दुनिया का पहला क्लाइमेट कम्युनिकेशन और एजुकेशन इनोवेशन मॉडल तथा 7-पैमाना रणनीतिक रोडमैप लॉन्च किया गया है। यह मॉडल जलवायु परिवर्तन, सूखा, जल संकट, ऊर्जा कमी, कृषि उत्पादन और क्लाइमेट रिफ्यूजी जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए जमीनी स्तर से लेकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तक समाधान और सतत विकास की रणनीति प्रस्तुत करता है।
जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट, युद्ध, सूखा और खाद्य उत्पादन की चुनौतियों के बीच वैश्विक स्तर पर एक नए ‘क्लाइमेट कम्युनिकेशन और एजुकेशन’ इनोवेशन मॉडल और रणनीतिक रोडमैप को जारी किया गया है। इस मॉडल को इसके इनोवेटर और पुस्तक के लेखक सौवक चक्रवर्ती ने तैयार किया है। दावा किया गया है कि यह मॉडल दुनिया भर के देशों के लिए एक समान रूप से उपयोगी ढांचा प्रस्तुत करता है और इसमें विकसित तथा विकासशील देशों के लिए अलग-अलग मानक निर्धारित नहीं किए गए हैं।
यह मॉडल केवल जलवायु परिवर्तन की सैद्धांतिक चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर के विकास, ग्रामीण समुदायों, कृषि, उत्पादन, स्थानीय संसाधनों और राष्ट्रीय आर्थिक रणनीति को भी जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में जोड़ने का प्रयास करता है।
बदलती ग्लोबल इकॉनमी के सामने बड़ी चुनौती
दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है। कई देश ऊर्जा की कमी, युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव, जनसंख्या में बदलाव तथा असामान्य मौसम और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन का सीधा असर कृषि और उत्पादन पर पड़ रहा है। उत्पादन में कमी और खेती के बदलते स्वरूप का प्रभाव किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और GDP पर पड़ सकता है। ऐसे में इस नए मॉडल और रणनीतिक रोडमैप को नीति निर्माण और भविष्य की विकास योजनाओं से जोड़ने की कोशिश की गई है।
लेखक और इनोवेटर सौवक चक्रवर्ती के अनुसार, जलवायु संकट से निपटने के लिए केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए आम लोगों तक जलवायु शिक्षा और प्रभावी संचार पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
6 वर्षों के अनुभव से तैयार हुआ मॉडल
बताया गया है कि इस इनोवेशन मॉडल और रोडमैप को तैयार करने में सौवक चक्रवर्ती ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दों और व्यक्तिगत व सामाजिक विकास की रणनीतियों पर अपने लगभग 6 वर्षों के अनुभव का उपयोग किया है।
इस मॉडल में 7 प्रमुख पैमानों के माध्यम से जमीनी स्तर पर जलवायु चुनौतियों को समझने और उनके समाधान की दिशा में काम करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसका उद्देश्य ग्रामीण समुदायों को भी सीधे तौर पर इससे जोड़ना है, ताकि वे बदलती जलवायु परिस्थितियों को समझकर अपनी खेती, उत्पादन और स्थानीय विकास के लिए बेहतर रणनीति तैयार कर सकें।
सूखा, कम बारिश और जल संकट से निपटने पर फोकस
रोडमैप में शून्य या बेहद कम बारिश जैसी परिस्थितियों, स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण और विकास तथा अत्यधिक गर्मी और सूखे की स्थिति में समुदायों की तैयारी पर विशेष ध्यान दिया गया है।
इसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर ऐसे समाधान विकसित करना है, जिनकी मदद से ग्रामीण और कृषि आधारित समुदाय जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले जोखिमों को समझ सकें और अपनी उत्पादन क्षमता तथा आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए पहले से योजना बना सकें।
भारत से अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक उपयोग की संभावना
इस मॉडल को एक ‘ग्लोबल विलेज’ दृष्टिकोण के साथ तैयार किया गया है। दावा है कि भारत से लेकर सूडान, कैमरून और इंडोनेशिया जैसे विभिन्न भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियों वाले देशों में भी इसके सिद्धांतों का उपयोग किया जा सकता है।
ऊर्जा संकट, युद्ध, खाद्य सुरक्षा, जल संकट और बदलते मौसम जैसे वैश्विक मुद्दों के बीच यह मॉडल नीति निर्माताओं, स्थानीय समुदायों और विकास से जुड़े संगठनों को एक सकारात्मक और रणनीतिक दिशा देने का प्रयास करता है।
‘क्लाइमेट रिफ्यूजी’ बनती आबादी भी बड़ी चिंता
जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापन भी दुनिया के सामने एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। लेखक के अनुसार, बड़ी संख्या में लोग जलवायु संबंधी कारणों से अपने घर और आजीविका के स्थान छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं। ऐसे लोगों को अक्सर ‘क्लाइमेट रिफ्यूजी’ या जलवायु विस्थापित कहा जाता है।
सौवक चक्रवर्ती का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से प्रभावित लोगों और समुदायों से जुड़े आंकड़ों तथा जमीनी स्तर की जानकारी को बेहतर तरीके से समझने और दर्ज करने की आवश्यकता है।
प्रशांत महासागर के छोटे द्वीपीय देशों के सामने समुद्र-स्तर बढ़ने का खतरा भी लगातार गंभीर होता जा रहा है। तुवालु जैसे देशों के सामने जलवायु परिवर्तन के कारण अस्तित्व और भविष्य के पुनर्वास से जुड़े सवाल खड़े हैं।
जलवायु शिक्षा और संचार को मजबूत बनाने की जरूरत
इस नए मॉडल का मुख्य संदेश यह है कि जलवायु परिवर्तन को केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। आम नागरिकों, किसानों, ग्रामीण समुदायों और स्थानीय संस्थाओं को सरल भाषा में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और संभावित समाधानों की जानकारी देना जरूरी है।
‘क्लाइमेट कम्युनिकेशन और एजुकेशन’ मॉडल इसी सोच के साथ तैयार किया गया है, जिसमें जलवायु शिक्षा को विकास, अर्थव्यवस्था, कृषि और स्थानीय संसाधनों से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
ऐसे समय में जब दुनिया जलवायु संकट के साथ-साथ युद्ध, ऊर्जा अस्थिरता और खाद्य सुरक्षा जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रही है, यह नया 7-पैमाना रोडमैप वैश्विक और स्थानीय स्तर पर जलवायु संबंधी योजना और सतत विकास की दिशा में एक नए दृष्टिकोण के रूप में सामने आया है।
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