उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से लखनऊ के स्पंदन सभागार में स्थायी लोक अदालतों के अध्यक्षों और सदस्यों के लिए राज्य स्तरीय ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित किया गया। न्यायमूर्ति आलोक माथुर ने जन उपयोगी सेवाओं से जुड़े विवादों के त्वरित, सुलभ और किफायती निस्तारण में स्थायी लोक अदालतों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम में सुलह की प्रक्रिया, क्षेत्राधिकार, व्यवहारिक चुनौतियों और प्रभावी न्याय व्यवस्था पर विस्तार से चर्चा हुई।
आम नागरिकों के सामने जब बिजली, पानी, परिवहन, डाक, बीमा या दूसरी जन उपयोगी सेवाओं से जुड़े विवाद खड़े होते हैं, तो उन्हें अक्सर न्याय पाने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया और खर्च की चिंता सताती है। ऐसे में क्या कोई ऐसा मंच हो सकता है, जहां बातचीत और आपसी सहमति के जरिए विवाद का समाधान निकले और लोगों को अदालतों की जटिल प्रक्रिया से भी राहत मिले? इसी सवाल को केंद्र में रखते हुए उत्तर प्रदेश में स्थायी लोक अदालतों की कार्यप्रणाली को और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है।
राजधानी लखनऊ के स्पंदन सभागार में शनिवार, 31 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश की समस्त स्थायी लोक अदालतों के अध्यक्षों और सदस्यों के लिए राज्य स्तरीय अभिमुखीकरण यानी ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित किया गया। उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (UPSLSA) की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्थायी लोक अदालतों की कार्यप्रणाली को मजबूत करना, उनके सामने आने वाली व्यवहारिक चुनौतियों पर चर्चा करना और आम नागरिकों को त्वरित, सुलभ तथा किफायती न्याय उपलब्ध कराने की व्यवस्था को बेहतर बनाना रहा।
न्यायमूर्ति आलोक माथुर ने बताई स्थायी लोक अदालतों की अहमियत
कार्यक्रम में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आलोक माथुर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। अपने संबोधन में उन्होंने वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution-ADR) संस्थाओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

न्यायमूर्ति माथुर ने कहा कि स्थायी लोक अदालतें आम नागरिकों के जीवन से सीधे जुड़े जन उपयोगी सेवाओं के विवादों को सुलझाने का एक सशक्त और प्रभावी माध्यम हैं। इनके जरिए ऐसे मामलों का समाधान निकालने की कोशिश की जाती है, जिनका संबंध आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों और सुविधाओं से होता है।
उन्होंने विशेष रूप से सुलह यानी कॉन्सिलिएशन की प्रक्रिया पर बात करते हुए कहा कि इसे किसी तयशुदा या औपचारिक ढांचे तक सीमित नहीं समझना चाहिए। सुलह की असली ताकत निरंतर संवाद, आपसी समझ और सौहार्दपूर्ण समाधान की भावना में है। उन्होंने स्थायी लोक अदालतों के अध्यक्षों और सदस्यों से अपील की कि अनिवार्य सुलह की प्रक्रिया के दौरान निष्पक्षता, संवेदनशीलता और पारदर्शिता बनाए रखें, ताकि विवाद से जुड़े सभी पक्षों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कायम रहे।
शीर्ष न्यायिक नेतृत्व के संरक्षण और मार्गदर्शन में हुआ आयोजन
यह राज्य स्तरीय कार्यक्रम सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकान्त तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ के संरक्षण में आयोजित किया गया।
इसके साथ ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के मुख्य संरक्षक न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश तथा UPSLSA के कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरिन्दम सिन्हा का मार्गदर्शन भी कार्यक्रम को प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम की शुरुआत उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की सदस्य सचिव डॉ. मनु कालिया द्वारा अतिथियों के स्वागत के साथ हुई। अपने स्वागत भाषण में उन्होंने स्थायी लोक अदालतों की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि इन संस्थाओं का काम केवल नियमित न्यायालयों की तरह न्यायिक निर्णय सुनाना नहीं है। इनका प्राथमिक दायित्व दोनों पक्षों के बीच सार्थक संवाद स्थापित कराकर सहमति और सुलह के आधार पर ऐसा समाधान निकालना है, जिसे सभी पक्ष स्वीकार कर सकें।

COMMENTS