सुप्रीम Court ने बिहार में चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को वैध और संवैधानिक करार देते हुए विपक्ष की सभी प्रमुख आपत्तियों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के लिए मतदाता सूची का शुद्ध होना बेहद जरूरी है और चुनाव आयोग अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत काम कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, SIR प्रक्रिया को बताया वैध
देश की राजनीति और चुनावी व्यवस्था से जुड़े सबसे चर्चित मामलों में से एक पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। बिहार में चुनाव आयोग (ECI) द्वारा शुरू की गई “विशेष गहन पुनरीक्षण” यानी SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली तमाम याचिकाओं को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक और कानूनी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग ने अपने संवैधानिक अधिकारों के भीतर रहकर यह प्रक्रिया शुरू की है और इसे गैर-संवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि “फ्री एंड फेयर इलेक्शन” यानी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आत्मा हैं और इसके लिए मतदाता सूची का शुद्ध और विश्वसनीय होना अनिवार्य है।
क्या है SIR और क्यों उठा विवाद?
चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूचियों का “विशेष गहन पुनरीक्षण” शुरू किया था। इसका उद्देश्य वोटर लिस्ट में मौजूद फर्जी, अपात्र या दोहरी प्रविष्टियों की पहचान कर उन्हें हटाना था।
विवाद तब शुरू हुआ जब आयोग ने ऐसे मतदाताओं से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जिनका नाम वर्ष 2002 या कुछ मामलों में 2003 की मतदाता सूची में नहीं था। इन लोगों को यह साबित करने के लिए कहा गया कि उनका संबंध ऐसे परिवार से है जिसका नाम पहले की वोटर लिस्ट में दर्ज था।
विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने इसे नागरिकता साबित करने जैसी प्रक्रिया बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि चुनाव आयोग अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम कर रहा है और इससे गरीब, प्रवासी तथा हाशिए पर रहने वाले लोगों के वोटिंग अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज कीं याचिकाएं?
सुप्रीम कोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद कहा कि SIR को सिर्फ इसलिए अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह सामान्य वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया से अलग है।
कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) के तहत मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखने का अधिकार प्राप्त है। इसके लिए आयोग आवश्यक प्रक्रिया और नियम तय कर सकता है।
पीठ ने कहा,
“चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया है, अपनी शक्तियों के बाहर नहीं गया है। पूरी प्रक्रिया को गैर-संवैधानिक करार नहीं दिया जा सकता।”
“नाम काटना नियम विरुद्ध नहीं”
सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या SIR प्रक्रिया के तहत नाम हटाना मनमाना कदम माना जाएगा? इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि अगर दस्तावेज संदिग्ध लगते हैं या सत्यापन में खामियां मिलती हैं, तो चुनाव आयोग को नाम हटाने का अधिकार है। इसे नियम विरुद्ध नहीं कहा जा सकता।
बेंच ने कहा,
“यह नहीं कहा जा सकता कि SIR का उद्देश्य लोगों को बाहर करना था। चुनाव आयोग दस्तावेजों की विश्वसनीयता के आधार पर फैसला ले सकता है।”
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता। हालांकि यदि किसी मामले में गंभीर संदेह हो तो वह उसे केंद्र सरकार को भेज सकता है।
वोटर पर बोझ डालने वाली दलील भी खारिज
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि SIR प्रक्रिया मतदाता पर खुद को साबित करने का अनावश्यक बोझ डालती है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह तर्क पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने निवास स्थान से अलग रह रहा है तब भी उसके परिवार या पुराने रिकॉर्ड का संबंध पहले की मतदाता सूची से हो सकता है। इसलिए प्रक्रिया को अनुचित नहीं कहा जा सकता।
पीठ ने कहा कि इतने बड़े स्तर पर मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए विस्तृत सत्यापन आवश्यक है।

“संविधान की कसौटी पर खरा उतरता है SIR”
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि SIR संविधान के अनुच्छेद 326 और RP Act की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है।
कोर्ट ने माना कि मतदाता सूची का शुद्ध होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है। यदि अपात्र लोग वोटर लिस्ट में शामिल हो जाते हैं तो इससे चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को इस तरह की जटिल और विस्तृत प्रक्रिया के लिए अपने नियम और प्रक्रिया तय करने का पूरा अधिकार है।
विपक्ष की सभी बड़ी आपत्तियां खारिज
इस मामले में विपक्षी दलों और विभिन्न संगठनों की ओर से 20 से ज्यादा जनहित याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इनमें चुनाव आयोग की निष्पक्षता, प्रक्रिया की पारदर्शिता और दस्तावेजों की मांग को लेकर सवाल उठाए गए थे।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी प्रमुख आरोपों और आपत्तियों को खारिज कर दिया।
याचिकाओं में दावा किया गया था कि यह प्रक्रिया गरीबों, दलितों, आदिवासियों और प्रवासी मजदूरों को वोटर लिस्ट से बाहर कर सकती है। लेकिन कोर्ट ने माना कि आयोग की मंशा मतदाता सूची को शुद्ध करना है, न कि किसी वर्ग को बाहर करना।
अश्विनी उपाध्याय ने फैसले का किया स्वागत
इस मामले में याचिकाकर्ता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और उनकी दलीलों को स्वीकार किया है।
उन्होंने कहा,
“फ्री एंड फेयर इलेक्शन के लिए यह जरूरी है कि वोटर लिस्ट में किसी भी अपात्र व्यक्ति का नाम न हो।”
उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 11 मान्य दस्तावेजों की सूची को वैध माना है। आधार कार्ड को लेकर अदालत ने कहा कि पहले इसे 12वें दस्तावेज के रूप में स्वीकार करना उचित था, लेकिन आगे की प्रक्रिया चुनाव आयोग तय करेगा।
चुनावी राजनीति पर क्या पड़ेगा असर?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को आने वाले चुनावों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बिहार सहित कई राज्यों में मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया अब और तेज हो सकती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों को मजबूत करता है और भविष्य में वोटर लिस्ट को लेकर होने वाले विवादों पर भी असर डालेगा।
साथ ही यह फैसला विपक्ष के उस नैरेटिव को भी झटका माना जा रहा है जिसमें SIR को वोटिंग अधिकारों पर हमला बताया जा रहा था।
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