UAE राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान हुए परमाणु समझौतों के बाद ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ को लेकर अटकलें तेज हैं। क्या भारत सच में UAE को परमाणु सुरक्षा देगा, या यह केवल ऊर्जा और तकनीक सहयोग तक सीमित है?
यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की संक्षिप्त लेकिन अहम भारत यात्रा के बाद एक बड़ा सवाल अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में चर्चा का केंद्र बन गया है—क्या भारत UAE को ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ देने जा रहा है? इस सवाल ने पाकिस्तान और सऊदी अरब तक में बेचैनी बढ़ा दी है।
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के बयान के अनुसार, भारत और UAE के बीच एडवांस न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी, स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMR), न्यूक्लियर पावर प्लांट ऑपरेशन, मेंटेनेंस और न्यूक्लियर सेफ्टी पर सहयोग को लेकर समझौता हुआ है। इसी ‘न्यूक्लियर सेफ्टी’ शब्द ने ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ की अटकलों को जन्म दिया।
हालांकि, रणनीतिक और कूटनीतिक विशेषज्ञ साफ करते हैं कि न्यूक्लियर अंब्रेला का मतलब किसी देश को परमाणु हमले की स्थिति में सैन्य जवाबी गारंटी देना होता है—जो भारत की ‘नो फर्स्ट यूज’ परमाणु नीति के खिलाफ जाता है। इसका अर्थ यह भी होगा कि UAE पर हमला भारत पर हमला माना जाए, जो फिलहाल बेहद असंभव और जटिल है।

इसके अलावा, UAE की सुरक्षा पहले से ही अमेरिका के दायरे में है। UAE और अमेरिका के बीच ‘123 एग्रीमेंट’ मौजूद है, जिसके तहत UAE ने यूरेनियम एनरिचमेंट और री-प्रोसेसिंग से दूरी बनाई हुई है। ऐसे में भारत द्वारा सैन्य परमाणु सुरक्षा देना अमेरिका से टकराव जैसा होगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह समझौता आर्मी सिक्योरिटी नहीं बल्कि एनर्जी सिक्योरिटी और टेक्नो-डिप्लोमेसी से जुड़ा है। भारत SMR तकनीक के जरिए UAE को स्वच्छ, सुरक्षित और किफायती परमाणु ऊर्जा समाधान देना चाहता है। साथ ही, यह कदम मध्य पूर्व में चीन की बढ़ती परमाणु तकनीकी मौजूदगी को संतुलित करने की रणनीति भी माना जा रहा है।
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