महाराष्ट्र के पुणे (नसरापुर) में साढ़े तीन साल की मासूम से रेप और हत्या के जघन्य मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 65 वर्षीय भीमराव कांबले को महज 55 दिनों के भीतर फांसी की सजा सुनाई है। जानिए कोर्ट रूम का पूरा वाकया।
अदालत के कमरे में जब पिन-ड्रॉप साइलेंस था, तब सामने खड़े एक 65 साल के बुजुर्ग के चेहरे पर न तो कोई शिकन थी और न ही कोई पछतावा। लेकिन जैसे ही विशेष न्यायाधीश एस. आर. साळुंखे ने अपनी कलम उठाई, पूरे कोर्ट रूम का माहौल भारी हो गया। यह सिर्फ एक अदालती फैसला नहीं था, बल्कि उस तड़पती हुई साढ़े तीन साल की रूह को मिला वो इंसाफ था, जिसके लिए पूरा महाराष्ट्र पिछले 55 दिनों से सड़कों पर आक्रोशित था। विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट ने नसरापुर रेप और मर्डर केस के दोषी भीमराव प्रभाकर कांबले को 'फांसी की सजा' (Hanged Till Death) सुनाई है।
फैसला सुनाते हुए कोर्ट की टिप्पणी ने कानून की मर्यादा और उस अपराध की भयावहता दोनों को बयां कर दिया। जज ने कहा—
"इस जघन्य और घिनौनी वारदात के लिए उम्रकैद की सजा काफी नहीं है। इस क्रूरता के आगे फांसी की सजा भी छोटी महसूस होती है, लेकिन देश के कानून के पास अपराधी को देने के लिए इससे बड़ी कोई सजा मौजूद नहीं है।"
वो मनहूस दोपहर: बछड़ा दिखाने के बहाने ले गया था नराधम
कहानी शुरू होती है इस साल 1 मई को। चिलचिलाती धूप में पुणे के भोर तालुका के नसरापुर इलाके में रहने वाली साढ़े तीन साल की एक मासूम बच्ची अपनी नानी के घर आई हुई थी। गर्मियों की छुट्टियों में खिलखिलाती वह बच्ची दोपहर करीब 3:00 से 4:00 बजे के बीच घर के पास बने एक मंदिर के नजदीक खेल रही थी।
तभी वहां उसी गांव का रहने वाला 65 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर भीमराव कांबले पहुंचा। उसने मासूम को फुसलाने के लिए खाने का सामान (गाठी शेव) और पास के तबेले में एक नवजात बछड़ा दिखाने का लालच दिया। मासूम बिना कुछ समझे उसका हाथ थामकर चल पड़ी। सीसीटीवी कैमरे में कैद दोपहर 3:30 बजे की तस्वीरों में वह कांबले का हाथ पकड़े जाते हुए दिखी। इस दरिंदे ने अपने इरादों को अंजाम देने के लिए पास में खेल रहे 10 से 11 साल के अन्य बच्चों को पैसे देकर मिठाई लेने दुकान भेज दिया था, ताकि वह बच्ची को पूरी तरह अलग-थलग कर सके।
39 मिनट का वो खौफनाक मंजर और 18 जख्म
तबेले के पास बने एक सुनसान शेड के अंदर जो कुछ भी हुआ, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स के मुताबिक, उस नराधम ने करीब 39 मिनट तक उस साढ़े तीन साल की मासूम बच्ची को असहनीय शारीरिक यातनाएं दीं। बच्ची चीख न पाए, इसलिए उसके मुंह में कपड़े का एक गोला ठूस दिया गया।
जब बच्ची की मां और परिजनों ने उसे ढूंढना शुरू किया, तो वह कहीं नहीं मिली। शाम को जब तलाश तबेले तक पहुंची, तो गाय के गोबर के ढेर के नीचे उस मासूम का बेजान शरीर छुपाया हुआ मिला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जो खुलासे हुए, उसने डॉक्टरों तक को झकझोर दिया; बच्ची के नाजुक शरीर पर क्रूरता और हमले के 18 गंभीर निशान पाए गए थे। मौत का कारण मुंह दबाने और छाती पर आई अंदरूनी चोटों को बताया गया।
कानून की रफ्तार: 15 दिन में चार्जशीट, 55 दिन में फांसी
इस घटना के बाद पूरे महाराष्ट्र में भारी जनाक्रोश फैल गया। जगह-जगह प्रदर्शन होने लगे। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार ने इसे फास्ट ट्रैक पर डाला और वरिष्ठ सरकारी वकील अजय मिसर को विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किया।

पुणे ग्रामीण पुलिस ने चौतरफा दबाव के बीच बेहद पेशेवर और वैज्ञानिक तरीके से जांच की। पुलिस ने महज 15 दिनों के भीतर अदालत में 1,200 पन्नों की एक बेहद मजबूत चार्जशीट दाखिल कर दी। 28 मई को कोर्ट ने आरोपी पर आरोप तय किए और बिना किसी देरी के हर रोज (Day-to-Day) इन-कैमरा सुनवाई शुरू हुई। चूंकि कोई भी निजी वकील इस दरिंदे का केस लड़ने को तैयार नहीं था, इसलिए अदालत ने उसे 'लीगल एड डिफेंस काउंसिल' के जरिए कानूनी प्रतिनिधित्व मुहैया कराया।
अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने सबूतों की ऐसी अटूट जंजीर पेश की, जिसे चाहकर भी बचाव पक्ष नहीं तोड़ सका:
सीसीटीवी फुटेज: जिसमें आरोपी स्पष्ट रूप से घटना के वक्त बच्ची को ले जाता दिख रहा था।
डीएनए प्रोफाइलिंग: घटनास्थल और पीड़िता के शरीर से मिले साक्ष्यों का आरोपी के डीएनए से शत-प्रतिशत मिलान।
चश्मदीद गवाह: उन छोटे बच्चों की गवाही, जिन्हें आरोपी ने पैसे देकर दूर भेजा था।
'रेयरेस्ट ऑफ रेयर': अपराधी का पुराना काला इतिहास
सरकारी वकील अजय मिसर ने सुप्रीम कोर्ट के 12 ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए इसे 'दुर्लभ से भी दुर्लभतम' (Rarest of Rare) मामला घोषित करने की मांग की। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि भीमराव कांबले का पुराना इतिहास बेहद दागदार रहा है। वह पहले भी गांव की एक 62 वर्षीय बुजुर्ग महिला, एक 17 साल की नाबालिग और यहां तक कि एक बेजुबान जानवर के साथ भी यौन दुर्व्यवहार के मामलों में आरोपी रह चुका था। हालांकि, तकनीकी कमियों के कारण वह पहले बच निकला था, लेकिन इस बार उसके बचने का कोई रास्ता नहीं था।
जज एस. आर. साळुंखे ने कहा कि आरोपी ने अपने पिछले मामलों से कोई सबक नहीं लिया और पूरी सुनवाई के दौरान उसके चेहरे पर रत्ती भर भी पछतावा नहीं दिखा। समाज के लिए वह एक अत्यंत खतरनाक और कभी न सुधरने वाला तत्व बन चुका है।
अदालत में जब बहे आंसुओं के सैलाब
जैसे ही न्यायाधीश ने अपना अंतिम आदेश पढ़ा और भीमराव कांबले को मृत्युदंड की सजा सुनाई, कोर्ट रूम के बाहर खड़े पीड़िता के माता-पिता फूट-फूटकर रो पड़े। उनकी आंखों में अपनी बेटी को खोने का कभी न खत्म होने वाला दर्द तो था, लेकिन कानून द्वारा महज 55 दिनों में किए गए इस त्वरित न्याय के प्रति एक संतोष भी था। पीड़िता के पिता ने भरे गले से सिर्फ इतना कहा, "इस दरिंदे को कड़ी से कड़ी सजा ही मिलनी चाहिए थी, ताकि आगे कोई भी मासूम की तरफ आंख उठाने की हिम्मत न कर सके।"
महाराष्ट्र विधान परिषद की उपसभापति नीलम गोरे और तमाम सामाजिक संगठनों ने भी पुणे पुलिस और न्यायपालिका का आभार व्यक्त किया है, जिसने भारतीय न्याय प्रणाली में एक मिसाल कायम करते हुए चंद हफ्तों के भीतर इंसाफ की इबारत लिख दी।
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