मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। यह संकट केवल खतरा नहीं, बल्कि संसाधनों के बेहतर उपयोग और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा संकेत भी हो सकता है।
कभी-कभी इतिहास खुद को दोहराता नहीं, बल्कि चेतावनी देता है। आज मिडिल ईस्ट में चल रहा युद्ध—जिसमें अमेरिका, इज़राइल और ईरान जैसे देश आमने-सामने हैं—सिर्फ एक भू-राजनीतिक संघर्ष नहीं है। यह भारत जैसे उभरते देश के लिए एक गहरी आर्थिक चेतावनी है।
अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो 1970 का दशक हमें बहुत कुछ सिखाता है। उस समय तेल संकट ने पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को हिला दिया था। महंगाई बढ़ी, विकास थमा और “स्टैगफ्लेशन” जैसा शब्द आम हो गया। उस संकट ने अमेरिका में Reaganomics और ब्रिटेन में Thatcherism जैसी नई आर्थिक नीतियों को जन्म दिया।
आज का संकट भारत के लिए कुछ वैसा ही मोड़ साबित हो सकता है। फर्क बस इतना है कि तब भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत सीमित थी, और आज वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का अहम हिस्सा है।
1970 के दशक में भारतीय किसान अभी रासायनिक उर्वरकों की ओर बढ़ ही रहे थे। गांवों में रसोई लकड़ी और गोबर के उपलों पर चलती थी। सिंथेटिक कपड़े पहनने वाले लोग गिने-चुने थे। लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
भारत हर साल 70 मिलियन टन से अधिक रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करता है। करीब 33 करोड़ एलपीजी कनेक्शन सक्रिय हैं। देश का लगभग 60 प्रतिशत टेक्सटाइल उत्पादन मैनमेड फाइबर पर आधारित है। प्लास्टिक और पॉलिमर अब हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं—थैलियों से लेकर पाइप और केबल तक।
यही वजह है कि आज का यह युद्ध सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं है। इसका असर हर उस भारतीय तक पहुंच रहा है जो खाना बनाता है, खेती करता है, फैक्ट्री चलाता है या हवाई यात्रा करता है।
तेल की कीमतों में हलचल सीधे गैस सिलेंडर, खाद, परिवहन और उत्पादन लागत को प्रभावित करती है। और जब लागत बढ़ती है, तो उसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता पर ही आता है।
लेकिन असली सवाल यह है—क्या हम इस संकट को सिर्फ एक समस्या के रूप में देखेंगे या इसे एक अवसर में बदल पाएंगे?
सच्चाई यह है कि भारत आज भी ऊर्जा के मामले में भारी रूप से आयात पर निर्भर है, खासकर जीवाश्म ईंधनों पर। यह निर्भरता न केवल आर्थिक जोखिम पैदा करती है, बल्कि हमारी नीतिगत स्वतंत्रता को भी सीमित करती है।
हमें यह समझना होगा कि “जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा” वाला दृष्टिकोण अब काम नहीं करेगा। किसान बैलों से खेती पर वापस नहीं जाएंगे, और न ही देश फिर से धुएं से भरी रसोई की ओर लौट सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम संसाधनों के असीमित और अनियंत्रित उपयोग को नजरअंदाज करते रहें।
1970 के संकट के बाद ब्राजील ने एथेनॉल आधारित ईंधन कार्यक्रम शुरू किया था। वह एक साहसिक और दूरदर्शी कदम था। भारत को भी अब वैसी ही सोच की जरूरत है।
सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि जिन संसाधनों की हमारे पास कमी है, उनका उपयोग बेहद सावधानी और दक्षता के साथ होना चाहिए। इसका सीधा मतलब है—सब्सिडी की नीतियों पर पुनर्विचार।
क्या उर्वरकों पर असीमित सब्सिडी जारी रहनी चाहिए? या फिर इसे एलपीजी सिलेंडर की तरह सीमित किया जाना चाहिए, ताकि जरूरतमंद को ही लाभ मिले और संसाधनों का दुरुपयोग न हो?
यह सवाल कठिन जरूर है, लेकिन अब इसे टालना संभव नहीं।
दूसरा, हमें विकल्पों की तलाश तेज करनी होगी। नवीकरणीय ऊर्जा, जैव ईंधन, और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को केवल नीतियों में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर लागू करना होगा।
तीसरा, उपभोक्ताओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब तक हम खुद संसाधनों के उपयोग को लेकर जिम्मेदार नहीं बनेंगे, तब तक कोई भी नीति पूरी तरह सफल नहीं हो सकती।
यह संकट हमें यह भी सिखा रहा है कि वैश्विक घटनाएं अब “दूर” नहीं रहीं। मिडिल ईस्ट में होने वाली एक घटना दिल्ली, मुंबई या लखनऊ की रसोई तक असर डाल सकती है।
एक संपादक के रूप में मैं यह मानता हूं कि यह समय घबराने का नहीं, बल्कि सोचने और बदलने का है।
भारत के पास अवसर है—अपनी ऊर्जा नीति को पुनर्परिभाषित करने का, संसाधनों के उपयोग को अधिक जिम्मेदार बनाने का और आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम उठाने का।
अगर हमने इस चेतावनी को नजरअंदाज किया, तो आने वाले वर्षों में हमें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
लेकिन अगर हमने इसे समझा और सही दिशा में कदम उठाए, तो यही संकट भारत के लिए एक नई आर्थिक मजबूती की शुरुआत भी बन सकता है।
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