दिल्ली में 5 सितंबर को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की ओर से इंडिया गेट पर प्रस्तावित मार्च के सोशल मीडिया ऐलान को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका पहुंची। सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने फिलहाल किसी तरह का आदेश देने से इनकार करते हुए कहा कि अभी ऐसी कोई बाध्यकारी परिस्थिति नहीं है, जिससे अनहोनी की आशंका मानी जाए। कोर्ट ने कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार और संबंधित प्रवर्तन एजेंसियों पर छोड़ते हुए पक्षकारों से शांतिपूर्ण और कानून के मुताबिक आचरण की उम्मीद जताई। मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को होगी।
सोशल मीडिया के ऐलान से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
5 सितंबर को दिल्ली में प्रस्तावित एक विरोध प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर सामने आए ऐलान ने अब कानूनी रूप ले लिया है।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की ओर से इंडिया गेट पर मार्च किए जाने की बात सामने आने के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर किया गया। यह मामला पहले से लंबित छात्र प्रदर्शन से जुड़ी याचिका के संदर्भ में अदालत के सामने आया।
सुनवाई के दौरान आवेदक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. रिजवान ने अदालत को बताया कि मार्च का ऐलान सोशल मीडिया पर किया गया है। उनके मुताबिक, उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रदर्शन के लिए अभी तक पुलिस या प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है या नहीं।
यहीं से मामले में कानून-व्यवस्था और प्रदर्शन के अधिकार के बीच संतुलन का सवाल सामने आया।
‘आशंकाएं अनुभव पर आधारित होती हैं’
याचिकाकर्ता की ओर से दलील देते हुए डॉ. रिजवान ने कहा कि कानून-व्यवस्था को लेकर आशंकाएं हमेशा काल्पनिक नहीं होतीं।
उनके मुताबिक, कई बार छोटे स्तर पर पैदा हुई परिस्थितियां धीरे-धीरे बड़ी कानून-व्यवस्था की समस्या में बदल सकती हैं।
उन्होंने अदालत के सामने 12 और 13 सितंबर को राजधानी में अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की मौजूदगी का भी उल्लेख किया। उनका तर्क था कि ऐसे समय में दिल्ली में किसी अप्रिय घटना का असर देश की छवि पर पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर प्रदर्शन के दौरान मामूली लाठीचार्ज जैसी स्थिति भी पैदा होती है तो सवाल उठ सकते हैं कि प्रदर्शन स्थल तक उपद्रवी तत्व कैसे पहुंचे और पुलिस की तैयारी क्या थी।
अपनी दलील के समर्थन में उन्होंने AI Summit के दौरान हुई घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि उनकी आशंकाएं पिछले अनुभवों पर आधारित हैं।
‘BRICS Summit तक 10 दिन इंतजार क्यों नहीं?’
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह सुझाव भी दिया गया कि संबंधित संगठन अगर प्रदर्शन करना चाहता है तो पहले सरकार और प्रशासन से अनुमति मांगे।
डॉ. रिजवान ने सवाल उठाया कि यदि संगठन की मांगें उसके लिए महत्वपूर्ण हैं, तो क्या BRICS Summit के खत्म होने तक करीब 10 दिन इंतजार नहीं किया जा सकता?
उन्होंने कहा कि पहले सरकार से अनुमति लेने की कोशिश की जानी चाहिए और यदि अनुमति नहीं मिलती है, तो संबंधित पक्ष तत्काल सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है।
इस दलील का मकसद अदालत के सामने यह रखना था कि विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और राजधानी की कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाया जाना जरूरी है।
CJI सूर्यकांत ने फिलहाल आदेश देने से किया इनकार
मामले की सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने फिलहाल किसी तरह का बाध्यकारी आदेश जारी करने से इनकार कर दिया।
CJI ने कहा कि मामले के दो अलग-अलग पहलू हैं—एक कानून-व्यवस्था से जुड़ा है और दूसरा नीतिगत मुद्दे से।
अदालत ने कहा कि संबंधित पक्षों को पहले सरकार से बातचीत करने दी जानी चाहिए।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि फिलहाल कोर्ट यह मानकर चल रहा है कि सभी लोग जिम्मेदारी से, शांतिपूर्ण तरीके से और कानून के मुताबिक व्यवहार करेंगे।
अदालत के मुताबिक, इस समय ऐसी कोई बाध्यकारी परिस्थिति सामने नहीं है, जिसके आधार पर यह माना जाए कि कोई अप्रिय घटना होने वाली है।
यानी सोशल मीडिया पर मार्च के ऐलान को लेकर चिंता सामने आने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अभी से यह मान लेने से इनकार किया कि प्रदर्शन के दौरान अनहोनी जरूर होगी।
‘कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी’
CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार और संबंधित प्रवर्तन एजेंसियों की जिम्मेदारी है।
उन्हीं एजेंसियों को यह तय करना होगा कि किसी गतिविधि में क्या कानून के दायरे में है और क्या गैरकानूनी।
अदालत ने दोनों पक्षों से उम्मीद जताई कि वे कानून का सम्मान करेंगे और उसी के मुताबिक अपना आचरण करेंगे।
इसका मतलब साफ है कि फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावित मार्च को लेकर कोई ऐसा आदेश नहीं दिया है, जिससे प्रदर्शन को सीधे तौर पर रोका या अनुमति दी जाए।
मामले में प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी निभाने का अवसर दिया गया है।
हाई पावर कमेटी के सामने भी रखा जाएगा आवेदन
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि आवेदन की पूरी प्रति हाई पावर कमेटी के समक्ष भी रखी जाए, ताकि आवेदक का पक्ष वहां भी सामने आ सके।
अदालत ने मामले को सॉलिसिटर जनरल के समक्ष रखने और लंबित याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध करने को कहा।
मामले की अगली सुनवाई अब 10 सितंबर को होगी।
‘गंभीर स्थिति हो तो तुरंत कोर्ट आ सकते हैं’
सुप्रीम कोर्ट ने यह रास्ता खुला रखा है कि यदि आगे चलकर कोई गंभीर या चिंताजनक स्थिति पैदा होती है, तो संबंधित पक्ष तत्काल आवेदन देकर मामले का उल्लेख कर सकता है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा मामला उसके न्यायिक अधिकार क्षेत्र में आना चाहिए।
यानी कोर्ट ने फिलहाल किसी संभावित स्थिति के आधार पर हस्तक्षेप करने के बजाय यह संकेत दिया कि यदि वास्तव में कोई गंभीर परिस्थिति पैदा होती है, तो उस समय अदालत के सामने मामला लाया जा सकता है।
गैर-पक्षकार संगठन को कोर्ट में बुलाने की मांग पर क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता की ओर से यह मांग भी रखी गई कि मार्च का ऐलान करने वाले पक्ष को 3 सितंबर को कोर्ट के सामने पेश होने के लिए कहा जाए।
इस पर CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अदालत किसी ऐसे व्यक्ति या समूह को कोर्ट में पेश होने के लिए बाध्य नहीं कर सकती, जो मामले में पक्षकार ही नहीं है।
CJI ने यह भी कहा कि संबंधित पक्ष का कोई स्पष्ट या संगठित पता अदालत के सामने उपलब्ध नहीं है।
ऐसी स्थिति में अदालत ने सरकार के समक्ष आवेदन देना ही उचित रास्ता बताया।
अब 10 सितंबर पर टिकी नजर
फिलहाल इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोई रोक लगाने वाला आदेश जारी नहीं किया है।
5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च को लेकर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार और संबंधित एजेंसियों पर है।
कोर्ट ने यह उम्मीद जरूर जताई है कि सभी पक्ष शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से व्यवहार करेंगे।
लेकिन अगर आने वाले दिनों में स्थिति बदलती है और कोई गंभीर या अप्रिय परिस्थिति पैदा होती है, तो संबंधित पक्ष कानूनी प्रक्रिया के तहत तत्काल अदालत का रुख कर सकता है।
अब सबकी नजर 10 सितंबर की अगली सुनवाई पर है।
उस दिन अदालत के सामने मामले की स्थिति क्या होगी, सरकार और संबंधित एजेंसियां क्या रुख रखती हैं और क्या कोई नई परिस्थिति सामने आती है—इन सब पर आगे की दिशा तय हो सकती है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—
संभावना के आधार पर अभी आदेश नहीं, लेकिन गंभीर स्थिति पैदा होने पर कानून के दायरे में अदालत का दरवाजा खुला है।
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