सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में ध्वस्त की गई मस्जिद के नीचे मिले कुएं ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। ASI की टीम ने मौके पर पहुंचकर कुएं की प्राथमिक जांच की और संरचना को करीब 200 से 300 साल पुराना बताया। हालांकि कुएं की वास्तविक उम्र और इतिहास की पुष्टि खुदाई के बाद ही हो सकेगी। वहीं, मस्जिद कमेटी के मुतवल्ली का कहना है कि इस कुएं का इस्तेमाल मस्जिद में वजू के लिए पहले से होता रहा है।
सहारनपुर में एक मस्जिद को लेकर शुरू हुआ विवाद अब जमीन के नीचे छिपी एक पुरानी संरचना तक पहुंच गया है। कलेक्ट्रेट परिसर में प्रशासन की कार्रवाई के बाद मस्जिद के नीचे से निकला कुआं अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि यह कुआं कितना पुराना है, बल्कि बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर यह संरचना वहां कब से मौजूद थी और इसका इस्तेमाल किस दौर में और किस उद्देश्य से किया जाता रहा?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की टीम सोमवार को मौके पर पहुंची। टीम ने कुएं की प्राथमिक जांच की और उसकी संरचना को करीब से देखा। जांच के दौरान ASI अधिकारी मनोज कुमार यादव सीढ़ी के सहारे कुएं के अंदर उतरे और वहां मौजूद संरचना का निरीक्षण किया।
मस्जिद से पहले का है कुआं?
प्राथमिक जांच के बाद ASI की ओर से जो बात सामने आई, उसने इस पूरे मामले को और दिलचस्प बना दिया। अधिकारी के मुताबिक कुएं की संरचना पहली नजर में करीब 200 से 300 साल पुरानी दिखाई देती है।

अगर आगे की जांच में यही अनुमान सही साबित होता है तो इसका सीधा मतलब यह होगा कि यह संरचना मौजूदा मस्जिद से पहले की हो सकती है। हालांकि ASI ने अभी इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं बताया है। यानी कुएं की उम्र को लेकर अभी विस्तृत वैज्ञानिक या पुरातात्विक जांच बाकी है।
ASI अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी पुरानी जगह पर इस तरह की संरचना मिलना अपने आप में कोई असाधारण बात नहीं है। पुराने समय में कुएं आम तौर पर बस्तियों और सार्वजनिक स्थानों का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करते थे। इसलिए केवल कुएं के मिलने से उसके इतिहास को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
खुदाई के बाद खुलेगा असली इतिहास
मौके पर हुई जांच फिलहाल प्राथमिक स्तर की है। ASI के अधिकारियों के मुताबिक कुएं के बारे में ज्यादा जानकारी तभी सामने आ सकेगी, जब इसकी विस्तृत खुदाई और जांच होगी।
अधिकारी मनोज कुमार यादव ने बताया कि प्रशासन की अनुमति मिलने पर कुएं की खुदाई की जा सकती है। खुदाई के दौरान कुएं की वास्तविक संरचना, निर्माण में इस्तेमाल सामग्री, उसकी गहराई और आसपास मौजूद किसी अन्य पुरानी संरचना के बारे में जानकारी मिल सकती है।
यही वजह है कि अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रशासन आगे कुएं की खुदाई को लेकर क्या फैसला करता है। क्योंकि अगर खुदाई के दौरान पुराने निर्माण से जुड़े अवशेष या अन्य महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है तो इस संरचना के इतिहास को समझने में मदद मिल सकती है।

दूसरी तरफ इस कुएं को लेकर मस्जिद कमेटी के मुतवल्ली की ओर से अलग दावा किया गया है। उनका कहना है कि मस्जिद में वजू के लिए कुएं का इस्तेमाल पहले से होता रहा है और यह कुआं भी उसी परिसर का हिस्सा था।
यानी एक तरफ ASI की शुरुआती जांच इस संरचना को 200 से 300 साल पुराना बता रही है, जबकि मस्जिद कमेटी का कहना है कि कुएं का इस्तेमाल मस्जिद में वजू के लिए किया जाता था।
अब दोनों पक्षों के दावों के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि कुएं का वास्तविक इतिहास क्या है?
कार्रवाई के बाद मिला कुआं बना नया सवाल
दरअसल, सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद मस्जिद को प्रशासन ने अवैध बताते हुए ध्वस्त किया था। कार्रवाई के बाद जमीन के नीचे मौजूद कुएं के सामने आने से मामला और चर्चा में आ गया।
अब ASI की टीम की प्राथमिक जांच के बाद कुएं की उम्र को लेकर एक शुरुआती तस्वीर जरूर सामने आई है, लेकिन पूरी कहानी अभी बाकी है। 200 से 300 साल पुरानी बताई जा रही इस संरचना की वास्तविक उम्र क्या है, इसका निर्माण किस दौर में हुआ और इसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाता था—इन सवालों के जवाब विस्तृत जांच और संभावित खुदाई के बाद ही मिल पाएंगे।
फिलहाल कुआं एक ऐसा सवाल बनकर सामने खड़ा है, जिसका जवाब जमीन के नीचे ही छिपा है। ASI की शुरुआती जांच ने कहानी का एक सिरा जरूर पकड़ लिया है, लेकिन इस पुराने कुएं का पूरा इतिहास सामने आने के लिए अभी आगे की जांच का इंतजार करना होगा।
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