नोएडा सेक्टर-63 पुलिस की कार्रवाई में कथित अंतर्राज्यीय वाहन चोर गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। पुलिस के अनुसार दो आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ 12 चोरी की बाइक-स्कूटी, फर्जी नंबर प्लेट और अवैध चाकू बरामद किए गए हैं। यह कार्रवाई केवल दो अपराधियों की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि NCR में सक्रिय वाहन चोरी के संगठित नेटवर्क की गंभीर चुनौती को भी उजागर करती है।
नोएडा को देश की सबसे आधुनिक स्मार्ट सिटी कहा जाता है। ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें, लाखों वाहन और अत्याधुनिक जीवनशैली इसकी पहचान हैं। लेकिन इसी आधुनिक शहर के समानांतर अपराध का एक ऐसा नेटवर्क भी सक्रिय है, जो हर दिन लोगों की मेहनत की कमाई पर हाथ साफ करने की कोशिश करता है। सेक्टर-63 पुलिस द्वारा कथित अंतर्राज्यीय वाहन चोरी गिरोह का पर्दाफाश इसी बड़ी तस्वीर की ओर इशारा करता है।
पुलिस के अनुसार 7 जुलाई 2026 को लोकल इंटेलिजेंस और गोपनीय सूचना के आधार पर एफएनजी सर्विस रोड स्थित ग्रीन बेल्ट के पास कार्रवाई करते हुए गौरव और मन्नू नामक दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का दावा है कि उनकी निशानदेही और कब्जे से 12 चोरी की मोटरसाइकिलें और स्कूटी, एक फर्जी नंबर प्लेट तथा एक अवैध चाकू बरामद किया गया। बरामद 12 वाहनों में से आठ वाहन पहले से एनसीआर के अलग-अलग थानों में दर्ज चोरी के मामलों से जुड़े पाए गए हैं।
यदि जांच में ये दावे पूरी तरह पुष्ट होते हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि वाहन चोरी अब किसी एक शहर की समस्या नहीं रह गई, बल्कि यह पूरे दिल्ली-एनसीआर में फैले एक संगठित अपराध तंत्र का हिस्सा बन चुकी है।

पुलिस पूछताछ के अनुसार मुख्य आरोपी गौरव पहले मजदूरी करता था, लेकिन धीरे-धीरे वाहन चोरी की दुनिया में सक्रिय हो गया। पुलिस का कहना है कि वह पहले भी दिल्ली में वाहन चोरी के मामले में जेल जा चुका है। वहीं दूसरा आरोपी मन्नू पंचर बनाने का काम करता था। पुलिस के मुताबिक दोनों मिलकर पहले ऐसे स्थानों की रेकी करते थे जहां सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे होते थे। मौका मिलते ही बाइक या स्कूटी चोरी कर लेते और कुछ दिन तक अलग-अलग स्थानों पर छिपाकर रखते थे।
इसके बाद चोरी किए गए वाहनों को बेहद कम कीमत पर राह चलते लोगों को बेच दिया जाता था। कई बार उनके पार्ट्स अलग-अलग निकालकर भी बाजार में बेचे जाते थे। यही तरीका वाहन चोरी के इस कारोबार को लंबे समय तक जीवित रखता है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार गिरफ्तार आरोपी गौरव के खिलाफ दिल्ली, नोएडा, फरीदाबाद और अन्य क्षेत्रों में वाहन चोरी से जुड़े कई मुकदमे पहले से दर्ज हैं। मन्नू का नाम भी कई मामलों में सामने आया है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी आरोपी पर पहले से इतने मामले दर्ज थे, तो वह लगातार सक्रिय कैसे बना रहा?

यह घटना केवल पुलिस कार्रवाई की सफलता नहीं, बल्कि अपराध के बदलते स्वरूप का भी संकेत है। अब वाहन चोर किसी एक मोहल्ले या शहर तक सीमित नहीं हैं। वे राज्यों की सीमाएं पार कर काम कर रहे हैं। चोरी एक जिले में होती है, वाहन दूसरे जिले में छिपाया जाता है और तीसरे जिले में बेच दिया जाता है। इससे जांच एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी होती है।
पुलिस द्वारा बरामद फर्जी नंबर प्लेट भी कई सवाल खड़े करती है। आमतौर पर ऐसी नंबर प्लेटों का इस्तेमाल चोरी के वाहनों की पहचान छिपाने और उन्हें वैध दिखाने के लिए किया जाता है। यदि किसी गिरोह के पास फर्जी नंबर प्लेट उपलब्ध है, तो यह संभावना भी जांच का विषय बनती है कि कहीं इसके पीछे दस्तावेज तैयार करने या नंबर प्लेट उपलब्ध कराने वाला कोई अलग नेटवर्क तो सक्रिय नहीं है।
यही कारण है कि इस मामले की जांच केवल दो आरोपियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि चोरी के वाहन आखिर खरीद कौन रहा था? क्या इनके पीछे कबाड़ी बाजार, अवैध गैराज, स्पेयर पार्ट्स का नेटवर्क या कोई संगठित रिसीवर गिरोह भी काम कर रहा था? जब तक चोरी का माल खरीदने वाले लोगों तक पुलिस नहीं पहुंचेगी, तब तक वाहन चोरी का कारोबार पूरी तरह समाप्त होना मुश्किल रहेगा।

सेक्टर-63 पुलिस की कार्रवाई निश्चित रूप से सराहनीय कही जा सकती है क्योंकि इससे कई चोरी के मामलों का खुलासा होने की संभावना बनी है। लेकिन इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस, एआई आधारित कैमरा नेटवर्क, ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR), इंटर-स्टेट पुलिस समन्वय और वाहन बाजारों की नियमित निगरानी को और मजबूत किया जाए।
आम नागरिकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वाहन हमेशा सुरक्षित स्थान पर पार्क करना, अतिरिक्त सुरक्षा लॉक लगाना, संदिग्ध गतिविधियों की तत्काल सूचना देना और बिना दस्तावेज वाले सस्ते वाहन खरीदने से बचना, ऐसे अपराधों को रोकने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
सेक्टर-63 पुलिस की यह कार्रवाई केवल दो आरोपियों की गिरफ्तारी भर नहीं है। यह उस संगठित अपराध तंत्र की झलक भी है, जो दिल्ली-एनसीआर में वाहन चोरी को एक संगठित कारोबार के रूप में चला रहा है। अब आगे की जांच यह तय करेगी कि क्या पुलिस इस पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंच पाती है या फिर यह कार्रवाई केवल एक कड़ी तक सीमित रह जाती है। यदि चोरी के वाहनों की खरीद-बिक्री करने वाले पूरे तंत्र का खुलासा होता है, तभी इस सफलता को वास्तविक और स्थायी उपलब्धि कहा जा सकेगा।
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