पश्चिम बंगाल में नई सरकार बनने से पहले बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए रिटायर्ड अधिकारियों को ऑफिस आने से रोक दिया गया है। चुनावी नतीजों के बाद सियासी माहौल गरमाया हुआ है।
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन से पहले हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक हलचल के बीच अब प्रशासनिक स्तर पर भी बड़े फैसले लिए जा रहे हैं, जिसने पूरे राज्य का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। नई सरकार के गठन से ठीक पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा नियुक्त सेवानिवृत्त अधिकारियों को सरकारी दफ्तरों में आने से रोक दिया गया है। इस फैसले ने न केवल प्रशासनिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है, बल्कि राजनीतिक चर्चाओं को भी तेज कर दिया है।
सूत्रों के मुताबिक, यह निर्देश राज्य के मुख्य सचिव दुष्यंत नारियाला की ओर से लोक भवन से सभी विभागों के सचिवों तक पहुंचाया गया। इसके बाद विभागों के भीतर इसे मौखिक रूप से लागू कर दिया गया। आदेश के तहत जो रिटायर्ड अधिकारी अब तक विभिन्न विभागों में सलाहकार या अन्य भूमिकाओं में काम कर रहे थे, उन्हें तत्काल प्रभाव से ऑफिस नहीं आने के लिए कहा गया है। यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी, जब तक राज्य में नई सरकार का औपचारिक गठन नहीं हो जाता।

इस फैसले के बाद कई रिटायर्ड अधिकारियों ने खुद ही अपने पद से इस्तीफा देना शुरू कर दिया है। बताया जा रहा है कि कुछ अधिकारियों ने सरकारी आवास भी खाली कर दिए हैं। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि प्रशासनिक स्तर पर बदलाव की प्रक्रिया तेज हो चुकी है।
इसके साथ ही मुख्य सचिव ने सभी विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। खास तौर पर जरूरी फाइलों की सुरक्षा पर जोर दिया गया है और स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी महत्वपूर्ण दस्तावेज को विभाग से बाहर नहीं जाने दिया जाए। इस निर्देश ने माहौल को और संवेदनशील बना दिया है।
दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है, जब राज्य में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने 294 में से 207 सीटें जीतकर बड़ी जीत दर्ज की है, जबकि करीब 15 साल से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस को सिर्फ 80 सीटों पर संतोष करना पड़ा है।
सबसे बड़ा झटका खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लगा है, जो अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से हार गईं। यहां भाजपा के सुवेंदु अधिकारी ने उन्हें 15,105 वोटों के अंतर से पराजित किया। इस हार ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है।

हालांकि, इन नतीजों के बाद भी ममता बनर्जी के तेवर नरम नहीं पड़े हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि वह चुनाव हारी नहीं हैं, बल्कि उन्हें हराया गया है। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में गड़बड़ी के आरोप भी लगाए हैं, जिससे सियासी माहौल और ज्यादा गर्म हो गया है।
दूसरी ओर चुनाव आयोग ने अपनी प्रक्रिया पूरी करते हुए नई विधानसभा के गठन के लिए नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। यह अधिसूचना राज्यपाल को भेज दी गई है, जिसके साथ ही चुनावी प्रक्रिया औपचारिक रूप से समाप्त हो गई है। इस कदम के बाद अब नई सरकार के शपथ ग्रहण का रास्ता साफ हो गया है।
राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री का इस्तीफा देना या न देना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मामला मुख्यमंत्री, राज्यपाल और भारत के राष्ट्रपति के बीच का है और इसमें आयोग की कोई भूमिका नहीं है।
इधर, राज्य में नई सरकार के गठन की तैयारियां भी तेज हो गई हैं। 9 मई को गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जा सकता है। इससे पहले 8 मई को कोलकाता में भाजपा विधायक दल की बैठक प्रस्तावित है, जिसमें नए नेता का चयन किया जाएगा।

सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे नाम सुवेंदु अधिकारी का चल रहा है। भवानीपुर में ममता बनर्जी को हराने के बाद उनका कद और बढ़ गया है। हालांकि अंतिम फैसला विधायक दल की बैठक में ही होगा।
पश्चिम बंगाल में यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत भी देता है। प्रशासनिक फैसलों से लेकर सियासी बयानों तक, हर स्तर पर तनाव और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
अब सभी की नजर 9 मई पर टिकी है, जब राज्य में नई सरकार शपथ ले सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है और यह सत्ता परिवर्तन राज्य के प्रशासन और जनता पर क्या असर डालता है।
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