पिछले छह हफ्तों में कांग्रेस के 9 AI-जनरेटेड वीडियो हटाए जाने का दावा। केंद्र और कुछ राज्यों पर IT नियमों के दुरुपयोग के आरोप। MeitY और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की भूमिका पर भी सवाल।
देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर चर्चा तेज है, लेकिन इसी बीच AI-जनरेटेड राजनीतिक वीडियो को लेकर सियासी टकराव भी उभर आया है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दावा किया है कि पिछले छह हफ्तों में उसके 9 AI-जनरेटेड वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से डिलीट या ब्लॉक कराए गए। पार्टी का आरोप है कि ये कार्रवाई केंद्र और कुछ BJP-शासित राज्यों के निर्देशों पर की गई।
कांग्रेस के मुताबिक, सभी वीडियो में स्पष्ट रूप से “AI Generated Video” का डिस्क्लेमर पूरे समय प्रदर्शित था, ताकि किसी प्रकार का भ्रम न फैले। पार्टी का कहना है कि ये वीडियो राजनीतिक व्यंग्य और सार्वजनिक मुद्दों पर टिप्पणी थे—जिनमें राष्ट्रीय सुरक्षा, ट्रेड डील, रूस से तेल खरीद, किसानों के हित, उद्योगपतियों से जुड़े आरोप, और संसद में आचरण जैसे विषय शामिल थे। विपक्ष का दावा है कि ये वही मुद्दे हैं जो सड़क से लेकर संसद तक उठाए जा रहे हैं।

कांग्रेस का आरोप है कि कुछ टेकडाउन आदेश BJP-शासित राज्यों—जैसे बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र—की पुलिस द्वारा भेजे गए, जबकि कुछ आदेश सीधे केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय (MeitY) से आए। इन आदेशों में प्रायः सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A और 79(3)(B) का हवाला दिया गया।
इसके अलावा भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 353 और 356 का भी उल्लेख बताया गया है, जो मानहानि, भय/अलार्म उत्पन्न करने या वैमनस्य फैलाने से संबंधित प्रावधानों से जुड़ी हैं।
कांग्रेस ने IT Rules, 2021 के “दुरुपयोग” का आरोप लगाते हुए कहा कि ब्लॉकिंग आदेशों में पारदर्शिता का अभाव है और अधिकांश आदेश गोपनीय होते हैं, जिससे न्यायिक चुनौती देना कठिन हो जाता है। पार्टी ने “सहयोग” नामक ऑनलाइन सेंसरशिप पोर्टल पर भी चिंता जताई, जिसके जरिए विभिन्न मंत्रालयों के अधिकारी टेकडाउन आदेश जारी कर सकते हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स—Meta, YouTube और X—की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। कांग्रेस का कहना है कि सरकारी नोटिस मिलते ही प्लेटफॉर्म्स तत्परता से कंटेंट हटाते हैं और कुछ कंटेंट क्रिएटर्स को डिमोनेटाइज भी किया जा रहा है, जिससे आजीविका प्रभावित होती है।
वहीं, सरकार और संबंधित एजेंसियों की ओर से इस मामले पर आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। समर्थक पक्ष का तर्क है कि डीपफेक, भ्रामक या उत्तेजक सामग्री पर कार्रवाई कानूनन आवश्यक हो सकती है।
AI, राजनीतिक व्यंग्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन का प्रश्न अब राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के दायरे में रहकर इस विवाद का समाधान कैसे निकलता है।
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