हरियाणा में निर्वाचन आयोग की ओर से चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के पहले चरण का काम पूरा हो गया है। इस प्रक्रिया के बाद राज्य के करीब 34 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। आयोग के अनुसार इनमें ऐसे मतदाता शामिल हैं, जो स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले गए, जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जिनके नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज पाए गए थे। अब 31 जुलाई से 30 अगस्त तक दावा और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया जाएगा।
हरियाणा में विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। निर्वाचन आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन या एसआईआर) अभियान का पहला चरण पूरा होने के बाद राज्य की सभी 90 विधानसभा सीटों के लिए मतदाता सूची का प्रारूप जारी कर दिया है।
इस प्रक्रिया के दौरान करीब 34 लाख ऐसे नाम सामने आए, जो विभिन्न कारणों से सूची से बाहर कर दिए गए। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है, जो स्थायी रूप से दूसरे स्थानों पर चले गए थे। इसके अलावा लाखों ऐसे मतदाता भी पाए गए, जिनकी मृत्यु हो चुकी थी या जिनके नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज थे।
निर्वाचन आयोग के इस कदम ने राजनीतिक दलों के बीच नई बहस को जन्म दे दिया है। एक ओर आयोग इस प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यवस्थित बता रहा है तो दूसरी ओर कई राजनीतिक दल इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
दो करोड़ से अधिक मतदाताओं तक पहुंचा आयोग
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में कुल 2 करोड़ 6 लाख 55 हजार 929 मतदाता पंजीकृत थे। इन सभी मतदाताओं तक पहुंचने के लिए राज्य भर में बड़े पैमाने पर अभियान चलाया गया।
इस दौरान 20,629 बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) को जिम्मेदारी सौंपी गई। इन अधिकारियों ने मतदाताओं के घर-घर जाकर गणना प्रपत्र वितरित किए और उनकी जानकारी को अद्यतन करने का काम किया।
आंकड़ों के मुताबिक, 24 जुलाई तक 1 करोड़ 72 लाख 72 हजार 627 मतदाताओं ने अपने गणना प्रपत्र जमा कर दिए थे। निर्वाचन आयोग का कहना है कि यह संख्या इस अभियान में लोगों की सक्रिय भागीदारी को दर्शाती है।
आखिर क्यों हटाए गए 34 लाख नाम?
मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान सबसे ज्यादा संख्या उन मतदाताओं की पाई गई, जो किसी अन्य स्थान पर स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके थे।
निर्वाचन आयोग के मुताबिक, लगभग 24 लाख 13 हजार लोग या तो दूसरे स्थानों पर जा चुके थे या लंबे समय से अपने पंजीकृत पते पर मौजूद नहीं थे।
इसके अलावा 7 लाख 66 हजार मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी थी, जबकि 2 लाख 4 हजार मतदाताओं के नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज पाए गए।
आयोग का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए इन नामों को सूची से हटाया गया है।
अगर नाम कट गया है तो क्या करें?
निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से सूची से बाहर हो गया है तो उसे घबराने की आवश्यकता नहीं है।
ऐसे मतदाता 31 जुलाई से 30 अगस्त तक दावा और आपत्ति प्रक्रिया के तहत अपना आवेदन जमा कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें निर्धारित घोषणा-पत्र के साथ फॉर्म-6 भरना होगा।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज पाए गए हैं, उनके नाम केवल एक ही स्थान की सूची में रखे जाएंगे।
तीन अक्टूबर को जारी होगी अंतिम सूची
दावा और आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया 31 जुलाई से 28 सितंबर तक चलेगी। इसके बाद तीन अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रक्रिया आगामी चुनावों पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है। इसलिए राजनीतिक दल भी इस पूरी प्रक्रिया पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
हजारों अधिकारियों ने संभाली जिम्मेदारी
निर्वाचन आयोग ने इस अभियान की सफलता का श्रेय विभिन्न स्तरों पर काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को दिया है।
इस पूरी प्रक्रिया में राज्य के 23 जिलों के जिला निर्वाचन अधिकारी (डीईओ), 90 निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ), 1,594 सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (एईआरओ), 2,244 बीएलओ पर्यवेक्षक और 20,629 बूथ स्तरीय अधिकारी शामिल रहे।
इसके अलावा बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने भी इस अभियान में सहयोग किया।
राजनीतिक दलों ने भी निभाई भूमिका
निर्वाचन आयोग के अनुसार, राजनीतिक दलों ने भी इस अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाई। विभिन्न दलों की ओर से कुल 36,998 बूथ स्तरीय एजेंट (बीएलए) नियुक्त किए गए थे।
इसी सिलसिले में शुक्रवार को हरियाणा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय में राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक आयोजित की गई। बैठक के दौरान उन्हें दावा और आपत्ति प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी दी गई और मतदाता सूची की प्रतियां भी उपलब्ध कराई गईं।
चुनाव से पहले बड़ा सवाल
मतदाता सूची से 34 लाख नाम हटाए जाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इससे चुनावी समीकरण बदलेंगे या फिर दावा और आपत्ति प्रक्रिया के बाद इन आंकड़ों में बदलाव देखने को मिलेगा।
फिलहाल निर्वाचन आयोग इसे पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुरूप प्रक्रिया बता रहा है। वहीं, राजनीतिक दल इस पूरी कवायद पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा हरियाणा की राजनीति में चर्चा का एक प्रमुख विषय बन सकता है।
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