्रवाई की गई?
GNIDA के बड़े अधिकारियों से भी सवाल
सवाल सिर्फ SM प्रदीप कुमार तक सीमित नहीं है।
GNIDA के उच्च अधिकारियों से भी पूछा जाना चाहिए कि अगर एक वर्क सर्किल में कार्रवाई संभव है, तो दूसरे वर्क सर्किल में कार्रवाई क्यों नहीं?
अगर फोर्स की व्यवस्था दूसरे मामलों में हो सकती है, तो भनौता के खसरा नंबर 386 के मामले में क्यों नहीं?
और अगर किसी अधिकारी के साथ बदसलूकी की आशंका है तो क्या इसका मतलब यह है कि अधिकारी मौके पर जाने से डरेंगे और दूसरी तरफ कथित कॉलोनाइजेशन और निर्माण चलता रहेगा?
अगर ऐसा ही चलता रहा तो फिर GNIDA की निगरानी व्यवस्था का मतलब क्या रह जाएगा?
क्योंकि पूरा ग्रेटर नोएडा GNIDA के नियमों और नियोजन व्यवस्था के दायरे में आता है।
फिर कुछ चुनिंदा जगहों पर नियमों के पालन और कार्रवाई को लेकर सवाल क्यों खड़े होते हैं?
असली सवाल आज बने विला नहीं... पहली ईंट का है
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि आज कितने विला बन चुके हैं।
असली सवाल है—
जब पहली ईंट रखी जा रही थी, तब GNIDA कहां था?
जब नींव डाली जा रही थी, तब जिम्मेदार अधिकारी कहां थे?
जब निर्माण धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
और अब जब मीडिया लगातार सवाल पूछ रहा है तो जवाब देने में इतनी परेशानी क्यों दिखाई दे रही है?
क्योंकि निर्माण की नींव तो लगातार मजबूत होती जा रही है...
लेकिन GNIDA की कार्रवाई की नींव आखिर इतनी कमजोर क्यों दिखाई दे रही है?
रिटायरमेंट करीब... क्या अब भी मिलेगा जवाब?
स्थानीय चर्चा में यह बात भी सामने आ रही है कि SM प्रदीप कुमार के रिटायरमेंट में अब ज्यादा समय नहीं बचा है।
ऐसे में सवाल और गंभीर हो जाता है कि क्या बचे हुए समय में खसरा नंबर 386 जैसे मामलों पर ठोस कार्रवाई होगी?
या फिर कुछ दिन और निकल जाएंगे...
और हर बार वही पुराना जवाब सुनाई देता रहेगा—
“फोर्स नहीं मिल रही...”
“मौके पर बदसलूकी होती है...”
या फिर कोई नया कारण?
लेकिन सवालों का सिलसिला यहीं रुकने वाला नहीं है।
हम लगातार सवाल पूछते रहेंगे, जब तक कथित अवैध निर्माण और अतिक्रमण के मामलों में जिम्मेदार विभाग की ओर से स्पष्ट जवाब और नियमानुसार कार्रवाई सामने नहीं आती।
अब देखना यह है कि SM प्रदीप कुमार और GNIDA के उच्च अधिकारी इन सवालों का जवाब देते हैं या फिर भनौता के खसरा नंबर 386 की कहानी में एक बार फिर कार्रवाई से ज्यादा बहाने सुनाई देते हैं।
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