जनसंसद में SC-ST अधिकारियों ने बैंकिंग सिस्टम में प्रमोशन में भेदभाव, जबरन ट्रांसफर और सीनियर पदों पर हिस्सेदारी की कमी को लेकर गंभीर मुद्दे उठाए
देश के बैंकिंग सेक्टर में दलित और आदिवासी समुदाय के साथ कथित भेदभाव का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। हाल ही में ग्रामीण बैंक SC-ST वेलफेयर एसोसिएशन के एक प्रतिनिधिमंडल ने जनसंसद में अपनी समस्याएं रखीं, जिससे संस्थागत असमानता और सामाजिक न्याय से जुड़े गंभीर सवाल सामने आए हैं।
प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने बताया कि बैंकों में बहुजन समाज की हिस्सेदारी सीनियर पदों पर लगभग न के बराबर है। उनका कहना था कि यह स्थिति कोई संयोग नहीं, बल्कि नीतिगत स्तर पर मौजूद भेदभाव का परिणाम है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रमोशन के लिए roster system का पालन अनिवार्य होने के बावजूद, इसे सही तरीके से लागू नहीं किया जाता।
प्रतिनिधियों के अनुसार, जब भी प्रमोशन की बात आती है, तो दलित और आदिवासी अधिकारियों के सामने कई तरह की बाधाएं खड़ी कर दी जाती हैं। कभी performance का हवाला दिया जाता है, तो कभी merit के नाम पर उनकी तरक्की रोक दी जाती है। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और चयन मानकों में असमानता जैसे मुद्दे स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
इससे भी गंभीर आरोप यह है कि अगर कोई अधिकारी या संगठन का प्रतिनिधि इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे सजा के रूप में बार-बार ट्रांसफर कर दिया जाता है। ये ट्रांसफर अक्सर दूर-दराज और सुदूर क्षेत्रों में किए जाते हैं, जिससे न केवल उनके पेशेवर जीवन पर असर पड़ता है, बल्कि व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन भी प्रभावित होता है।
प्रतिनिधिमंडल ने यह भी स्पष्ट किया कि आरक्षण की व्यवस्था के कारण SC-ST समुदाय के लोगों को entry-level नौकरियां तो मिल जाती हैं, लेकिन इसके बाद उनके लिए उच्च पदों तक पहुंचना बेहद कठिन हो जाता है। उनका कहना है कि यह समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक है, जहां नीति और व्यवहार के बीच बड़ा अंतर है।

इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए जनसंसद में मौजूद सामाजिक न्याय के पक्षधर नेताओं ने कहा कि यह स्थिति दुखद जरूर है, लेकिन नई नहीं। उन्होंने कहा कि वे लंबे समय से इस मुद्दे को उठाते आ रहे हैं कि देश के विभिन्न संस्थानों में बहुजनों की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी भी संस्था में समाज के सभी वर्गों का समान प्रतिनिधित्व नहीं है, तो वह संस्था वास्तव में लोकतांत्रिक नहीं कही जा सकती। उनका मानना है कि बैंकिंग सेक्टर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में इस तरह की असमानता न केवल सामाजिक न्याय के खिलाफ है, बल्कि यह आर्थिक समावेशन के लक्ष्य को भी कमजोर करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह देश के संस्थागत ढांचे के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या मौजूदा नीतियां वास्तव में प्रभावी हैं या केवल कागजों तक सीमित हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस समस्या का समाधान केवल नियम बनाने से नहीं, बल्कि उनके सख्ती से पालन और निगरानी से संभव है। इसके लिए पारदर्शी प्रमोशन प्रक्रिया, स्वतंत्र जांच तंत्र और जवाबदेही सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।
इस मुद्दे ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या देश में सामाजिक न्याय की अवधारणा केवल सैद्धांतिक रह गई है, या इसे जमीनी स्तर पर भी लागू किया जा रहा है।
प्रतिनिधिमंडल और सामाजिक नेताओं ने स्पष्ट किया कि वे इस भेदभाव और अन्याय के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। उनका कहना है कि यह संघर्ष केवल एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है, ताकि हर वर्ग को समान अवसर और सम्मान मिल सके।
उन्होंने अंत में यह भी कहा कि जब तक हर संस्था में सभी वर्गों की बराबर हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक सामाजिक न्याय का सपना अधूरा रहेगा।
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