उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग ने पशुजन्य (ज़ूनोटिक) और प्रमुख पशु रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए लखनऊ में दो दिवसीय राज्य स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया है। इस प्रशिक्षण में 75 जिलों के 150 सरकारी पशु चिकित्सकों को मास्टर ट्रेनर के रूप में तैयार किया जाएगा, जो आगे जिला स्तर पर पशु चिकित्सकों और पैरावेट कर्मचारियों को प्रशिक्षित करेंगे।
कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी के बाद दुनिया भर में पशुओं से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में ज़ूनोटिक (Zoonotic) रोग कहा जाता है, को लेकर सतर्कता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार ने भविष्य में किसी भी संभावित स्वास्थ्य संकट से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। पशुपालन विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार ने पशु चिकित्सकों के लिए 16 और 17 जुलाई 2026 को लखनऊ के गोमतीनगर स्थित होटल मर्क्योर में दो दिवसीय राज्य स्तरीय ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स (ToT) कार्यक्रम का आयोजन किया है।
इस प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल पशु रोगों का इलाज करना नहीं, बल्कि उन बीमारियों की समय रहते पहचान, निगरानी, रोकथाम और नियंत्रण की ऐसी मजबूत व्यवस्था तैयार करना है, जिससे पशुओं के साथ-साथ इंसानों को भी सुरक्षित रखा जा सके।
क्यों जरूरी है यह प्रशिक्षण?
विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया में सामने आने वाली कई गंभीर संक्रामक बीमारियां पशुओं से इंसानों में फैली हैं। कोरोना वायरस, बर्ड फ्लू, रेबीज, निपाह वायरस और कई अन्य संक्रमण इस बात के उदाहरण हैं कि यदि पशु रोगों की समय रहते पहचान न हो तो वे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं।
इसी खतरे को देखते हुए उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग ने पशु चिकित्सकों की क्षमता बढ़ाने और रोगों की प्रारंभिक पहचान को मजबूत करने के उद्देश्य से यह विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया है।
40 जिलों से पहुंचे 80 सरकारी पशु चिकित्सक
प्रशिक्षण के पहले चरण में प्रदेश के 40 जिलों से 80 सरकारी पशु चिकित्सकों ने भाग लिया। यह कार्यक्रम Jhpiego परियोजना के अंतर्गत आयोजित किया जा रहा है, जिसमें विभिन्न विशेषज्ञ संस्थानों का तकनीकी सहयोग भी शामिल है।
कार्यक्रम का उद्घाटन पशुपालन विभाग के विशेष सचिव देवेंद्र कुमार पांडेय ने किया। इस अवसर पर विभाग के निदेशक (प्रशासन एवं विकास) डॉ. राजेंद्र प्रसाद, निदेशक डॉ. संगीता तिवारी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

'पशु चिकित्सक ही होते हैं पहली सुरक्षा पंक्ति'
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विशेष सचिव देवेंद्र कुमार पांडेय ने कहा कि किसी भी असामान्य पशु रोग की पहचान सबसे पहले पशु चिकित्सक ही करते हैं। इसलिए वे केवल इलाज करने वाले डॉक्टर नहीं, बल्कि रोग नियंत्रण प्रणाली के "फर्स्ट रिस्पॉन्डर" भी हैं।
उन्होंने कहा कि रोगों की समय पर पहचान, नमूना संग्रह, प्रयोगशाला जांच, रोग की रिपोर्टिंग, पशुपालकों को जागरूक करना और संक्रमण फैलने से रोकना पशु चिकित्सकों की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल है।
उन्होंने प्रतिभागियों से अपील की कि प्रशिक्षण में सीखी गई तकनीकों को अपने-अपने जिलों में प्रभावी ढंग से लागू करें और अन्य पशु चिकित्सकों तथा पैरावेट कर्मचारियों को भी प्रशिक्षित करें।
किन बीमारियों पर दिया जा रहा विशेष प्रशिक्षण?
दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों को कई गंभीर और उभरते रोगों के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं।
इन तकनीकी सत्रों में शामिल प्रमुख रोग हैं—
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रेबीज (Rabies)
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बर्ड फ्लू (Avian Influenza)
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लेप्टोस्पायरोसिस
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जापानी इंसेफेलाइटिस
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बोवाइन ट्यूबरकुलोसिस
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सीसीएचएफ (Crimean-Congo Hemorrhagic Fever)
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एन्थ्रेक्स
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स्क्रब टाइफस
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ग्लैंडर्स
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लंपी स्किन डिजीज
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ब्रुसेलोसिस
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साल्मोनेलोसिस
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डर्माटोफाइटोसिस
विशेषज्ञ इन रोगों के लक्षण, संक्रमण के तरीके, रोकथाम, उपचार और निगरानी व्यवस्था पर विस्तार से प्रशिक्षण दे रहे हैं।
केवल इलाज नहीं, निगरानी व्यवस्था भी होगी मजबूत
प्रशिक्षण के दौरान केवल बीमारियों की जानकारी ही नहीं दी जा रही, बल्कि आधुनिक रोग निगरानी प्रणाली पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।
प्रतिभागियों को निम्न विषयों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है—
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रोगों की मानकीकृत पहचान (Standard Case Definition)
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जैव सुरक्षा (Biosecurity)
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सुरक्षित नमूना संग्रह
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नमूनों की पैकिंग एवं परिवहन
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प्रयोगशाला जांच की प्रक्रिया
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रोग प्रकोप की वैज्ञानिक जांच
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समयबद्ध रिपोर्टिंग
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संक्रमण नियंत्रण की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रारंभिक स्तर पर रोगों की सही पहचान हो जाए तो बड़े प्रकोप को रोका जा सकता है।
75 जिलों में तैयार होंगे मास्टर ट्रेनर
इस राज्य स्तरीय कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके माध्यम से केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा जाएगा।
उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के 150 सरकारी पशु चिकित्सकों को मास्टर ट्रेनर के रूप में तैयार किया जाएगा। इसके बाद यही प्रशिक्षित चिकित्सक अपने-अपने जिलों में कार्यरत अन्य पशु चिकित्सकों, पशुधन प्रसार अधिकारियों और पैरावेट कर्मचारियों को प्रशिक्षण देंगे।
इस "कैस्केड ट्रेनिंग मॉडल" से पूरे प्रदेश में एक समान और मजबूत पशु रोग निगरानी तंत्र विकसित करने में मदद मिलेगी।

'वन हेल्थ' मॉडल की दिशा में बड़ा कदम
यह पूरा प्रशिक्षण कार्यक्रम 'वन हेल्थ (One Health)' अवधारणा पर आधारित है।
वन हेल्थ का अर्थ है कि इंसानों, पशुओं और पर्यावरण के स्वास्थ्य को अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानकर कार्य किया जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पशुओं में फैलने वाले रोगों को शुरुआती स्तर पर नियंत्रित कर लिया जाए, तो इंसानों में संक्रमण फैलने की संभावना काफी कम हो जाती है।
इसी सोच के तहत पशुपालन विभाग विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों और तकनीकी विशेषज्ञों के सहयोग से यह कार्यक्रम संचालित कर रहा है।
पशुपालकों को भी मिलेगा सीधा लाभ
इस प्रशिक्षण का लाभ केवल सरकारी तंत्र तक सीमित नहीं रहेगा। प्रदेश के लाखों पशुपालकों को भी इसका प्रत्यक्ष फायदा मिलेगा।
प्रशिक्षित पशु चिकित्सक गांव-गांव जाकर पशुपालकों को बीमारियों की पहचान, पशुओं की देखभाल, टीकाकरण, जैव सुरक्षा और संक्रमण से बचाव के बारे में जागरूक करेंगे। इससे पशुधन की उत्पादकता बढ़ेगी, पशुओं की मृत्यु दर कम होगी और डेयरी एवं पशुपालन क्षेत्र को आर्थिक मजबूती मिलेगी।
भविष्य की चुनौतियों से निपटने की तैयारी
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी, वन्यजीवों और इंसानों के बीच बढ़ते संपर्क तथा पशुपालन के बदलते स्वरूप के कारण आने वाले वर्षों में नए ज़ूनोटिक रोगों का खतरा बढ़ सकता है।
ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार का यह प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल वर्तमान जरूरत नहीं, बल्कि भविष्य की संभावित स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने की एक दीर्घकालिक रणनीति भी माना जा रहा है। यदि प्रशिक्षित नेटवर्क प्रभावी ढंग से कार्य करता है, तो प्रदेश में पशु और मानव स्वास्थ्य सुरक्षा को नई मजबूती मिल सकती है।
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