ग्रेटर नोएडा की शारदा यूनिवर्सिटी में जीएसटी सुधारों को आम नागरिकों तक सरल और प्रभावी तरीके से पहुंचाने को लेकर दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। ICSSR और शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग एवं प्रायोजन में हुए इस सम्मेलन में विशेषज्ञों, पत्रकारों और शिक्षाविदों ने आर्थिक नीतियों की जानकारी को जनसामान्य तक पहुंचाने में मीडिया की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।
जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा ऐसा विषय है, जिसका असर कारोबार से लेकर आम उपभोक्ता की रोजमर्रा की खरीदारी तक दिखाई देता है। बावजूद इसके, जीएसटी और उससे जुड़े आर्थिक सुधारों की भाषा अक्सर इतनी तकनीकी होती है कि आम नागरिक के लिए उसे समझना आसान नहीं होता।
इसी चुनौती को केंद्र में रखते हुए ग्रेटर नोएडा स्थित शारदा यूनिवर्सिटी में जीएसटी सुधारों और मीडिया की भूमिका पर व्यापक चर्चा हुई। विश्वविद्यालय के शारदा स्कूल ऑफ मीडिया, फिल्म एंड एंटरटेनमेंट की ओर से “मीडिया परिप्रेक्ष्य से जीएसटी सुधार: नागरिकों को सशक्त बनाना और विकसित भारत के लिए जन-जागरूकता बढ़ाना” विषय पर दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया।
यह कॉन्फ्रेंस भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग एवं प्रायोजन में आयोजित की गई।
सम्मेलन का मूल सवाल यही रहा कि जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों को विशेषज्ञों और कारोबारी वर्ग की सीमाओं से बाहर निकालकर आम नागरिक की समझ तक कैसे पहुंचाया जाए।
जटिल आर्थिक नीति को सरल भाषा में समझाना जरूरी
कॉन्फ्रेंस में विशेषज्ञों ने कहा कि जीएसटी केवल अर्थशास्त्रियों, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स या कारोबारियों से जुड़ा विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध आम नागरिक से भी है।
एक उपभोक्ता जब कोई वस्तु या सेवा खरीदता है, तब वह अप्रत्यक्ष रूप से कर व्यवस्था का हिस्सा बनता है। ऐसे में उसके लिए यह समझना जरूरी है कि जीएसटी क्या है, इसका प्रभाव कैसे पड़ता है और आर्थिक सुधारों का व्यापक उद्देश्य क्या है।
वक्ताओं ने कहा कि तकनीकी और जटिल आर्थिक भाषा के बजाय सरल, तथ्यात्मक और भरोसेमंद जानकारी आम लोगों तक पहुंचाई जानी चाहिए।
यहीं मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

कॉन्फ्रेंस में मीडिया को सरकार की आर्थिक नीतियों और आम जनता के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बताया गया।
विशेषज्ञों का कहना था कि आर्थिक नीतियां अगर केवल सरकारी दस्तावेजों या तकनीकी रिपोर्टों तक सीमित रह जाएं तो उनका वास्तविक प्रभाव आम नागरिकों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता।
जिम्मेदार पत्रकारिता इन जटिल विषयों को सरल भाषा, उदाहरणों और तथ्यात्मक जानकारी के माध्यम से जनता के सामने रख सकती है।
इससे नागरिक न केवल आर्थिक नीतियों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं, बल्कि अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को लेकर भी अधिक जागरूक हो सकते हैं।
डिजिटल मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, हर प्लेटफॉर्म की भूमिका
दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस में यह भी चर्चा हुई कि आज के डिजिटल दौर में जीएसटी सुधारों और आर्थिक नीतियों की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए मीडिया के पास पहले के मुकाबले कहीं अधिक माध्यम उपलब्ध हैं।
टेलीविजन, रेडियो और प्रिंट मीडिया के साथ-साथ अब डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, वीडियो, पॉडकास्ट और इन्फोग्राफिक्स के जरिए भी जटिल आर्थिक विषयों को सरल तरीके से समझाया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि यदि जीएसटी जैसे विषयों को आंकड़ों की भारी-भरकम भाषा के बजाय छोटे वीडियो, ग्राफिक्स, आसान उदाहरण और सवाल-जवाब के प्रारूप में प्रस्तुत किया जाए तो आम नागरिक की समझ और रुचि दोनों बढ़ सकती हैं।
हालांकि, इसके साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।
गलत या अधूरी आर्थिक जानकारी लोगों में भ्रम पैदा कर सकती है। इसलिए मीडिया संस्थानों को तथ्यों की पुष्टि, निष्पक्षता और संदर्भ का विशेष ध्यान रखना होगा।

यह नेशनल कॉन्फ्रेंस केवल विशेषज्ञों के बीच चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि मीडिया विद्यार्थियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सीखने का मंच बनी।
विभिन्न मीडिया संस्थानों से जुड़े प्रोफेशनल्स और पत्रकारों ने विद्यार्थियों के साथ अपने अनुभव साझा किए।
इस दौरान आर्थिक मुद्दों की रिपोर्टिंग, न्यूज प्रेजेंटेशन, डिजिटल पत्रकारिता और जिम्मेदार मीडिया कवरेज के व्यावहारिक पहलुओं पर चर्चा की गई।
विद्यार्थियों ने विशेषज्ञों से सीधे संवाद किया और आर्थिक पत्रकारिता से जुड़े सवाल पूछकर यह समझने की कोशिश की कि किसी जटिल आर्थिक विषय को खबर में किस तरह प्रस्तुत किया जाए।
विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि आर्थिक पत्रकारिता में केवल आंकड़े जुटाना पर्याप्त नहीं है। पत्रकार को यह भी समझना होता है कि उन आंकड़ों का आम नागरिक के जीवन पर क्या असर पड़ रहा है।
मुख्य अतिथि ने कहा—नागरिकों को तकनीकी नहीं, विश्वसनीय जानकारी चाहिए
सम्मेलन के मुख्य अतिथि डॉ. यशोवर्धन पाठक, कमिश्नर, जीएसटी एवं सेंट्रल एक्साइज, भारत सरकार ने कहा कि जीएसटी जैसे आर्थिक सुधारों को समझने के लिए आम नागरिक को जटिल तकनीकी भाषा की आवश्यकता नहीं है।
उन्होंने कहा कि लोगों तक सरल और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना जरूरी है और मीडिया इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उनके मुताबिक जब आर्थिक नीतियों की सही जानकारी जनता तक पहुंचेगी, तब नागरिक अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। इससे देश की आर्थिक प्रगति में उनकी भागीदारी भी अधिक प्रभावी हो सकती है।
विकसित भारत के लिए जागरूक नागरिक जरूरी: डीन रितु एस. सूद
शारदा स्कूल ऑफ मीडिया, फिल्म एंड एंटरटेनमेंट की डीन डॉ. रितु एस. सूद ने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है।
उन्होंने कहा कि इसके लिए जागरूक और जिम्मेदार नागरिकों की भी आवश्यकता है।
उनके अनुसार आर्थिक सुधारों को लेकर सही जन-जागरूकता लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करती है। इसलिए मीडिया संस्थानों और पत्रकारों की जिम्मेदारी है कि आर्थिक नीतियों को तथ्यों के साथ, निष्पक्ष तरीके से और आम जनता की समझ के अनुरूप प्रस्तुत किया जाए।
कॉन्फ्रेंस में शारदा यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. (डॉ.) सिबराम खारा सहित विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ शिक्षाविद और अधिकारी मौजूद रहे।
कार्यक्रम में प्रो. डॉ. दुर्गेश त्रिपाठी, प्रो. दुष्यंत कुमार राय, प्रो. डॉ. सचिन भारती, प्रो. रमेश कुमार शर्मा, डॉ. सोनाली श्रीवास्तव, डॉ. मुक्ता मारटोलिया, डॉ. ध्रुव सभरवाल, प्रो. दीपाली वर्मा, प्रो. अशरफ अली और डॉ. श्रृंखला उपाध्याय सहित विभिन्न विभागों के हेड, डीन, फैकल्टी मेंबर्स, स्टाफ और विद्यार्थी शामिल हुए।
अब चुनौती जागरूकता को जमीन तक पहुंचाने की
दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस ने एक महत्वपूर्ण सवाल को सामने रखा—क्या आर्थिक सुधारों की जानकारी केवल विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय रहेगी या आम नागरिक भी उसे उतनी ही आसानी से समझ पाएगा?
जीएसटी जैसे सुधारों की सफलता केवल नीतियों के निर्माण से नहीं, बल्कि उनके बारे में नागरिकों की समझ और स्वीकार्यता से भी जुड़ी है।
यही वजह है कि शारदा यूनिवर्सिटी में हुई यह चर्चा केवल जीएसटी तक सीमित नहीं रही। इसमें यह भी सामने आया कि मीडिया आने वाले समय में आर्थिक साक्षरता और नागरिक जागरूकता का कितना प्रभावी माध्यम बन सकता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से बदल रहे हैं और सूचना की रफ्तार पहले से कहीं ज्यादा है। ऐसे में चुनौती यह होगी कि इस तेज रफ्तार के बीच सही जानकारी, सही संदर्भ और जिम्मेदार पत्रकारिता को कैसे बनाए रखा जाए।
यही संतुलन विकसित भारत की दिशा में आर्थिक जागरूकता को एक मजबूत आधार दे सकता है।
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