ग्रेटर नोएडा में यथार्थ हॉस्पिटल के सामने खुले गटर में 10 वर्षीय बच्चा गिर गया। मौके पर पहुंचे एआरटीओ राजेश मोहन और उनकी टीम ने बच्चे की जान बचाई। घटना के बाद ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की लापरवाही पर स्थानीय लोगों ने गंभीर सवाल उठाए।
ग्रेटर नोएडा। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्राधिकरण ने भ्रष्टाचार और लापरवाही की ऐसी चादर ओढ़ रखी है कि अब खुलेआम दिखाई देने वाली खामियों को भी नजरअंदाज किया जा रहा है। इसका ताजा उदाहरण यथार्थ हॉस्पिटल के सामने सामने आया, जहां महीनों से बिना ढक्कन का गहरा गटर किसी बड़े हादसे का इंतजार करता नजर आ रहा था। मंगलवार को यही लापरवाही एक 10 वर्षीय मासूम की जान पर भारी पड़ सकती थी, लेकिन संयोग से मौके पर पहुंचे एआरटीओ राजेश मोहन और उनकी टीम की तत्परता ने बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।
खुले गटर में गिरा मासूम, मच गई अफरा-तफरी
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मंगलवार को एक महिला अपने लगभग 10 वर्षीय बेटे के साथ सड़क से गुजर रही थी। अचानक बच्चे का पैर फिसला और वह सीधे खुले गहरे गटर में जा गिरा। घटना होते ही मौके पर चीख-पुकार मच गई। आसपास मौजूद लोग बच्चे को बचाने की कोशिश करने लगे, लेकिन गटर की गहराई और स्थिति के कारण कोई तत्काल उसे बाहर नहीं निकाल पा रहा था।
एआरटीओ राजेश मोहन बने देवदूत
इसी दौरान एआरटीओ राजेश मोहन अपनी टीम के साथ वहां से गुजर रहे थे। सड़क पर भीड़ और हंगामा देखकर उन्होंने तत्काल वाहन रुकवाया। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने बिना समय गंवाए अपनी टीम के साथ बचाव अभियान शुरू किया और कुछ ही देर में बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। स्थानीय लोगों ने एआरटीओ और उनकी टीम की त्वरित कार्रवाई की सराहना करते हुए कहा कि यदि कुछ मिनट और देरी हो जाती तो घटना दुखद रूप ले सकती थी।
प्राधिकरण की लापरवाही पर फूटा लोगों का गुस्सा
घटना के बाद स्थानीय नागरिकों का गुस्सा ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ खुलकर सामने आया। लोगों का कहना है कि जिस स्थान पर यह हादसा हुआ, वहां प्रतिदिन हजारों लोगों की आवाजाही रहती है। पास में यथार्थ हॉस्पिटल और यमुना प्राधिकरण का कार्यालय होने के कारण मरीजों, तीमारदारों, अधिकारियों और वीआईपी वाहनों का लगातार आवागमन रहता है। इसके बावजूद महीनों से खुला पड़ा गटर किसी जिम्मेदार अधिकारी की नजर में नहीं आया।
"क्या किसी मौत का इंतजार कर रहा है प्राधिकरण?"
स्थानीय निवासियों ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसे खुले गटरों की जिम्मेदारी किसकी है? लोगों का कहना है कि यदि समय रहते बच्चे को बाहर नहीं निकाला जाता तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता? नागरिकों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में खुले मैनहोल, अतिक्रमण और गंदगी की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं, लेकिन प्राधिकरण के संबंधित विभाग प्रभावी कार्रवाई करने के बजाय आंखें मूंदे बैठे हैं।
भ्रष्टाचार और जवाबदेही पर उठे सवाल
घटना के बाद नागरिकों के बीच यह चर्चा भी तेज हो गई कि यदि शहर की सबसे महत्वपूर्ण सड़कों और संस्थानों के आसपास ही सुरक्षा मानकों की यह स्थिति है, तो अन्य क्षेत्रों की हालत का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। लोगों का आरोप है कि विकास कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए जाते हैं, लेकिन बुनियादी नागरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में गंभीर लापरवाही दिखाई दे रही है।
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए, खुले गटर को तत्काल ढका जाए और पूरे शहर में खुले मैनहोल तथा खतरनाक स्थानों का विशेष अभियान चलाकर निरीक्षण किया जाए, ताकि भविष्य में किसी मासूम की जान इस तरह की लापरवाही की भेंट न चढ़े।
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