गौतमबुद्ध नगर के एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के BA-LLB छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी किए गए नोटिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। CJI ने सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई थी, तो फिर मजिस्ट्रेट ने छात्र को BNSS के तहत नोटिस कैसे जारी कर दिया। कोर्ट ने मामले में आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगने की बात कही है।
देश की सबसे बड़ी अदालत में बुधवार को एक ऐसा मामला पहुंचा, जिसने गौतमबुद्ध नगर प्रशासन की कार्रवाई पर सीधे सवाल खड़े कर दिए। मामला गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के BA-LLB छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी किए गए एक नोटिस से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश यानी CJI ने गौतमबुद्ध नगर के एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई। सवाल सीधा था—जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा रखी थी, तो फिर छात्र को नोटिस जारी कैसे किया गया?
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि नोटिस बाद में वापस ले लिया गया हो, लेकिन अदालत के आदेश के बावजूद ऐसी कार्रवाई क्यों हुई, इसका जवाब प्रशासन को देना होगा।
आखिर अक्षत त्रिपाठी को क्यों भेजा गया था नोटिस?
मामला गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी यानी GBU के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है।
पुलिस के दावे के मुताबिक, अक्षत दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक राजनीतिक दल द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल हुआ था और अन्य छात्रों को कथित तौर पर विरोधी या भ्रामक बातों के लिए उकसा रहा था।
इसी आधार पर एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट III, ग्रेटर नोएडा की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS के तहत छात्र को नोटिस जारी किया गया।
नोटिस में छात्र से ₹5 लाख का पर्सनल बॉन्ड भरने और इतनी ही राशि की दो जमानतें देने को कहा गया था। प्रशासन की ओर से इसका उद्देश्य शांति व्यवस्था बनाए रखना बताया गया था।
लेकिन अक्षत त्रिपाठी ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया।
छात्र ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर अपना पक्ष रखा और कहा कि यूनिवर्सिटी महीनों से बंद थी और उसने केवल शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला तो CJI हुए सख्त
जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया तो वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने मामले को पीठ के सामने रखा।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन युवाओं और छात्रों पर “प्रयोग” कर रहा है और यह 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश के विपरीत है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए CJI ने बेहद कड़े शब्दों में सवाल उठाया कि जब अदालत ने छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कदम नहीं उठाने की बात स्पष्ट रूप से कही थी, तो एक मजिस्ट्रेट ऐसा आदेश कैसे जारी कर सकता है।
CJI की टिप्पणी का मूल सवाल यही था कि कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद भी प्रशासनिक स्तर पर ऐसी कार्रवाई करने की जरूरत क्यों पड़ी?
नोटिस वापस लिया, फिर भी मामला खत्म नहीं
इस पूरे विवाद के बीच नोटिस की कॉपी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई।
इसके बाद छात्र संगठनों, जिनमें SFI भी शामिल है, की ओर से विरोध सामने आया। बढ़ते विवाद के बीच यूपी पुलिस और प्रशासन ने अगले ही दिन नोटिस को रद्द यानी रिवोक कर दिया।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल अब सिर्फ नोटिस जारी करने का नहीं रह गया है।
अदालत यह जानना चाहती है कि जब छात्रों को लेकर पहले से स्पष्ट न्यायिक आदेश मौजूद था, तब संबंधित मजिस्ट्रेट ने उसके बावजूद ऐसी कार्रवाई क्यों की।
यानी नोटिस वापस लेने के बाद भी प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल बना हुआ है।
मजिस्ट्रेट से मांगा जाएगा आधिकारिक स्पष्टीकरण
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को निर्देश दिया है कि पूरे मामले और मजिस्ट्रेट द्वारा जारी नोटिस को आधिकारिक रिट याचिका के रिकॉर्ड पर लाया जाए।
कोर्ट प्रशासन से इस पूरे घटनाक्रम को लेकर लिखित स्पष्टीकरण मांगेगा। साथ ही मामले में अवमानना यानी Contempt के पहलू को भी देखा जा सकता है।
यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ एक छात्र को जारी किए गए नोटिस तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल भी सामने आ गया है कि न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बाद प्रशासनिक अधिकारियों को किस सीमा तक कार्रवाई करने का अधिकार है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल नोटिस वापस लिया जा चुका है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले को यहीं खत्म नहीं माना है।
अब संबंधित मजिस्ट्रेट को यह स्पष्ट करना होगा कि नोटिस किन परिस्थितियों में जारी किया गया था, उसका आधार क्या था और क्या प्रशासनिक कार्रवाई करते समय सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के आदेश को ध्यान में रखा गया था।
दूसरी ओर, अक्षत त्रिपाठी लगातार अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को गलत बता रहा है और उसका कहना है कि उसने केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि एक तरफ प्रशासन की ओर से शांति व्यवस्था का तर्क दिया गया, जबकि दूसरी तरफ छात्र ने कार्रवाई को निराधार बताया।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मामला पहुंचने के बाद गेंद पूरी तरह प्रशासन के पाले में है।
आने वाले समय में मजिस्ट्रेट का स्पष्टीकरण यह तय करने में अहम होगा कि नोटिस जारी करने के पीछे प्रशासन का आधार क्या था और क्या उस कार्रवाई से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी हुई।
फिलहाल, एक छात्र को भेजा गया ₹5 लाख के बॉन्ड वाला नोटिस वापस तो हो गया है, लेकिन उसके बाद उठे संवैधानिक और न्यायिक सवाल अभी खत्म नहीं हुए हैं।
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