उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में हुए कथित हॉफ एनकाउंटर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने गंभीर सवाल उठाते हुए CBI जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने पुलिस की कहानी को प्रथम दृष्टया संदिग्ध माना और पूछा कि पुलिसकर्मियों को चोट तक नहीं लगती, जबकि आरोपी को गोली हमेशा घुटने के नीचे कैसे लगती है। कोर्ट ने थाना प्रभारी की निशानेबाजी क्षमता की जांच कराने के भी निर्देश दिए हैं।
उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में हुए कथित हॉफ एनकाउंटर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने गंभीर सवाल उठाते हुए CBI जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने पुलिस की कहानी को प्रथम दृष्टया संदिग्ध माना और पूछा कि पुलिसकर्मियों को चोट तक नहीं लगती, जबकि आरोपी को गोली हमेशा घुटने के नीचे कैसे लगती है। कोर्ट ने थाना प्रभारी की निशानेबाजी क्षमता की जांच कराने के भी निर्देश दिए हैं।
लखनऊ/श्रावस्ती। उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों और कथित “हॉफ एनकाउंटर” को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बेहद गंभीर टिप्पणी की है। श्रावस्ती जिले में अलाउद्दीन उर्फ छोटकऊ के साथ हुए कथित पुलिस एनकाउंटर मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई और उसकी कहानी पर कई सवाल उठाए हैं।
हाईकोर्ट ने मामले की CBI जांच के आदेश देते हुए कहा कि उपलब्ध तथ्यों और रिकॉर्ड को देखने के बाद पुलिस की ओर से प्रस्तुत घटनाक्रम प्रथम दृष्टया कई सवाल खड़े करता है। अदालत ने पुलिस एफआईआर में मौजूद कथित विसंगतियों को भी गंभीरता से लिया और जांच एजेंसी को मामले की निष्पक्ष जांच कर रिपोर्ट यथासंभव तीन महीने के भीतर पेश करने का निर्देश दिया।
इस मामले में अदालत की सबसे चर्चित टिप्पणी पुलिस की गोलीबारी को लेकर रही। कोर्ट ने सवाल उठाया कि आखिर पुलिसकर्मियों को छर्रा तक क्यों नहीं लगता और अभियुक्तों को गोली अक्सर घुटने के नीचे ही कैसे लगती है। इस टिप्पणी के बाद उत्तर प्रदेश में कथित हॉफ एनकाउंटर की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर बहस तेज हो सकती है।
श्रावस्ती के अलाउद्दीन एनकाउंटर मामले में CBI जांच
मामला श्रावस्ती जिले के इकौना थाना क्षेत्र से जुड़ा है। अलाउद्दीन उर्फ छोटकऊ की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने CBI को मामले की जांच करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने इकौना थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 109 और आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत दर्ज एफआईआर की सत्यता की जांच करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने CBI से कहा है कि जांच पूरी कर यथासंभव तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी माना कि प्रथम दृष्टया थाना प्रभारी द्वारा घटना का गलत विवरण प्रस्तुत किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। पुलिस की ओर से दर्ज एफआईआर में कई ऐसी विसंगतियां बताई गईं, जिन पर अदालत ने विस्तृत जांच की जरूरत महसूस की।
अब थाना प्रभारी की निशानेबाजी क्षमता की भी होगी जांच
हाईकोर्ट ने इस मामले में एक असाधारण निर्देश देते हुए तत्कालीन थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे की निशानेबाजी क्षमता की भी जांच कराने को कहा है।
अदालत ने जांच के दौरान यह पता लगाने को कहा है कि क्या थाना प्रभारी रात के समय करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड किए जाने की आवाज सुनकर अपनी 9 एमएम सर्विस पिस्टल से इतना सटीक निशाना लगा सकते हैं कि दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगें।
कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट में बताए गए घावों के आकार और 9 एमएम की गोली से होने वाले घाव के संबंध में थाना प्रभारी के स्पष्टीकरण पर भी सवाल उठाए हैं। अब CBI जांच के दौरान इस तकनीकी पहलू की भी पड़ताल की जाएगी।
23 पुलिसकर्मी, एक आरोपी और कई अनसुलझे सवाल
पुलिस के अनुसार, कथित एनकाउंटर के दौरान अलाउद्दीन ने 23 सदस्यीय पुलिस टीम पर फायरिंग की थी। थाना प्रभारी का दावा था कि हथियार लोड किए जाने की आवाज सुनने के बाद उन्होंने आत्मरक्षा में दो गोलियां चलाईं और दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगीं।
हालांकि, याची के अधिवक्ता ने इस पूरी कहानी पर सवाल खड़े किए। अधिवक्ता के अनुसार एफआईआर में 13 पुलिसकर्मियों के एक ही सरकारी वाहन में सवार होने का उल्लेख है, जिसके बाद टीम के तीन हिस्से किए गए। दस्तावेजों में किसी दूसरे वाहन का जिक्र नहीं बताया गया।
बाद में 10 सदस्यीय स्वॉट टीम के मौके पर पहुंचने की बात सामने आई, जिसके बाद कथित कार्रवाई में शामिल पुलिसकर्मियों की कुल संख्या 23 हो गई।
अधिवक्ता ने सवाल उठाया कि 10 स्वॉट कर्मियों समेत कुल 23 सशस्त्र पुलिसकर्मी एक ई-रिक्शा पर सवार व्यक्ति को रोकने में कथित रूप से कैसे असफल रहे। यह भी तर्क दिया गया कि जिस व्यक्ति के पास कथित रूप से एक देसी तमंचा और केवल दो कारतूस थे, उससे निपटने के लिए पुलिस टीम के छिपने और अतिरिक्त बल बुलाने की कहानी कई सवाल पैदा करती है।
गोली लगने के बाद कराए गए कथित इकबालिया बयान पर भी संदेह
सुनवाई के दौरान अलाउद्दीन से गोली लगने के बाद कथित तौर पर दर्ज कराए गए इकबालिया बयान पर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए।
मामले की मूल घटना सात वर्षीय बच्ची के अपहरण से जुड़ी थी। बताया गया कि इस घटना के महज 61 मिनट के भीतर एफआईआर दर्ज कर ली गई थी। लेकिन शुरुआती एफआईआर में दुष्कर्म, रक्तस्राव या बच्ची के घायल होने जैसी किसी बात का उल्लेख नहीं था।
बाद में ये बातें अलाउद्दीन के कथित इकबालिया बयान में सामने आईं। इस पर हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि पुलिस द्वारा कथित रूप से झूठा इकबालिया बयान दर्ज किए जाने की संभावना की जांच जरूरी है।
कोर्ट ने इस तथ्य का भी संज्ञान लिया कि एनकाउंटर में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को अच्छे कार्य के लिए पुरस्कृत किया गया था। इसमें आरोपी से कथित इकबालिया बयान हासिल करने को भी उपलब्धि के रूप में शामिल किया गया था, जबकि जिस अपराध के संबंध में यह बयान बताया गया, उस मामले में अलाउद्दीन को पहले ही बरी किया जा चुका था।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के पालन पर भी सवाल
हाईकोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि गंभीर चोट वाले पुलिस मुठभेड़ मामलों की जांच के लिए जो प्रक्रिया तय की गई है, उसका वर्तमान मामले में प्रथम दृष्टया पालन नहीं किया गया।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने अलाउद्दीन को अंतरिम राहत देते हुए श्रावस्ती की सेशन कोर्ट के 2 जुलाई के उस आदेश के क्रियान्वयन पर भी रोक लगा दी, जिसमें उसकी डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी गई थी।
अब मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी। उससे पहले CBI जांच इस पूरे कथित एनकाउंटर की परिस्थितियों, पुलिस की एफआईआर, गोली चलने की घटना, मेडिकल रिपोर्ट, कथित इकबालिया बयान और घटना में शामिल पुलिसकर्मियों की भूमिका सहित विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करेगी।
‘हॉफ एनकाउंटर’ पर फिर उठे बड़े सवाल
श्रावस्ती का यह मामला केवल एक पुलिस मुठभेड़ की जांच तक सीमित नहीं माना जा रहा। हाईकोर्ट की टिप्पणियों ने उस पैटर्न पर भी सवाल खड़ा किया है, जिसे आम बोलचाल में “हॉफ एनकाउंटर” कहा जाता है।
अदालत ने जिस तरह पुलिस की गोलीबारी, आरोपी को लगी चोटों और पुलिस टीम की पूरी कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं, उससे जांच के बाद कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने की संभावना है।
फिलहाल, CBI को मामले की विस्तृत जांच कर रिपोर्ट यथासंभव तीन महीने में अदालत के समक्ष रखनी है। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि जांच एजेंसी पुलिस की कहानी को सही पाती है या हाईकोर्ट की ओर से उठाए गए सवालों के पीछे कोई अलग तस्वीर सामने आती है।
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