नई दिल्ली में छठे राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका में सुधार को निरंतर प्रक्रिया बताते हुए कहा कि कोई भी संस्था जड़ नहीं हो सकती। उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम, जजों के खिलाफ शिकायतों, पारदर्शिता, जनता के भरोसे और सोशल मीडिया के प्रभाव पर महत्वपूर्ण बातें कहीं। कार्यक्रम में वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने कथित ‘फिक्सर वकीलों’ और न्यायिक भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
नई दिल्ली में छठे राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका में सुधार को निरंतर प्रक्रिया बताते हुए कहा कि कोई भी संस्था जड़ नहीं हो सकती। उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम, जजों के खिलाफ शिकायतों, पारदर्शिता, जनता के भरोसे और सोशल मीडिया के प्रभाव पर महत्वपूर्ण बातें कहीं। कार्यक्रम में वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने कथित ‘फिक्सर वकीलों’ और न्यायिक भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
क्या न्यायपालिका में सुधार की प्रक्रिया कभी पूरी हो सकती है? क्या मौजूदा व्यवस्थाओं को लगातार परखा और बेहतर किया जाना चाहिए? इन सवालों के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने साफ संदेश दिया है कि सुधार किसी एक समय की कवायद नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। छठे राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका की कार्यप्रणाली, कॉलेजियम सिस्टम, जजों के खिलाफ शिकायतों, पारदर्शिता और जनता के भरोसे को लेकर कई अहम बातें कहीं।
‘Reform Must Be the Rule’, संस्थाएं जड़ नहीं हो सकतीं
कार्यक्रम के दौरान न्यायपालिका में सुधार की जरूरत पर बोलते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि वह इस विचार से पूरी तरह सहमत हैं कि “Reform Must Be the Rule”, यानी सुधार ही नियम होना चाहिए। उनका कहना था कि कोई भी संस्था स्थिर या जड़ नहीं रह सकती।
हालांकि CJI ने यह भी संकेत दिया कि न्यायपालिका से जुड़े कुछ संवेदनशील मुद्दों पर सार्वजनिक मंच से हर सवाल का जवाब देना उचित नहीं हो सकता। लेकिन उनके संदेश का मूल स्पष्ट था—संस्थागत व्यवस्था को समय के साथ खुद को परखते रहना होगा और जहां आवश्यकता हो, वहां सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहनी चाहिए।

न्यायपालिका में नियुक्तियों को लेकर लंबे समय से चर्चा में रहने वाले कॉलेजियम सिस्टम पर भी CJI सूर्यकांत ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम के बारे में उठाए जा रहे सवालों के उनके पास कानूनी जवाब हैं।
उन्होंने कॉलेजियम व्यवस्था के ऐतिहासिक विकास और उसके काम करने के तरीके की ओर भी ध्यान दिलाया। CJI के मुताबिक कॉलेजियम और कार्यपालिका के बीच मुश्किल से कोई बाधा है और दोनों के बीच विचार-विमर्श की एक व्यवस्थित प्रक्रिया मौजूद है।
यानी नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर बाहर से दिखाई देने वाली बहस के बावजूद, CJI ने संकेत दिया कि कॉलेजियम और कार्यपालिका के बीच संवाद और विचार-विमर्श की संस्थागत व्यवस्था काम करती है।
न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों से निपटने की व्यवस्था पर भी CJI सूर्यकांत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वह पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकते हैं कि मौजूदा शिकायत निवारण तंत्र समयबद्ध और मजबूत है।
उन्होंने यह भी कहा कि जजों को उनके करियर के अलग-अलग स्तरों पर शिकायतों का सामना करना पड़ता है। इसी संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हर शिकायत को वेबसाइट पर डाल देना चाहिए?
CJI ने कहा कि शिकायतों से निपटने का मैकेनिज्म अच्छी तरह स्थापित है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी व्यवस्था सुधार से बाहर नहीं है।
पारदर्शिता सिर्फ खुले दरवाजे नहीं, भरोसा सबसे बड़ी पूंजी
CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका में पारदर्शिता को केवल अदालत के दरवाजे खुले रखने और सार्वजनिक सुनवाई तक सीमित मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि पब्लिक ट्रस्ट और पब्लिक अप्रूवल एक ही चीज नहीं हैं।
उनके मुताबिक अदालत लोगों का भरोसा केवल इसलिए हासिल नहीं करती कि लोग उससे खुश हैं या उन्हें मनचाहा फैसला मिला है। असली भरोसा तब बनता है जब कोई व्यक्ति मुकदमा हारने के बावजूद यह महसूस करे कि उसके खिलाफ फैसला देने वाली प्रक्रिया निष्पक्ष थी।
उन्होंने न्यायपालिका की निष्पक्ष, सूचित और रचनात्मक आलोचना को भी संस्थागत सुधार के लिए जरूरी बताया। CJI ने कहा कि “Fair, Informed and Constructive Critique of Judicial Functioning” न्यायपालिका की जवाबदेही और आत्म-सुधार के लिए महत्वपूर्ण है।
उनका संदेश था कि जनता का भरोसा न्यायपालिका की असली करेंसी है और इसे लगातार अर्जित करना पड़ता है।

CJI ने सोशल मीडिया और अन्य बाहरी प्रभावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अदालतों को सोशल मीडिया या ऐसे अन्य प्रभावों से खुद को दूर रखना चाहिए। उनके मुताबिक न्यायिक निर्णयों की दिशा लोगों की लोकप्रिय राय या बाहरी दबाव से तय नहीं होनी चाहिए।
यही अंतर न्यायिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक लोकप्रियता के बीच भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
महेश जेठमलानी ने ‘फिक्सर वकीलों’ पर उठाए गंभीर सवाल
कार्यक्रम में राम जेठमलानी के बेटे, सांसद और वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका और ट्रिब्यूनल में कथित भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर चिंता जताई।
उन्होंने ‘फिक्सर वकीलों’ का मुद्दा उठाते हुए कहा कि ऐसे लोगों के बिना जजों को रिश्वत दिलाकर न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित करना संभव नहीं है। उन्होंने दावा किया कि बार में ऐसे वकीलों को कई लोग जानते हैं और संभव है कि उनकी जानकारी खुफिया एजेंसियों के पास भी हो।
महेश जेठमलानी ने कहा कि यदि ऐसे वकीलों के नाम पहले से सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के सामने नहीं हैं तो उन्हें वहां बताया जाना चाहिए। उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कामकाज पर भी सवाल उठाए और चेयरमैन का कार्यकाल पांच साल तक बढ़ाने की कथित कोशिश को “crying shame” बताया।
हालांकि महेश जेठमलानी की ओर से लगाए गए ये आरोप उनके वक्तव्य का हिस्सा हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि अलग से किया जाना आवश्यक है।
संदेश साफ- भरोसा चाहिए तो सुधार भी लगातार होना चाहिए
राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर से निकला सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि न्यायपालिका के लिए जनता का भरोसा केवल फैसलों से नहीं, बल्कि निष्पक्ष प्रक्रिया, पारदर्शिता, जवाबदेही और लगातार आत्म-सुधार से बनता है।
CJI सूर्यकांत का यह कहना कि “सुधार ही नियम होना चाहिए” उस बहस को आगे बढ़ाता है जिसमें संस्थाओं की मजबूती का आधार उनकी स्थिरता नहीं, बल्कि समय के साथ खुद को बेहतर बनाने की क्षमता मानी जाती है। वहीं कॉलेजियम और शिकायत निवारण तंत्र पर उनकी टिप्पणियां बताती हैं कि न्यायपालिका के भीतर भी व्यवस्थाओं को लेकर सवालों और सुधार की गुंजाइश पर चर्चा जारी है।
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