Friday, April 17, 2026

कनॉट प्लेस बना ‘नारी शक्ति’ का केंद्र… हजारों महिलाओं की बाइक रैली ने दिया बड़ा संदेश!

वीरेन्द्र सचदेवा, कमलजीत सहरावत और बांसुरी स्वराज की मौजूदगी में निकली बाइक यात्रा, महिला आरक्षण के समर्थन में बनी मानव श्रृंखला

Bahrampur , Latest Updated On - Apr 15 2026 | 14:50:00 PM
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दिल्ली के कनॉट प्लेस में नारी शक्ति वंदन बिल के समर्थन में हजारों महिलाओं ने बाइक रैली और मानव श्रृंखला बनाकर जोरदार समर्थन जताया।

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नई दिल्ली का दिल कहे जाने वाले Connaught Place में बुधवार को एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली। यहां सड़कों पर आम दिन जैसा ट्रैफिक नहीं, बल्कि जोश, उत्साह और एक स्पष्ट संदेश नजर आ रहा था—महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को अब और इंतजार नहीं।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में महिलाओं और युवतियों ने भाग लिया। बाइक रैली के रूप में शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे एक विशाल जनसमूह में तब्दील हो गया, जिसने मानव श्रृंखला बनाकर महिला आरक्षण के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की।

इस पूरे आयोजन का नेतृत्व दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेन्द्र सचदेवा ने किया, जबकि सांसद कमलजीत सहरावत और बांसुरी स्वराज भी इस दौरान मौजूद रहीं।



बाइक रैली से मानव श्रृंखला तक—एक मजबूत संदेश

कार्यक्रम की शुरुआत बाइक रैली से हुई, जिसमें महिलाओं ने कनॉट प्लेस के इनर सर्कल का चक्कर लगाया। हर बाइक पर सवार महिलाएं सिर्फ राइड नहीं कर रही थीं, बल्कि वे एक संदेश दे रही थीं—समान अधिकार, समान भागीदारी और मजबूत नेतृत्व की मांग।

रैली के बाद सभी प्रतिभागियों ने एक विशाल मानव श्रृंखला बनाई। यह दृश्य अपने आप में बेहद प्रभावशाली था—एक साथ खड़ी हजारों महिलाएं, जो यह दिखा रही थीं कि अब उनकी आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसके साथ ही महिलाओं ने हस्ताक्षर अभियान में भी हिस्सा लिया, जिसमें उन्होंने नारी शक्ति वंदन बिल को लागू करने के समर्थन में अपनी सहमति दर्ज कराई।

नेताओं के बयान—राजनीतिक और सामाजिक संदेश

इस मौके पर बोलते हुए वीरेन्द्र सचदेवा ने कहा कि यह सिर्फ दिल्ली की महिलाओं की आवाज नहीं, बल्कि पूरे देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम के माध्यम से महिलाओं को देश की नीतियों में भागीदारी का अवसर मिलेगा।

उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जब देश में कुछ सकारात्मक होने जा रहा है, तो उसे रोकने या भटकाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। सभी दलों को इस ऐतिहासिक कदम का समर्थन करना चाहिए।

 

सांसद कमलजीत सहरावत ने अपने संबोधन में कहा कि महिला आरक्षण की जरूरत को हर राजनीतिक दल ने समय-समय पर महसूस किया है।

उन्होंने कहा कि 2023 में यह बिल सर्वसम्मति से पारित हुआ था, इसलिए अब इसे लागू करने में किसी तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए।

परिसीमन के मुद्दे पर उन्होंने विपक्ष को घेरते हुए कहा कि यह प्रक्रिया पहले की सरकारों द्वारा तय की गई थी, जिसे अब लागू किया जा रहा है। ऐसे में इस मुद्दे को उठाकर असली विषय से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है।
वहीं बांसुरी स्वराज ने अपने संबोधन में भावुक और सख्त दोनों ही अंदाज में बात रखी।

उन्होंने कहा कि यह रैली एक तरह से उस वादे की अंतिम तैयारी है, जो 2023 में किया गया था।

उन्होंने विपक्षी दलों से अपील करते हुए कहा कि वे राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर इस बिल का समर्थन करें, क्योंकि यह देश की बेटियों और बहनों से जुड़ा मुद्दा है।

उन्होंने यह भी कहा कि जो भी दल इस बिल का विरोध करेगा, वह मातृशक्ति की भावना के खिलाफ खड़ा नजर आएगा।

27 सालों के लंबे इंतजार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि इस वादे को पूरी तरह जमीन पर उतारा जाए



कार्यक्रम में दिखी बड़ी भागीदारी

इस आयोजन में प्रदेश उपाध्यक्ष योगिता सिंह, एनडीएमसी सदस्य सरिता तोमर, मीडिया रिलेशन प्रमुख विक्रम मित्तल, युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री रोहित चहल, प्रदेश युवा मोर्चा महामंत्री अरुण दराल, प्रभारी अभिषेक टंडन और सह-प्रभारी सुमित सेठ सहित कई नेता मौजूद रहे।

लेकिन सबसे खास बात रही—हजारों की संख्या में शामिल हुई महिलाएं और युवतियां, जिन्होंने इस आयोजन को एक जनआंदोलन का रूप दे दिया।

सिर्फ रैली नहीं, एक संदेश

यह कार्यक्रम सिर्फ एक राजनीतिक आयोजन नहीं था, बल्कि एक सामाजिक संदेश भी था।

महिलाओं की भागीदारी, उनकी आवाज और उनकी मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि अब वे सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहती हैं।


कनॉट प्लेस की सड़कों पर दिखा यह उत्साह इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में महिला नेतृत्व की भूमिका और मजबूत हो सकती है।

दिल्ली के दिल में आयोजित यह बाइक रैली और मानव श्रृंखला सिर्फ एक दिन का आयोजन नहीं था, बल्कि एक लंबे संघर्ष और उम्मीदों का प्रतीक था।

अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह समर्थन राजनीतिक फैसलों में कितनी तेजी से बदलता है और महिलाओं को वास्तविक भागीदारी कब तक मिलती है।

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